जया सरकार इन दिनों पुणे में रह रही हैं लेकिन मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ से उनका रिश्ता पुराना है। वे रायपुर, भोपाल, इंदौर जैसे शहरों में रही हैं। एक टेलिविज़न एंकर, कवियित्री, कला समीक्षक और शिक्षण के पेशे में सेवाएं दे चुकी हैं। कला के प्रति उनका शरू से ही रूझान रहा है। जयंत देशमुख उनके पारिवारिक मित्र रहे हैं। जयंत ने भी उन्हें अपनेपन का अहसास हमेशा दिया है। एक कलाकार के रूप में जयंत के रंगकर्म और उनके समर्पित काम ने जया को हमेशा प्रेरित किया। यही वजह हैं कि वे उन्हें अपना ‘नटसम्राट’ कहती हैं। जंयत देशमुख निर्देशित नाटक-‘नटसम्राट’ का हाल ही में भोपाल में मंचन हुआ है। इसमें आलोक चटर्जी ने यादगार भूमिका निभाई है। अपने इस लेख में जया ने नाटक की विषय वस्तु,कथा,लेखन,निर्देशन,अभिनय के बारे में विस्तार से चर्चा की है। वे कहती हैं, नटसम्राट नाट्यग्रन्थ का वो पन्ना है जिसे आने वाली पीढियां बुकमार्क करके रखेंगी । थिएटर से जुड़े कलाकारों के लिये यह लेख पढ़ने योग्य है। इसी नज़रिये से हम ये विशेष लेख यहां पब्लिश कर रहे हैं। इंदौर स्टुडियो पर मध्यप्रदेश की इस विशिष्ट रचनाकार के लिखने का सिलसिला जारी रहेगा। – एडिटर, इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम

जयंत का नटसम्राट और उसकी कहानी
नटसम्राट शेक्सपीरियन अभिनेता गणपत राव रामचंद्र बेलवलकर ‘अप्पा’ के आत्मावलोकन की व्यथा-कथा है । ‘अप्पा’ ने अपना पूरा जीवन ही मंच को समर्पित कर दिया है । रंगमंच ने उन्हें भी बहुत कुछ दिया है – पहचान, पैसा, सम्मान और नटसम्राट की उपाधि। एक समर्पित कलाकार के रूप में अप्पा ताउम्र कई किरदारों की ज़िदंगी को जीता रहता है । वो उन किरदारों के मुखौटों को अपने चेहरे से तो हटा लेता है लेकिन उनके चरित्र उसके ज़ेहन में बस जाते हैं, जिस किसी का नाम फुसफुसा दो तो वो पूरी उर्जा के साथ बाहर निकल आते हैं । अप्पा अपना रंगमंच अपने साथ ही लेकर चलते हैं लेकिन घर-गृहस्थी और दुनियादारी का अपना प्रपंच ही होता है। घर के मुखिया का रुतबा उसके परिवार में तब तक कायम रहता है जब तक उसके पास पैसा होता है ।‘अप्पा’ जो रंगमंच का सम्राट है, दुनियादारी के मंच में सत्ताविहीन हो जाता है। वो शेकसपिरियन चरित्रों को तो बहुत बारीकियों से समझ सकता है लेकिन अपनी औलादों के चरित्रों को समझने में भूल कर देता हैं । दुनियादारी के मंच पर उल्टा होता है, पैसा खतम- तमाशा शुरू ।
नटयोद्धा जयंत के आलोक-अप्पा
अलोक चटर्जी नेशनल स्कूल आफ ड्रामा के 83-87 बैच के स्टूडेंट हैं । जहाँ इरफान खान उनके सहपाठी रहे हैं । अनुपम खेर के संस्थान में उन्होंने अभिनय सिखाया है और आजकल वे भोपाल में नाट्य विद्यालय के अभिनय विभाग-प्रमुख हैं । आलोक चटर्जी और जयंत देशमुख दोनों ही भोपाल के रंगमंडल के द्रोणाचार्य- बी.वी. कारंत के प्रशिक्षण से निकले हुए कुशल नट-योद्धा हैं । 25 साल बाद इन गुरु-भाइयों की जोड़ी मिली है। हिंदी में नट सम्राट को पहली बार दर्शकों को भेंट करना अपने नाट्यगुरु को उनके द्वारा दी गई गुरु-दक्षिणा के सामान है ।

इसके पहले मराठी रंगमंच और सिनेमा के नटसम्राट नाना पाटेकर और डॉक्टर श्री राम लागू ने अप्पा के किरदार निभाकर फिल्मों और रंगमंचों के लिए बड़ा ही कठिन बेंचमार्क तैयार कर दिया है । धोती-कुरता पहने हुए जूलियस सीजर, हेमलेट और ओथेलो के किरदारों के अंग्रेजी संवाद बोलकर अंग्रेजी रौब जमाते हैं और दूसरी तरफ अटकन-मटकन गाकर पिता और दादा का चुटकिला वात्सल्य छलकाते हैं लेकिन वो कमाल तब करते हैं जब एकांत में अपनी पत्नी को ‘सरकार’ कहकर हार पहनाते हैं और सहजता से उसकी गोद में सर रखकर ढलती उम्र के रोमांस को शालीनता और चपलता से प्रस्तुत करते हैं । उम्रदराज दर्शकों के मन के कोने में दबा हुआ रोमांस चेहरे की झुर्रियों को पार करके आँखों में चमकने लगता है। आलोक ने हर रुप में दर्शकों को धीरे-धीरे गुगुदाया हैं । घर मांगते हुए उनका रुदन और पत्नी से विछोह का विलाप कठोर ह्रदय को भी पिघला सकता है । उनके स्तर का हर अभिनेता अपने जीवन काल में अप्पा के चरित्र को मंच पर एक बार तो ज़रूर जीना चाहेगा । आलोक चटर्जी को अप्पा की तरह नटसम्राट की उपाधि की कोई जरूरत नहीं है वो वैसे ही अपने दर्शकों के दिलों में राज करते रहेंगे ।
अप्पा की ‘सरकार’ रश्मि मुजुमदार

अप्पा की पत्नी का नाम तो कावेरी है लेकिन वो अप्पा की ‘सरकार ‘बनकर इतनी पूर्ण लगती है कि उसके अपने नाम का औचित्य ही नहीं रह जाता I वो ‘जीवन संगिनी’ के सच्चे अर्थ को अपने ही ढंग से परिभाषित करती है । रश्मि के चेहरे का भाव, उनके व्यक्तित्व की सौम्यता, उनकी अनकही बातें और संवाद अलोक के अन्दर के अभिनेता को और ऊपर उठा दिया है । एक सहीं सह-कलाकार मिलना सौभाग्य की बात होती है। रश्मि एक सहज अभिनेत्री हैं। नाटककार की पत्नी के असली जीवन में कम नाटक नहीं होते । पति द्वारा जीये गए रंगमंचीय पात्रों और उसके असली व्यक्तित्व को सहजता से अपनाना बहुत कठिन होता है I रंगमच की सफलता या कुंठा और असली जीवन की विफलता और पीड़ा मंच पे पर्दा गिरते ही घर पहुंच जाती है I एक पत्नी के के धैर्य की परीक्षा होती है क्योंकि उसे दुसरे रिश्ते भी निभाने होते हैं I सरकार ने अपने आपको पूरी तरह ढाल लिया है पर समय आने पर वो ख़ुद ढाल बन जाती है ।असल में कावेरी जैसी औरतें हमारे घरों में और हमारे आस-पास रहतीं हैं लेकिन वो तब नज़र आती हैं जब रंगमंच पे होती हैं । ये औरतें जो पूरी जिन्दगी पति और बच्चों के रिश्तों की रेशमी डोर को अपने हाथों में थामी रहतीं हैं । उस डोर से कई बार उसके हाँथ कट भी जाते हैं मगर वो किसी को दिखाई नहीं देते I रोटी सेंकते हुए उनकी जली हुई उँगलियाँ और गरम तेल के छींटे से पड़े हुए फफोले वाले बाज़ू हमें दिखते तो हैं पर मन को टीसते नहीं हैं। वो खुद इन्हें अपने शरीर का हिस्सा समझने लग जाती है ।‘सरकार’ के छुईमुई व्यक्तित्व के पीछे छुपी हुई शक्ति का एहसास नाटक खत्म होने के बाद होता है । ‘अप्पा’ और ‘सरकार’ के रिश्ते की कोमलता और मज़बूती पति-पत्नी को निश्छल और दायित्व भरे प्रेम के लिए उत्प्रेरित करती है । रश्मि मजूमदार ने ‘सरकार’ को ऐसे जीया है कि रश्मि और कावेरी दोनों से प्यार हो जाता है ।
जयंत के राडार पर नाटक और दर्शक
एक चित्रकार अपने बनाये हुए चित्र पर ब्रश का आखरी स्ट्रोक लगाके दूर हट जाता है और फिर हर एंगल से देखता है कि कोई कसर तो नहीं रह गई । ठीक इसी तरह जयंत देशमुख खचाखच भरे हॉल में अपने नाटक के शुरू होने से पहले एक आम दर्शक की तरह आखरी कुरसी पर जाकर बैठ जाते हैं, फिर नाटक और दर्शक दोनों उनके राडार में आ जाते हैं ।
नाटक के हर पहलुओं पर मजबूत पकड़, कहानी के धाराप्रवाह पर कलात्मक ढंग से किया गया नियंत्रण तथा नाटकों और फिल्मों के अनुभवों का सटीक उपयोग वो अपने हर नाटक को गढ़ने में इतनी कुशलता से करते हैं कि कहानी और चरित्र कब मंच से उतर के मन के भीतर पहुंच जाते हैं पता ही नहीं चलता । वो जिन्दगी के रंग, बेरंग या बदरंग पहलुओं को बिलकुल अलग नजरिए से देखते हैं इसलिए उनके द्वारा तराशे हुए चरित्र चाहे वो मृत्यंजय का ‘कर्ण’ हो, नटसम्राट का ‘गणपत राव अप्पा’ या आधे-अधूरे की सावित्री- सब अपने-अपने काल खंडो और सामजिक दायरों से निकलके दर्शको के साथ खड़े हो जाते हैं।

नाटक के चरित्रों और घटनाक्रमों से दर्शक अपने आपको या अपनी ज़िन्दगी को जोड़कर देखने लगते हैं। बस यही नाटक की सार्थकता और निर्देशक की सफलता का समकोण बिंदु है । जयंत दा थिएटर से जुड़ी हर विधा के मंजे हुए खिलाड़ी हैं इसलिए नाटक का चुनाव करते-करते ही वो अपने मन में पूरे नाटक को खेल लेते हैं । जब एक कलाकार वाया-बॉलीवुड थियेटर में वापस आता है तो अपने साथ फिल्म का अनुभव और ग्लैमर का दमखम लेकर आता है । लेकिन, जयंत देशमुख अपने स्टारडम के दबदबे को अपने सह-कलाकारों को काम्प्लेक्स देने के लिए नहीं बल्कि उन्हें निखारने के लिए करते हैं । उनके फिल्मों के आर्ट डायरेक्शन की कारीगरी आधे-अधूरे के सेट में साफ नज़र आती है इसलिए उनका सेट भी अपने आप में एक पूरा चरित्र हो जाता है । आधे-अधूरे में सावित्री के बिगडैल बेटे की कुंठा हो या मृत्युंजय में कृष्ण को किया गया वृषाली का मौन प्रश्न या नट सम्राट की कावेरी का निश्छल समर्पण, जयंत दा हर पात्र को अपने भीतर महसूस करते हैं I नि:शब्द सम्प्रेषण सशक्त तभी होता है जब निर्देशक उस चरित्र को आत्मसात कर लेता है । वो नाटक में खुद को पूरा उड़ेल देता है। उत्कृष्टता जयंत का हस्ताक्षर बन गई है ।

शिरवाडकर v/s सच्चिदानंद जोशी
डॉ सच्चिदानंद जोशी वर्तमान में इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स की एक्क्युटिव कमेटी के सचिव हैं। वे कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति रह चुके हैं । माखनलाल चतुवेर्दी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में मैं फैक्ल्टी थी तब वो रजिस्ट्रार थे । सच्चिदानंद जैसा साहित्यकार ही नटसम्राट को मराठी से हिंदी रंगमंच में स्थापित करने की नीव का पहला पत्थर रखने की पात्रता रखता है । उन्होंने नटसम्राट को ट्रांसलेट नहीं ट्रांसक्रियेट किया है । अनुवाद कई बार रस खो देता है लेकिन उनकी नाटक और साहित्य की गहरी समझ और भाषा की पकड़ ने नटसम्राट को एक नयी ऊंचाई दे दी है । नट सम्राट का हिंदी रूपांतर एक स्क्रिप्ट नहीं है एक ब्लू प्रिंट है । आने वाले समय में नटसम्राट विभिन्न भाषाओं में भारत के हर कोने में दिखने लगेगा और और बहुत से (जयंत, आलोक और सच्चिदानन्द) निखर के आयेंगे इस देश के रंग-पटल पर ।
नटसम्राट त्रिदेव के लिए कला -निर्वाण का क्षण
- उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक काल के नाटक का परिदृश्य दर्शाने के लिए परदे के खुलने का तरीका।
- ब्लैक एंड वाइट पोस्टर नुमा दीवार और दर्शकों के बीच से नटसम्राट नौवारी साड़ी पहकर प्रवेश करते हैं और स्टेज पर खड़े होकर उसे निकालना ।
- पिक्चर-परफेक्ट दिखने वाली फैमिली का फैमिली फ्रेम से बाहर निकलके अपना परिचय देना ।
- एक तरफ द्रुपद गायकी के आलाप और दूसरी तरफ अटकन-मटकन जैसे बालगीत की संजीदगी का अदभुत समन्वय स्थापित करना।
- ऐसे कुछ अदभुत प्रयोग किये हैं निर्देशक ने । इतने रंग उन्होंने अपने नाटकों में बिखेरे हैं, कि उनकी दाढ़ी सफ़ेद हो गई है !
- अप्पा की आत्मा का आत्मावलोकन एक अनकही कहानी कह जाता है ।
ये नाटक एक सांस्कृतिक, साहित्यिक, और सामाजिक योगदान है जो रंगमंच और दर्शकों के स्तर को भी स्तर ऊंचा कर देता है। इसके बाद दर्शकों की अपेक्षाएं भी बढ़ गयी हैं । हिंदी नाटकों लिए । नटसम्राट नाट्यग्रन्थ का वो पन्ना है जिसे आने वाली पीढियां बुकमार्क करके रखेंगी ।

