शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। हाल ही में दिल्ली में ‘मेटा 2026’ (META) पुरस्कारों की घोषणा हुई। इसमें बंगाली नाटक ‘जे जानलागुलोर आकाश छिलो’ (Je Janlagulor Akash Chilo) ने अपनी कलात्मक श्रेष्ठता साबित करते हुए विभिन्न श्रेणियों में कुल पाँच सम्मान हासिल किए। निर्देशक सौरव पलोधी को न केवल उनके बेहतरीन निर्देशन के लिए ‘बेस्ट डायरेक्टर’ का पुरस्कार मिला, बल्कि ‘बेस्ट स्टेज डिजाइन’ का गौरव भी उनके नाम रहा। अभिनय के क्षेत्र में टुर्ना दास ने ‘बेस्ट एक्टर इन ए लीड रोल (फीमेल)’ का पुरस्कार जीतकर अपनी अदाकारी की छाप छोड़ी। इसके अतिरिक्त, पूरी टीम की सामूहिक मेहनत को ‘बेस्ट एंसेंबल’ के रूप में सराहा गया, जबकि वृद्धियान दासगुप्ता को उनकी विशिष्ट प्रस्तुति के लिए ‘ज्यूरी स्पेशल मेंशन’ से नवाज़ा गया।
इन पुरस्कारों ने इस नाटक को इस वर्ष के सबसे सफल और चर्चित प्रोडक्शन के रूप में स्थापित कर दिया है। नाटक के शीर्षक का हिन्दी अर्थ है— ‘जिन खिड़कियों का अपना आसमान था’।
90 के दशक की यादों का आसमान: यह नाटक दर्शकों को 90 के दशक में ले जाता है,जब देश में बड़े बदलावों का दौर जारी था। उस समय एक पूरी पीढ़ी पुरानी सादगी और नए बाजारीकरण के बीच झूल रही थी। कमानी सभागार के मंच पर जब इसका मंचन हुआ, तो पूरा वातावरण कोलकाता की गलियों की सोंधी खुशबू और पुराने रेडियो की आवाज़ों से भर गया। निर्देशक सौरव पलोधी की यह प्रस्तुति केवल एक नाटक नहीं, बल्कि उन स्मृतियों की खिड़की है जहाँ से कभी आसमान साफ़ दिखता था।
चार दोस्त और टूटते सपनों की कहानी: नाटक की कहानी कोलकाता के चार दोस्तों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो 90 के दशक की राजनीतिक उथल-पुथल, बेरोज़गारी और मध्यमवर्गीय संघर्ष के बीच अपनी पहचान तलाश रहे हैं। नाटक का शीर्षक उन उम्मीदों का प्रतीक है, जो वक्त के साथ संकरी होती गलियों में कहीं खो गईं। यह कहानी बचपन की मासूमियत से लेकर जवानी की कड़वी हक़ीक़त तक का सफ़र तय करती है, जहाँ दोस्ती ही एकमात्र सहारा बचती है, लेकिन वक्त उसे भी नहीं बख्शता।
मंचन, शिल्प और संगीत: सौरव पलोधी ने मंच पर ‘नॉस्टेल्जिया’ (पुरानी यादों) को एक प्रभावी औजार की तरह इस्तेमाल किया है। पुराने लालटेन, लकड़ी की खिड़कियाँ और 90 के दशक के हिंदी फिल्मी गानों का पार्श्व संगीत दर्शकों को सीधे उस कालखंड में ले जाता है। कलाकारों का अभिनय इतना सहज है कि वे अभिनय करते नहीं, बल्कि उस दौर को जीते हुए महसूस होते हैं। नाटक की लाइटिंग और ध्वनि संयोजन (Soundscape) कोलकाता के मध्यम वर्गीय घरों की घुटन और छतों की आज़ादी के अंतर को खूबसूरती से दर्शाता है।
निर्देशक का दृष्टिकोण: निर्देशक सौरव पलोधी के अनुसार— “यह नाटक मेरी पीढ़ी का एक दस्तावेज़ है। हम उस दौर के लोग हैं जिन्होंने एनालॉग से डिजिटल होती दुनिया को देखा और इस बीच अपनी मासूमियत खो दी। यह नाटक उन लोगों के लिए है जो आज भी अपनी पुरानी खिड़कियों से उसी आसमान को ढूँढ रहे हैं।” इस नाटक में टुर्ना दास के साथ ही राहुल बनर्जी, कृष्णेंदु साहा, बुद्धदेव दास, बिमल चक्रवर्ती, आदित्य नन्दी, स्वाति पात्रा, संबित रॉय, प्रमोद सिंह, मानसी साहू, मुस्कान मंडल, अभिजीत नंदी, पुष्पिता दास, वृद्धयान दासगुप्ता, मेघात्री मंडल, राजश्री भट्टाचार्य, सौरव सूत्रधार, दीप भट्टाचर्जी, ऋत्विका नाथ, शांतनु मंडल और सुलाग्ना नाथ ने अभिनय किया है।
भावुकता और रॉ एनर्जी की प्रशंसा: दर्शकों और आलोचकों ने इस नाटक की भावुकता और इसकी ‘रॉ’ (Raw) एनर्जी की जमकर प्रशंसा की। नाटक देखते वक्त बहुत से दर्शकों ने खुद को 90 के दशक के बदलते दौर में देखा। तब और आज के हालात को महसूस किया। नाटक में नेपथ्य सहयोग – देवीप्रसाद दत्ता, गोपाल चक्रवर्ती, समीर, सुमन चक्रवर्ती, सोमनाथ चक्रवर्ती, मुनमुन मंडल, देबोप्रिय दासगुप्ता, पुष्पिता दास, मुस्कान मंडल आदि का है। उल्लेखनीय यह भी है कि पांच पुरस्कार पाने के बावजूद इस वर्ष ‘सर्वश्रेष्ठ नाटक’ और ‘बेस्ट ओरिजिनल स्क्रिप्ट’ का पुरस्कार ‘मिथ्यासुर’ के खाते में गया है। आगे पढ़िये – सर्वश्रेष्ठ नाटक ‘मिथ्यासुर’ की समीक्षात्मक रिपोर्ट। https://indorestudio.com/meta-2026-natak-mithyasur/
‘जे जानलागुलोर आकाश छिलो’: जिन खिड़कियों का अपना आसमान था
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