शकील अख़्तर, इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। नागपुर, महाराष्ट्र में हाल ही में अभिनेत्री प्रियंका ठाकुर ने अपने युद्ध कला कौशल और लोक संगीत से सजे नाटक-‘झलकारी’ का मंचन किया। 30 लोगों की टीम के साथ उनके निर्देशन में नाटक का यह 12 वां शो था। महाराष्ट्र में ज़्यादातर मराठी नाटकों के मंचन होते हैं, लेकिन प्रियंका अपने इस नाटक को हिंदी में करती हैं। इस तरह से वे नागपुर में हिंदी रंगमंच को भी एक नया आधार देने की कोशिश कर रही हैं।

तामझाम वाले इस बड़े शो के बारे में उनसे मेरा पहला ही सवाल था, आखिर ‘झलकारी’ नाटक का ही चुनाव आपने क्यों किया ? प्रियंका कहने लगीं, देखिये हिंदुस्तान में महारानी लक्ष्मी बाई तो सभी जानते हैं। सबको पता है कि लक्ष्मी बाई का देश के लिये क्या योगदान रहा है लेकिन ‘झलकारी’ जैसी नायिका के बारे में कोई नहीं जानता। उनके जीवन की वो महान गाथा अभी भी इतिहास के पन्नों में ही क़ैद है। मैंने सोचा कि मैं कुछ ऐसे योद्धाओं को अपने नाटक का आधार बनाऊं जो लोगों के सामने अब तक नहीं आ सके हैं। मैंने यह भी सोचा कि अगर पुरूष की जगह अगर कोई नारी का किरदार हो वो और भी अच्छा रहेगा। तब मेरी खोज ‘झलकारी’ तक पहुंची। ‘झलकारी’ ने सिर्फ 9 साल की उम्र में ही शेर को मार गिराया था। आज भी इतिहास में कोई ऐसी लड़की नहीं मिलती जिसने इतनी कम उम्र में शेर को मार गिराया हो। इतनी कम उम्र से ही उसकी बहादुरी के किस्से लोग जान चुके थे।
रंजना चितले की लिखी किताब से मदद मिली : वरिष्ठ अभिनेत्री ने बताया, शुरू में मुझे झलकारी के बारे में कुछ पता चला तो मैंने इस वीरांगना से जुड़े संदर्भों को तलाशा। शोध के दौरान मैंने रंजना चितले की लिखी किताब की मदद ली और फिर उनके काम पर नाट्य रूपातरंण का काम किया। फिर नाटक को तैयार किया। पहले मैंने इसमें अभिनय भी किया था.., लेकिन अभी जो नागपुर में शो हुआ है, उसमें मैंने अभिनय नहीं किया। इसमें करीब 30 कलाकार है। नाटक में हमने लोक संगीत का इस्तेमाल किया है। हबीब साहब के नाटकों पर मुझपर प्रभाव है। यानी यह एक संगीतमयी प्रस्तुति है। ये डेढ़ घंटे का शो है।
नाटक में लोक संगीत और तलवारबाजी : प्रियंका बताने लगीं, दो महीने में यह शो तैयार हुआ। इसमें संगीत के साथ युद्ध कला कौशल भी है। 15 दिन तक इस नाटक के कलाकारों को मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग भी दी गई। तलवारबाजी देखते हुए आपको असली युद्ध कौशल का अंदाज़ा होता है। इस नाटक का संदेश यह है कि अगर औरत ठान लेती है तो फिर वो कमज़ोर नहीं। आज़ादी के ज़माने में तो हमें अंग्रेज़ों के खिलाफ़ लड़ना था, लेकिन आज़ाद देश में नारी पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ यह नाटक एक नारी सशक्तिकरण की भूमिका बन जाता है, प्रेरणा जगाता है।
कोई भी औरत वीरंगना से कम नहीं : हमने कार्यक्रम में नागपुर शहर की मेयर के साथ प्रमुख लोगों को बुलाया था और मंच पर उनकी पत्नियों को बिठाया और कहा कि ये इन पुरुषों के पीछे वो महिलाएं जिनकी वजह से ये पुरूष जीवन में इतने सफल हैं और कामयाबी हासिल कर रहे हैं। मगर असल में इनके पीछे की वीरांगना ये पत्नियां हैं। पतियों से ही पत्नियों का सत्कार कराया। मेयर मैडम सरप्राइज़ रह गईं ।
हबीब तनवीर और नादिर बब्बर के साथ काम: प्रियंका शादी के बाद से नागपुर में हैं। उनकी शादी 2011 में हुई थी। चार साल तक वे घर गृहस्थी में ही व्यस्त रहीं लेकिन 2015 से उन्होंने रंगमंच के लिए फिर से काम करना शुरू किया। उन्होंने भोपाल में रंगमंच से जुड़े अनुभवों को याद करते हुए बताया, रंगमंच से मेरा करीब डेढ़ दशक का नाता है। मैंने भोपाल में हबीब तनवीर और नादिरा बब्बर के साथ काम किया है। सतीश मेहता, नज़ीर कुरैशी के साथ भी। उन दिनों के मुझे यहूदी की लड़की,गाज़ीपुर की हसीना,ओढ़ना और टंट्या भील जैसे नाटक याद आते हैं। अब नागपुर में उन्हीं अनुभवों का लाभ मिल रहा है। चार साल से डायरेक्शन कर रही हूं। महाराष्ट्र राज्य सरकार का बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड भी मिला है।

