Wednesday, May 13, 2026
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जिस कला का समाज से सरोकार नहीं, वह कला नहीं

इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। कोई भी ठीक ढंग से सोचने वाला कलाकार बाज़ार के दबाव में काम नहीं कर पाता। मैंने कभी नहीं किया, जो मुझे जो दिख रहा है, उससे मुठभेड़ करते हुए मैं कला में दाखिल हुआ। मेरी पेंटिंग लोक रंग से आती है, इसलिए मैं बाजार के दबावों से बचा रह सका।

कला अभावों की मोहताज नहीं : यह बात जनवादी लेखक संघ इन्दौर के मासिक रचना पाठ-72 में चित्रकार मुकेश बिजौले ने अपनी रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए कही। उन्होंने बताया कि पहले मैं श्वेत-श्याम चित्र ही बनाता था। बाद में 2008 में मेरे चित्रों में रंगों ने प्रवेश किया। झाबुआ के आदिवासी जीवन से मेरे चित्रों के प्रमुख बिम्ब आए हैं। विषम परिस्थितियों में भी जो जीवन का सुख है वह आदिवासियों के पास है। मेरे चटक रंगों में उल्लास और प्रतिरोध दोनों आते हैं। कला अभावों की मोहताज नहीं होती। जिस कला का समाज से सरोकार नहीं वह कला हो ही नहीं सकती।आज का समय प्रयोगधर्मी : कला संवाद में देवेन्द्र रिणवा, सारिका श्रीवास्तव, डॉ.पदमा सिंह, लक्ष्मीकांत जोशी और संदीप नाइक आदि के प्रश्नों के जवाब में बिजौले ने कहा कि आज का समय प्रयोगधर्मी है। कला में खोज हो रही है, नवाचार हो रहा है। चित्रकार को भी आत्मावलोकन करते रहना चाहिए। मैं खुद भी अपने बनाए चित्रों को समय के साथ खारिज कर देता हूँ। संचालन प्रदीप मिश्र ने किया। दूसरे सत्र में कवि पवन वर्मा की किताब ‘होना अपने समय में’ का विमोचन हुआ। पवन वर्मा ने रोज की तरह, चीजें, यह इतना आसान नहीं, चिड़िया और बच्चे, शुन्य से आगे, फैल रही है स्याही कागज पर, पुरस्कृत कविता, कब तक और यात्रा में कविताएं पढ़ीं।कविताओं में कवि का समय पूर्ण सत्य के साथ : कवि-समीक्षक राजेश सक्सेना ने कविता पर कहा कि जब कवि भयानक चीखों और खतरनाक आवाजों के बीच अपने समय में सन्नाटे को सुनने की कोशिश कर रहा हो तो कवि की चेतना के बारे में सोचा जाना चाहिए। इन कविताओं में समय की ऐसी परतें हैं जो अमूर्त, अलक्षित और अलभ्य है। उज्जैन के साहित्यकार श्रीराम दवे ने कविताओं को विराट फलक की तरफ ले जानी वाली कहा। रजनीरमण शर्मा का मानना था कि कविताओं में कवि का समय पूर्ण सत्य के साथ मौजूद है। इन्हें संवेदनशीलता के दस्तावेज की तरह देखना चाहिए। बहादुर पटेल ने कहा कि कवि ने जैसा देखा, उसे उसी बेचैनी के साथ लिखा। डॉ. विभा दुबे, केतकी शर्मा, सुरेश उपाध्याय ने कविताओं के सहज, सरल होने और उनकी गहराई तथा प्रभाव को रेखांकित किया। प्रदीप मिश्र ने इन कविताओं को एक मनुष्य की अपने समय के प्रति प्रतिक्रिया बताते हुए कहा कि कविताएं भाषा में अस्तित्व की तलाश में है।

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