Wednesday, April 15, 2026
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जिस लाहौर नहीं देख्या: सच्चे धर्म और इंसानियत की आवाज़

धर्म का असली मक़सद इंसान को इंसान बनाना है, न कि उसे दूसरे इंसान से अलग करना।”
“अगर मज़हब इंसान को इंसान से दूर कर दे तो वह मज़हब नहीं, ग़लतफ़हमी है।”
“हम सबका दर्द एक है, चाहे हिंदू हो या मुसलमान। इंसानियत का तकाज़ा है कि हम एक-दूसरे का सहारा बनें।”
“घर, हवेली, ज़मीन सब बंट सकती है, लेकिन इंसानियत नहीं बंटनी चाहिए।”"Asmita Theatre group performing Jis Lahore Nai Dekhya directed by Arvind Gaur". Special report by Shakeel Akhter.

ये वो संवाद हैं, जिन्होंने दिल्ली के श्रीराम सेंटर में मौजूद दर्शकों को आंदोलित कर दिया। दर्शकों ने इन संवादों की ज़रूरत और उनके गहरे अर्थ को समझकर न सिर्फ तालियां बजाईं, बल्कि विचारपूर्ण प्रतिक्रिया भी दी। यह नाटक है— “जिस लाहौर नहीं देख्या ओ जम्याइ नई”। पढ़िये इसकी ताज़ा प्रस्तुति पर शकील अख़्तर की विशेष रिपोर्ट।

"Asmita Theatre group performing Jis Lahore Nai Dekhya directed by Arvind Gaur". Special report by Shakeel Akhter. indorestudio.com

इस नाटक में ऐसे कई संवाद हैं, ग़ज़लें और शेरो-शायरी भी है जो हमारी साझा-संस्कृति और उससे जुड़े माहौल के बारे में सोचने पर मजबूर कर देती है:
“शहर सुनसान है किधर जाएँ
ख़ाक होकर भी हम उधर जाएँ।”
या फिर…
“आज देखा है तुझ को देर के बाद,
आज का दिन गुज़र न जाए कहीं।”Playwright: Asghar Wajahat

इस मशहूर नाटक के लेखक हमारे दौर के सर्वाधिक मान्य और प्रतिष्ठित साहित्यकार असगर वजाहत हैं। 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन की पृष्ठभूमि पर उन्होंने यह नाटक 25 साल पहले लिखा था। इसके प्रकाशन वर्ष 1989 में ही इसका पहला मंचन ‘नया थियेटर’ के बैनर तले हबीब तनवीर ने किया था।"Asmita Theatre group performing Jis Lahore Nai Dekhya directed by Arvind Gaur". Special report by Shakeel Akhter. indorestudio.com ‘कोर्ट मार्शल’, ‘अंधा युग’ और ‘कबीरा खड़ा बाज़ार में’ जैसी अन्य यादगार प्रस्तुतियों की तरह यह नाटक भी ‘अस्मिता थियेटर ग्रुप’ की एक खास पेशकश है। इसे युवाओं के प्रिय रंग-गुरु और प्रख्यात निर्देशक अरविंद गौड़ के निर्देशन में ‘अस्मिता’ के 55 कलाकारों ने प्रस्तुत किया है। नाटक का संगीत अरविंद जी की पत्नी संगीता गौड़ ने दिया है।अस्मिता थियेटर ने इस नाटक के 100 से ज़्यादा शोज़ किये हैं। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है।"Asmita Theatre group performing Jis Lahore Nai Dekhya directed by Arvind Gaur". Special report by Shakeel Akhter. indorestudio.comनाटक में माई (बुज़ुर्ग दादी), शायर नासिर काज़मी, मौलवी, हमीदा बेगम, मिर्ज़ा और पहलवान जैसे कई किरदार हैं, जिन्हें ‘अस्मिता’ के कलाकारों ने अपने प्रभावशाली अभिनय से जीवंत कर दिया है। इनमें काकोली गौड़, बजरंग बली सिंह, प्रभाकर पांडे, करण खन्ना, अपर्णा पुराणिक, आशुतोष सिंह, रावल मंधाता सिंह चौहान, अंकुर शर्मा, संजीव सिसोदिया, आशुतोष यादव और रितेश ओझा, हेमलता ठाकुर,सावेरी गौड़, दिव्यांशु यादव, वैभव गिरहे, विनोद पानसेर जैसे मंजे कलाकार शामिल हैं।"Asmita Theatre group performing Jis Lahore Nai Dekhya directed by Arvind Gaur". Special report by Shakeel Akhter. indorestudio.com इस प्रस्तुति के कई दृश्य यादगार बन पड़े हैं। हवेली और चाय की दुकान के दृश्यों के अलावा, मज़हबी और सियासी नारे लगाती भीड़, मकान अलॉटमेंट, शव यात्रा और दिवाली मनाने जैसे दृश्य गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। वह भावपूर्ण दृश्य भी मन में बस जाता है जब ‘माई’ लाहौर की अपनी हवेली छोड़कर दिल्ली जाने का दु:खद फ़ैसला लेती है और रेलवे स्टेशन पहुँच जाती है। "Asmita Theatre group performing Jis Lahore Nai Dekhya directed by Arvind Gaur". Special report by Shakeel Akhter. indorestudio.com देखा जाए तो हबीब तनवीर के अलावा कई अन्य निर्देशकों ने भी इस नाटक का मंचन किया है, इसके बावजूद अरविंद गौड़ का निर्देशन इसे एक अलग पहचान देता है। नाटक में उनके द्वारा रचे गए दृश्य, पार्श्व संगीत का संतुलित उपयोग और लोकेशन के लिए फिल्म स्क्रीन का रचनात्मक इस्तेमाल उनकी कल्पनाशीलता को दर्शाता है। इस विषय पर अरविंद जी कहते हैं— “मैंने हबीब साहब के साथ भी काम किया और यह नाटक भी देखा, लेकिन मैंने अपने अनुभवों से इसे नए सिरे से रचा है, परिकल्कपना की है।”"Asmita Theatre group performing Jis Lahore Nai Dekhya directed by Arvind Gaur". Special report by Shakeel Akhter. indorestudio.comअरविंद गौड़ ने नाटक के अंतिम दृश्य—बुज़ुर्ग हिंदू महिला ‘माई’ की शव यात्रा—को भी अपनी अलग ‘रंग-दृष्टि’ से प्रस्तुत किया है। इस दृश्य में याकूब पहलवान अपने साथियों के साथ मौलवी का जनाज़ा लेकर आता है और बड़े अदब से माई की शव यात्रा को रास्ता दे देता है। अरविंद गौड़ इस सीन को परिभाषित करते हुए कहते हैं— “मौलवी की हत्या पहलवान ने ही की है और वही जनाज़ा लेकर भी निकला है। वह समाज में खुद को पाक-साफ़ दिखाने का ढोंग कर रहा है। वह विवाद खड़ा करने के बजाय रास्ता दे देता है, मैंने ऐसा इसलिये किया ताकि इस किरदार के माध्यम से समाज के ऐसे ही पाखंडी चेहरों को भी उजागर किया जा सके।”"Asmita Theatre group performing Jis Lahore Nai Dekhya directed by Arvind Gaur". Special report by Shakeel Akhter. Delhi.सवाल है कि पहलवान एक नेक और इंसानियत के हक में बात करने वाले मौलवी की हत्या क्यों कर देता है? दरअसल, ‘माई’ एक वृद्ध हिंदू महिला है और मौलवी इस बात की वकालत करता है कि उसे बिना किसी दखल के अपने धर्म का पालन करने दिया जाए। वह उसके पूजा-पाठ या दिवाली मनाने पर ऐतराज नहीं करता और उसकी मृत्यु के बाद हिंदू रीति-रिवाजों से अंतिम संस्कार की राय देता है। पहलवान की नज़र में ये बातें मज़हब के खिलाफ हैं, इसलिए वह मौलवी का क़त्ल कर देता है।"Asmita Theatre group performing Jis Lahore Nai Dekhya directed by Arvind Gaur". Special report by Shakeel Akhter. Delhi.असगर वजाहत का यह नाटक लाहौर की एक ऐसी हवेली से शुरू होता है, जो बंटवारे के बाद लखनऊ से आए मुस्लिम मुहाज़िर (शरणार्थी) सिकंदर मिर्ज़ा के परिवार को अलॉट की गई है। वहां पहुँचने पर उन्हें पता चलता है कि हवेली की मालकिन, एक बूढ़ी हिंदू महिला ‘माई’, अब भी वहीं रह रही है और वो अपना घर छोड़ने को तैयार नहीं है।"Asmita Theatre group performing Jis Lahore Nai Dekhya directed by Arvind Gaur". Special report by Shakeel Akhter. indorestudio.comशुरू में मिर्ज़ा परिवार और माई के बीच टकराव रहता है, लेकिन धीरे-धीरे मानवीय रिश्ते पनपने लगते हैं। माई पूरे मोहल्ले की प्रिय बन जाती है और मिर्ज़ा परिवार के साथ उसका रिश्ता सगे परिजनों जैसा हो जाता है। इस बीच कुछ कट्टरपंथी, इस बात को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश करते हैं, जिससे विभाजन की त्रासदी और मानवीय संवेदनाओं के बीच का द्वंद्व उभरकर सामने आता है।"Asmita Theatre group performing Jis Lahore Nai Dekhya directed by Arvind Gaur". Special report by Shakeel Akhter. indorestudio.comयह नाटक संदेश देता है कि लोगों को बांटने वाली शक्तियों के बावजूद मानवीय संवेदना, साझी संस्कृति और सह-अस्तित्व की भावना सबसे ऊपर है। रंगमंचीय दृष्टि से यह प्रस्तुति भावनात्मक और प्रतीकात्मक है, जहाँ पात्रों का आंतरिक द्वंद्व दर्शकों को गहराई तक छू जाता है। दर्शक उस बात को गहरे तक समझने लगते हैं, जो नाटक का संदेश है।

"Asmita Theatre group performing Jis Lahore Nai Dekhya directed by Arvind Gaur". Special report by Shakeel Akhter. Delhi.

इस नाटक के देश-विदेश में सैकड़ों मंचन हो चुके हैं। इस नाटक पर काफ़ी चर्चा और विवाद भी हुआ, मगर इसकी प्रासंगिकता हमेशा बनी रही। इसी नाटक की मार्मिक पटकथा पर आधारित राजकुमार संतोषी और आमिर ख़ान की फिल्म ‘लाहौर 1947’ भी जल्द आने वाली है।Director Arvind Gaur interacting with the audience after the play's performance.8 मार्च की शाम, जब यह नाटक मंचित हुआ, भारत और न्यूजीलैंड के बीच क्रिकेट का फाइनल मैच चल रहा था। इसके बावजूद श्रीराम सेंटर में काफ़ी संख्या में दर्शक नाटक देखने पहुँचे थे। दर्शकों ने पौने दो घंटे के इस नाटक को पूरे मनोयोग से देखा।अंत में अरविंद गौड़ ने दर्शकों का आभार जताते हुए कहा, “यह थिएटर प्रेमियों की ही ताक़त है कि हम 33 वर्षों से लगातार उद्देश्यपूर्ण नाटक आपके सामने ला पा रहे हैं।” उन्होंने कलाकारों और तकनीकी टीम का परिचय कराया और दर्शकों की प्रतिक्रियाएं लीं, जिन्होंने इसे आज के समय का एक बेहद ‘ज़रूरी नाटक’ बताया। Sandhya Bhagat Saxena, who came back home with playwright Asghar Wajahat, met him. इस नाटक को इस रिपोर्ट के लेखक यानी मेरे साथ अमेरिका से स्वदेश आईं श्रीमती संध्या भगत सक्सेना ने भी देखा। वे अमेरिका के अटलांटा में हिंदी रंगकर्म के लिये वर्षों से सक्रिय हैं। उन्होंने भारत आकर इस नाटक के लेखक असगर वजाहत और निर्देशक अरविंद गौड़ से भी मुलाक़ात की। "Asmita Theatre group performing Jis Lahore Nai Dekhya directed by Arvind Gaur". Special report by Shakeel Akhter.नाटक के कलाकारों के नाम: रतन की अम्मा की भूमिका में काकोली गौड़ नागपाल। नासिर काज़मी की भूमिका: बजरंग बली सिंह। कट्टरपंथी पहलवान: प्रभाकर पाण्डेय। बेटी: सावेरी श्री गौड़ (तन्नो)। मिर्जा: करन खन्ना। हमीदा बेगम: अपर्णा पौराणिक। जावेद: आशुतोष सिंह। मौलवी: रावल सिंह मान्धाता। चायवाला: संजीव सिसोदिया। तांगे वाला: अंकुर शर्मा। संगीत निर्देशक: डॉ. संगीता गौड़।"Asmita Theatre group performing Jis Lahore Nai Dekhya directed by Arvind Gaur". Special report by Shakeel Akhter. indorestudio.com सहयोगी अभिनेताओं का भी रहा विशिष्ट योगदान: आशुतोष यादव, रितेश ओझा, यानसिन हेमलता, जीतेंद्र कुमार, सुमित आनंद, विनोद पानेसर, प्रथम बाम्बा, सक्षम अरोड़ा, रवि कौशिक, लवकुश पाल, अजय कांता, वैभव गिरहे, दिव्यांशु यादव, शाहदाब ख़ान चौधरी, कृष्णा भंडारी, संभव कश्यप, आकांशा तिवारी, खुशबु चोपड़ा, करूणा शर्मा ,ईशिका, निकिता तोमर, हेमन्त मिश्रा, शाहरुख अली, अभिषेक शर्मा, अरुण पंघाल, गौरव सांटोलिया, अमित उपाध्याय विभोर विक्रम सिंह, नरेंद्र शर्मा, आकाश अग्रवाल, अमरजीत कुमार, शशिकांत तिवारी, अजीत सिंह, अभिषेक दुबे, मो. जुहैब, रजत शांडिल्य, अभिराज सिंह, संदीप सैनी, प्रिया महाला, युविका नागर, अनिकेत मीणा, आर्यन राजपूत, भूपेंद्र, नरेंद्र सिंह, लक्ष्मी राय, साईशा वेदी, याशिका सिंह और वापिका। अंत में पढ़िये इस नाटक के कुछ और संवाद।
शायर नासिर कासमी
“शहर सिर्फ मकानों से नहीं बनता… लोग चले जाएँ तो शहर की रूह भी चली जाती है।”
मौलाना
“इस्लाम यह नहीं कहता कि किसी बेबस को उसके घर से निकाल दो। मज़हब इंसानियत से बड़ा नहीं हो सकता।”
“अगर किसी बूढ़ी औरत को उसके घर से निकाल देना ही दीनी काम है, तो फिर हमें अपने ईमान पर भी सोच लेना चाहिए।”
बेगम (मिर्ज़ा की पत्नी) –
“माई, अब आप कहीं नहीं जाएँगी… यह घर आपका भी है। आप रहेंगी तो घर में बरकत रहेगी।”
“माई, जब से आप घर में आई हैं, ऐसा लगता है जैसे हमारी अपनी अम्माँ हमारे साथ रहने लगी हों।”
“घर दीवारों से नहीं बनता… घर तो लोगों के रहने से बनता है।”
सिकंदर मिर्ज़ा –
“हम भी अपना घर छोड़कर आए हैं… उजड़ने का दर्द क्या होता है, यह हमसे बेहतर कौन जानता है।”
“यह हवेली हमें रहने को मिली है, लेकिन इसका माज़ी भी तो है… उसे कैसे मिटा दें?”आगे पढ़िये- त्रिवेणी कला संगम में हुए फुटबॉल-डांस के अनूठे प्रयोग पर शकील अख़्तर की विशेष रिपोर्ट। https://indorestudio.com/football-dance-brazil-triveni-classical/

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