Wednesday, May 13, 2026
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जीवन की संध्या में सुनहरी सुबह! एक लेखक की सत्य-कथा में जीवन का दर्शन

शकील अख़्तर, इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। जीवन क्या है ? जीवन के सुख-दु:ख में एक इंसान को किस तरह से जीना पड़ता है? आदमी चाहता क्या है मगर होता क्या है ? जीवन की शाम में ‘सुनहरी सुबह’ कैसे होने को आती है ?
विजय शंकर श्रोती की पुस्तक ‘सुनहरी सुबह’ एक पाठक के समक्ष इन्हीं बातों को पूरी सचाई से प्रस्तुत करती है। वह भी जीवन की संध्या में उस वक्त जब अनंत सफ़र पर जाना है। लेखक श्री श्रोती जबलपुर,मध्यप्रदेश के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। यह उनकी साहित्यिक समझ है जिसकी वजह से ऐसी दो पुस्तकें वे लिख सके हैं। उनकी दूसरी पुस्तक का नाम है- ‘माय रेमिनिसेंसेस यानी मेरे संस्मरण’। ‘सुनहरी सुबह’ पुस्तक अनुभवी और वयोवृद्ध लेखक के जीवन से जुड़े प्रसंगों और घटनाओं को पाठक के सामने जीवन के दर्शन की तरह सामने रखती है। यद्दपि यह पुस्तक लेखक की आत्मकथा या जीवन की व्यथा-कथा है। परंतु यह पाठक को भी जीवन की सामानांतर यात्रा पर ले जाती है। स्वंय के जीवन को समझने और उसके आकलन की दृष्टि देती है। पुस्तक सिखाती है कि आप जीवन में कठिन से कठिन परिस्थिति का सामना कर सकते हैं बर्शते संकट के समय भी आप धैर्य से अपनी यात्रा जारी रखें। शेष प्रभु कृपा पर छोड़ दें। इस संदर्भ में वे पुस्तक के प्रारंभ में ही एक अंग्रेज़ी कहावत का उल्लेख करते हैं-‘destiny shapes itself’। इसका अर्थ है कि ‘भाग्य खुद अपने आप को आकार देता है’। आपका काम है, ईश्वर प्रदत्त इच्छा का सम्मान करना, पूरी निष्ठा और ईमानदारी से श्रम करते रहना। अनुभवी लेखक की प्रगाढ़ दृष्टि यह भी कहती है कि सच्ची नीयत में बरकत है। यानी अगर आप अच्छी या पवित्र भावना से कोई काम करते हैं, सजग प्रयास करते हैं। समय के अनुरूप परिष्कार करते चलते हैं तब निश्चित ही सफल होते हैं।
जीवन की संध्या में यादों का मेला :
पुस्तक में लेखक कीअतीत से वर्तमान की यात्रा तय करते हैं। 82 साल के अपने जीवन का परीक्षण करते हैं। वह भी तब जब जीवन की संध्या हो चली है। जीवन की इस संध्या में आत्मा शरीर को त्यागकर परमात्मा से मिलन को आतुर है। इस काम के लिये लेखक के समक्ष एक दिव्य ज्योति पुंज का आगमन हो चुका है। ज्योति पुंज का कहना है कि अब देर न करो, जीवन अब यहीं समाप्त हुआ। जीवन नश्वर है और नाते-रिश्ते नदी-नाव की तरह यहीं के हैं। अब परमात्मा से मिलने के लिये एक अबाध और अनंत सफर पर जाना है। लेखक पूरे मनोयोग से इस यात्रा को तैयार भी है। परंतु अंतिम क्षणों में उसे वह सब याद आ रहा है जिसे उसने अपने जीवन में जीया है।(चित्र में बायें से रवीश अग्रवाल,बेटा मनु,लेखक विजय शंकर श्रोती,श्रीमती अग्रवाल,पत्नी और बेटी)
जीवन तो जीया ही नहीं ! :

ओह ! लेखक को ऐसे समय अनुभूत होता है कि जीवन तो उसने जीया ही नहीं। उसने केवल जीवन के नाम पर समय ही व्यतीत किया है। आपाधापी,संघर्ष और ऐसी ज़िम्मेदारियों का जीवन कि जिसे संभालते-संभालते ही जीवन की शाम हो गई है। अब जब इस शाम में शरीर शिथिल हो गया है। कोई मोह जीवन से नहीं है। यह ऐसा समय भी है जब न सुबह का अर्थ है ना शाम का।
कितना हसीन रिश्ता है ये ज़िंदगी के साथ
कोसों चला हूं जैसे किसी अजनबी के साथ
लेखक को याद आता है कि बचपन होशंगाबाद के एक गांव और उसके बाद तहसील में स्कूली पढ़ाई में बीता। उच्च शिक्षा के लिये मध्यप्रदेश के शहर जबलपुर आना पड़ा। जबलपुर में जब पहली बार पिता के कहने पर वे अपने पिता के बाला भाई यानी चाचा के घर रहने पहुंचे तब उन्हें अहसास हुआ कि यह रिश्ता तो भ्रम था। चाचा का रूखा व्यवहार और स्वार्थीपन के साथ उनका गुज़ारा नहीं अर्थहीन है। एक महीने में ही में ही नौजवान विजय शंकर यानी लेखक को अपने चाचा का घर छोड़कर एक कमरा किराये लेना पड़ा। अकेले ही संघर्ष की शुरूआत करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने महाकौशल की नगरी में बीए, एलएलबी से लेकर एमए अंग्रेज़ी तक की पढ़ाई की। नौकरियां छूटने, लगने के उपक्रम में हिम्मत से साथ देने वाली पत्नी शकुंतला देवी का साथ मिला । बाद में छोटे भाई भी गांव से शहर उनके साथ रहने को आ गये। कठिन और संघर्ष भरे दिनों में लेखक की वजह से एक छोटे भाई ने एमएससी और दूसरे ने डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी की। इस तरह पितृ ऋण से उन्हें एक तरह से मुक्ति मिली। इस बीच भारत में अमेरिका की कंपनी यूएस एड ( US AID) में प्रभु कृपा से नौकरी मिली, जिसने पत्नी समेत भाइयों की पढ़ाई को पूरी कराने में मदद की।
युद्ध से आया परिवार पर संकट :
1971 की भारत-पाकिस्तान की लड़ाई में अमेरिका ने पाकिस्तान का साथ दिया। इसके बाद भारत में अमेरिका के सभी मिशन बंद कर दिये गये। विजय शंकर श्रोती यानी लेखक की नौकरी भी यूएस एड ( US AID ) के बंद होने पर चली गई। अब फिर से जीवन यापन का संकट आ खड़ा हुआ। तब तक घर में बेटियों का आगमन हो चुका था। उनकी पढ़ाई-लिखाई,परवरिश,खुद का मकान न होना जैसे कई संकट थे। कुछ समय के संघर्ष के बाद आख़िर वकालत के रूप में काम शुरू किया। समय लगा। परंतु धीरे-धीरे सारे काम सधने लगे। योग-संयोग ऐसे बने की बेटियों की शिक्षा भी पूरी हुई। उनका विवाह भी हुआ और मकान भी बना। भाई भी अपनी-अपनी जगह सरकारी नौकरियों में चले गये। (वैवाहिक वर्षगांठ के मौके पर श्रीमती सुशीला सिंह,श्री आरएन सिंह, जस्टिस डीएम धर्माधिकारी,जस्टिस बीसी वर्मा,लेखक विजय शंकर श्रोती,पत्नी श्रीमती शकुंतला श्रोती, श्री रवीश अग्रवाल, पीछे श्री टीएस रूपराह, आरएस पटेल)
मां-पिता की सेवा नहीं की :
जीवन की संध्या के समय लेखक को याद आया कि मां और पिता की तरफ जीवन के संघर्ष में तो कभी ध्यान गया ही नहीं। माता-पिता से होशंगाबाद के गांव चार दिन के लिये मिलने गये भी तो दो दिन में ही काम के बोझ की वजह से जबलपुर लौट आये। मां ने कहा भी, ‘बेटा चार दिन के लिये आये थे। दो दिन में ही क्यों लौट रहे हो।’ मां-पिता का प्यार संघर्ष में खोया और यह भी भूल गये कि उनका जीवन भी कुछ समय का है। एक बड़ी भूल भाई रमेश को लेकर हुई। उन्हें कुत्ते ने काट खाया था। जबलपुर में हाइड्रोफोबिया की गंभीर बीमारी की वजह से उनका आसमयिक निधन हो गया। युवा उम्र में विजय शंकर को नहीं सूझा कि भाई के शव को माता-पिता के पास गाँव लेकर जाये। उन्होंने अंतिम संस्कार जबलपुर में करने के बाद माता-पिता को सूचना दी। अब माता-पिता का रो रोकर बुरा हाल हो गया।
बहन ने क्यों ख़त्म कर दिये संबंध ? :
माता जी बेटे के लिये अंतिम सांस तक अफ़सोस में रही। माता पिता यही बात कहते रहे कि बेटा को आख़िरी समय देखा तक नहीं। जीवन की अंतिम संध्या में माता-पिता को लेकर लेखक को यह भी ध्यान आया कि मां को जब पिता केदारनाथ की यात्रा पर ले गये थे, तब सभी भाई ठीक-ठाक स्थिति में थे। वह उनके तीर्थ यात्रा पर आने-जाने, रूकने आदि का प्रबंध अच्छी तरह से कर सकते थे। परंतु नहीं किया। अंतिम समय में बहन की याद भी लौटी। विवाह के बाद बहन ने माता-पिता और परिवार से किनारा कर लिया। बोलना,मिलना-जुलना बंद कर दिया। संबंध तोड़ लिये। विवाह के बाद उसके मायके आने का बस इंतज़ार ही रहा। बहुत पूछने पर एक बार उसने कहा, ‘मेरा विवाह एक कंगाल के साथ कर दिया गया।’ इस क्लेष और दुर्भाव ने बहन का अहित भी किया। वे हीन भावना से ग्रसित हुई। डिप्रेशन की मरीज़ बनी। पति चल बसे। बाद में बेटोंं ने सब जमाया। वे स्वस्थ भी हुईं। मगर प्रभु कृपा से सब मिलने का भी कोई अर्थ न रहा।
जीवन संगिनी का साथ-सम्बल :
अंतिम समय में पत्नी भी याद आई, जिसने अर्धांगिनी के रूप में सबकुछ धैर्य से सहा। कदम-कदम पर साथ दिया। कड़े एकांगी निर्णयों या नौकरियों के छूटने के समय भी कभी निराशा का भाव प्रकट नहीं किया। हर समय मुस्कुराकर साथ दिया। बेटियों के विवाह कैसे हुआ,कैसे सब ठीक हुआ,पता तक न चला। लेखक ने पुस्तक उन्हीं बेटियों के नाम समर्पित की है। एक पिता के रूप में लेखक ने अपनी कवितामय पंकक्तियों में लिखा है,’ बेटियां घर में थीं तो चहल-पहल थी। अब घर का सूनापन बताता है कि बेटियां अपना घर बसाने चली गईं हैं।’ पुस्तक में बरबस ही बेटियों से जुड़ीं स्मृतियां चली आती हैं। ऐसे बहुत से मार्मिक प्रसंग इस पुस्तक को एक पाठक के लिये यादगार और सीखने के लायक बनाते हैं। दर्शाते हैं कि जब जीवन का अंतिम पड़ाव या समय होता है, तब शायद स्मृतियां ही मनुष्य को अपने जीवन के आकलन का अवसर देती है। विजय शंकर श्रोती की दूसरी अंग्रेज़ी में पुस्तक ‘माय रेमिनिसेन्सेस'( MY REMINISCENCES) भी इसका एक अर्थ में विस्तार है। 268 पृष्ठ की इस पुस्तक में एक आम इंसान की तरह लेखक की विस्तृत कहानी है, उसकी प्रोफेशनल लाइफ़ और उससे जुड़े संघर्षों का विवरण है। इस पुस्तक में उनके वकालत से जुड़े 50 वर्षों का सफर है। उससे जुड़ी महत्वपूर्ण यादें एक दस्तावेज़ की तरह है। इसमें बहुत से पात्र हैं और उनसे जुड़ी विशिष्ट जानकारी का ब्यौरा है। पुस्तक के अंत में कुछ यादगार तस्वीरें भी दी गई हैं।
(लेखक से संपर्क का पता : विजय शंकर श्रोती,वरिष्ठ अधिवक्ता,मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय,जबलपुर। फोन : 0761-2403361, E- mail: adashishshroti@yahoo.com)

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