शकील अख़्तर, इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। ‘जो आपने विचारा है, जो आपने धारा है, अपने कर्म में आपने जो उतारा है, अंत में वही फलीभूत होता है, विशेषकर मेरी इस उम्र में आकर।’ मालवा के लोक कवि और विद्वान संस्कृतिकर्मी श्री नरहरि पटेल ने यह बात कही। 90 वर्ष की इस विरल कला हस्ती ने कहा-‘मैं आपको पढ़ी-पढ़ाई या किसी की बताई बात नहीं बता रहा, अपने अनुभव से मैं यह कह रहा हूं।’
कला-संस्कृति के आधार स्तंभ: आपको बता दें कि नरहरि पटेल इंदौर में कला और संस्कृति के आधार स्तंभों में से एक रहे हैं। उनका शहर में कविता, लेखन, आकाशवाणी, रंगकर्म और कला आयोजनों के प्रबंधन से गहरा नाता रहा है। पेशे से वह एक बैंक अधिकारी और वरिष्ठ कर सलाहकार रहे। परंतु युवा दिनों से ही वे शहर की कला और साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। एक दौर ऐसा भी था, जब बलराज साहनी जैसे अभिनेता उनके स्वर, शब्द और अभिनय के प्रशंसक थे। 1956 में बलराज साहनी ने उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में आने का निमंत्रण भी दिया था। परंतु नरहरि पटेल ने कभी अपनी संस्कृति का साथ नहीं छोड़ा। वे मालवा में ही रचे-बसे रहे। उनकी यही निष्ठा और रचनात्मकता से भरा जीवन आज उनकी ख़ुशनुमा स्मृतियों का ख़ज़ाना है।
मेरे साथ मेरी खुशनुमा स्मृतियाँ: नरहरि पटेल ने कहा – ‘रात में बहुत स्मृतियां आती हैं मगर सब सकारात्मक। मैंने कहा न, जैसे आपने कर्म किये और जीवन जीया वहीं संचित होकर इस उम्र में काम आता है।’ परंतु आज का जीवन ?…नरहरि पटेल कहने लगे- ‘जो जवानी के दिनों में दिनचर्या थी वही आज भी है। अब फिर से सुबह 6 बजे तैयार होकर पास के बगीचे में जाता हूँ। धीरे-धीरे ही सही, अपनी कुबड़ी लकड़ी के सहारे। वहां दिखावे के लिये योग जैसी क्रियायें करता हूँ । हाथ-पैर हिला-डुला लेता हूँ । आधे घंटे तक झूला झूलता हूँ। फिर धूप निकलने पर 7 बजे तक घर लौट आता हूँ। यह सब अकेले करता हूँ। ख़ुद को ऐसे ही तैयार किया है। घर आकर अख़बार की हेडलाइन्स बांचता हूँ। टीवी भी थोड़ा देख लेता हूं। ख़बरों की जानकारी रखता हूं।’
लिखने-पढ़ने का नहीं अब सुनने का काम: क्या पहले की तरह लिखना-पढ़ना होता है ? ..’नहीं,अब दोनों आँखों से नहीं के बराबर ही दिखता है। दायीं आँख का रेटिना ख़राब हो गया है। बायीं आँख में मोतियाबिंद है। डॉक्टरों की राय है कि इसे ऐसे ही रहने दें। मैंने भी मान लिया, क़ुदरत ने कह दिया है कि बेटा अब तू सुनकर काम चला। टपके मारते रह। उसमें कहीं कोई डिज़ाइन बन जाये तो बन जाने दे !…’ ( यह कहते हुए वे ख़ुद हंसने लगे )।इस तस्वीर में लेखक के साथ आत्मीय मुद्रा में कवि नरहरि जी। संगीत अपनी ‘घुट्टी’ में है: और संगीत ? मेरे सवाल पर कहने लगे- ‘ वह तो अपनी घुट्टी में है। सुनता रहता हूं। रात में भी जब दिल चाहता है। अच्छे शायर और कवियों को भी सुन लेता हूं।’ अपनी इसी लय में वे आगे बताने लगे – ‘संजय बेटे ने यह कंटोपिया मोबाइल दे दिया है भैया। यही मेरा सहारा है। आप जैसे मित्रों का फोन आता रहता है। मनोरंजन हो जाता है। मैं जैसा भी हूं, बहुत अच्छा हूं। प्रभु की कृपा है। दूसरी शारीरिक व्याधियां भी हैं। संजय मेरा ख़याल रखते हैं। वो मेरे गाइड हैं, मेरे साथी। वह मुझे हर तरह से समझते हैं। आपको हैरानी होगी। मैं जीवन में कभी 6 घंटे भी हॉस्पिटल में भर्ती नहीं हुआ। परंतु कोरोना काल में दो बार ऐसे मौके आये जब चिकनगुनिया की वजह से मुझे आईसीयू में भर्ती होना पड़ा। अस्पताल में रहना पड़ा। वहां से समझो कि नई ज़िदंगी लेकर आया।’
मेरी पार्टनर मेरी प्रेरणा और शक्ति: फिर अपना दर्द भूलकर बताने लगे- ‘यह सब तो कुछ नहीं, संजय की ‘मां साब’ ..मेरी पत्नी शकुंतला जी ; उनसे मुझे बहुत प्रेरणा और शक्ति मिलती है। उन्हें तो तीन-तीन नलियां लगी हुई हैं..भोजन,कफ़ बाहर निकालने की..। 6 साल पहले लकवा का अटैक हुआ था..धीरे-धीरे उसका असर बढ़ता गया..। आप कभी उन्हें व्हील चेयर पर या बिस्तर पर लेटे हुए देखेंगे तो कह नहीं सकते कि ये महिला बीमार है! उनका पूरा जीवन सकारात्मक सोच से भरा रहा। नलियों की वजह से वो बोल नहीं पातीं, 5 साल से मौन हैं, परंतु हाथ हिलाकर या चेहरे,आँखों से अपनी बात कहती हैं। सुबह और शाम को जब हम घर के बरामदे में बैठते हैं। वे आते-जाते लोगों की नमस्कार का इशारों में जवाब देती हैं। बच्चों और दुखियों के लिये एक दाता के रूप में कुछ न कुछ देने को कहती हैं।
जब सिंधिया जी घर पर मिलने आये: बीते दिनों हमारे विनम्र और प्रिय युवा नेता ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया आज़ादी के अमृत उत्सव के अवसर पर मिलने आये थे, तब संजय ने मां साब को भी उनसे मिलाया था। जब सिंधिया जी उनके करीब गये तो उन्होंने उनके सिर पर हाथ रखकर आर्शीवाद दिया। एक बात बताऊं..एक पार्टनर के रूप में उनका बड़ा अच्छा साथ मिला। उनका मेरा 65 बरस का दाम्पत्य जीवन गुज़रा है। मेरी हर रचना की वो ही पहली श्रोता और समीक्षक रहीं। एक मां और पत्नी के रूप में उन्होंने पूरे परिवार बहुत सेवा की। आज सुबह का वक्त मैं उनकी सेवा में लगाता हूं, उठकर पहले उन्हें अदब से गुडमॉर्निंग करता हूं। सच तो यह है कि वे मेडिकल साइंस और आप सभी की दुआओं से जी रही हैं। उनकी सेवा के लिये उन्हीं की हमनाम परिवार की एक सदस्या भी हैं। वे उनका बहुत प्रेम से ख़याल रखती हैं।’ (तस्वीर में अपने बेटे संजय के साथ नरहरि पटेल)
आई इंदौरी के करीबी मित्रों की याद : इन बातों के बीच पटेल साहब को अचानक इंदौर के अपने तीन मित्रों की याद हो आई- ‘कोरोना काल में इंदौर का बड़ा नुकसान हुआ..अपने भाई, राहत इंदौरी चले गये..उनसे ज़्यादा करीब उनके छोटे भाई, मेरे नाटक वाले मित्र आदिल थे और अपने कवि, साहित्यकार चंद्रसेन विराट..। चंद्रसेन विराट जी से मैं आठ दिन पहले मिलने जाने वाला था। वो हमारे करीब ही रहते थे लेकिन..नियति। कहने लगे अब कुछ साहित्य, कला के मित्र हैं जैसे प्रो.सरोज कुमार उनसे मेरी बात हो जाती है।
मालवी लोक कवि ने कही मन की बात : नरहरि पटेल मालवी लोक कवि और मालवी संस्कृति के सशक्त स्तंभ हैं। मालवी ग़ज़लों में उनका कोई सानी नही। स्वाभाविक रूप से उनसे यह बात भी होने लगी। पटेल बा ने बताया-‘मेरी मालवी ग़ज़लों और साहित्य पर छिंदवाड़ा की एक छात्रा ने थिसिस लिखने का काम किया है। उन्होंने कहा, जिस तरह से मैंने मालवी ग़ज़लों में प्रयोग और काम किया है। वह इस परम्परा में बहुत नया है। मैं मालवा के पुराने दिग्गजों और उनके साहित्य से परिचित रहा हूं। इनमें पन्नालाल जी, तोमर जी से लेकर बाल कवि बैरागी भी याद आते हैं। बाल कवि बैरागी जी तो बाद में हिन्दी के विद्वान लेखक कहलायें। परंतु एक समय था जब मालवी के लिये उन्होंने भी यादगार काम किया था, हमने उनके साथ ना जाने कितनी गोष्ठियां की, जैसे की राहत साहब के साथ। अगर बैरागी साहब मालवी में ही रमे रहते तो मेरा विश्वास है हमारी संस्कृति का और भला होता।
मालवी रचनाओं के आकलन पर संदेह : एक और सवाल के जवाब में वे कहने लगे, ‘ मुझे संदेह होता है कि मेरी मालवी रचनाओं का सही आकलन हो सकेगा? इसकी वजह यह है कि अब इस तरफ रूचि और समझ रखने वाले कम हैं। परंतु जब तक संभव हुआ मैं मालवी साहित्य को अपना रचनात्मक योगदान देता रहा। उन्होंने बताया, ‘मेरी मालवी ग़ज़लों,दोहों और हायकू का नया संग्रह – ‘प्रेम पगलिया’ (प्रेम के दो पग) प्रकाशित हुआ है। इसमें मालवी रचनाओं का हिन्दी में अर्थ भी दिया गया है। हायकू में लोकोक्तियों और कहावतों को बुना गया है। ताकि हम मूल मालवी कहावतों को याद रख सकें। मैं संजय से कहता हूं वो यह संग्रह आपको ज़रूर भेजें। (लेखक शकील अख़्तर के साथ नरहरि जी की एक यादगार तस्वीर।)
जब पटेल साहब ने किया हायकू का स्वराभिनय : आकाशवाणी और रंगमंच के इस वरिष्ठ कलाकार ने एक उदाहरण का स्वराभिनय किया। हंसते हुए बताया कि कैसे मंच पर इस हायकू पर अभिनय होता..नाम, पद्माबाई, ने पग.. वां का!’ नरहरि पटेल ने मुझे अपनी आवाज़ के अभिनय से ही रंगमंच जैसा अभिनय दिखा दिया। मैं अब बेसाख़्ता हंस रहा था। साथ में ख़ुद सरल,सहृदय श्रद्धेय पटेल भी। ऐसे ही समय मुझे याद आया कि नरहरि साहब ने स्व.महेश तिवारी नाट्य समारोह के लिये ना सिर्फ उत्साह से ‘नैश भोज’ जैसे नाटक में काम किया था बल्कि वे समारोह के लिये भीष्म पितामह की तरह खड़े रहे थे। यह बात और है कि यह समारोह आगे उस तरह से नहीं बढ़ सका जिसकी कल्पना थी।
(नीचे की तस्वीर में नाटक ‘नैश भोज’ में साथी कलाकारों के साथ नरहरि पटेल)
मालवी जाजम के ऑनलाइन प्रोग्राम में पाठ : एक कवि के रूप में सैकड़ों कवि सम्मेलनों और गोष्ठियों में अपनी रचनाएं पढ़ने वाले नरहरि जी अब कार्यक्रमों में बहुत कम जा पाते हैं। परंतु इस दीवाली पर ‘मालवी जाजम’ के ऑनलाइन प्रोग्राम में उन्होंने अपना एक गीत प्रस्तुत किया था। इसे अपने परिचित अंदाज़ में उन्होंने गाकर सुनाया। यह सुनते हुए मुझे लगा जैसे मैं 30 साल पहले के किसी कार्यक्रम में नरहरि साहब को सुन रहा हूं..
देखो कारी-कारी रात उजारी
देवला महिमा थारी न्यारी
चलो तो करोरी सजनिया
रूप थारो कोई चोरनी कमनिया
रूप की कर तू तो रखवाली
इस बेहतरीन शख़्सियत से हिन्दी और उर्दू ग़ज़लों के साथ ही मालवी लोक गीतों के लेकर भी कुछ अहम बातें हुईं। उन्होंने मालवी का एक गरबा गीत भी सुनाया। इन सारी बातों और यादों उन्हें फिर से नई ऊष्मा,ऊर्जा और रौनकों से भर दिया। मेरी शुभकामनाओं और दुआओं के बीच उन्होंने विदा लेते हुए कहा- ‘हम बहुत अच्छे यात्री हैं। अब एक अच्छे सफ़र के मोड़ पर हैं। हमारा मज़िल-ए-मक़सूद बहुत अच्छा है। हम कभी रोये नहीं ना किसी को रूलाया। इसके अलावा और क्या चाहिये? आदमी अच्छा रहे, ख़ुश रहे, ख़ुशी से चलता रहे..और अपनी मंज़िल पर पहुँच जाये..बस।’ https://indorestudio.com/

