जोश और जज़्बा जगाते रहेंगे, मोहम्मद रफ़ी के गाये देशभक्ति के गीत

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अजय बोकिल, इंदौर स्टूडियो। मोहम्मद रफ़ी ने वैसे तो हर किस्म के गीत गाए हैं। चाहे वो भजन हों या कव्वाली, रोमांटिक हों या विरह के गीत। परंतु देश भक्ति से जुड़े गीतों में भी उनका कोई सानी नहीं है। ‘कर चले हम फिदा, जानो तन साथियों या अपनी आज़ादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं, जैसे गीतों को सुनकर आज भी हम देशभक्ति के जज़्बे से भर उठते हैं। आज़ादी के अमृत महोत्सव के इस काल में आइये याद करते हैं इस महान गायक के कुछ ऐसे ही गीत।
ये ऐसे गीत हैं जो देश के प्रति अपना फर्ज निभाने के साथ इंसानियत का पाठ भी पढ़ाते हैं।- संपादक, इंदौर स्टूडियो।देश भक्ति का जज़्बा जगाते गीत: देश का कोई राष्ट्रीय पर्व या समारोह ऐसा नहीं है, जब मोहम्मद रफी के गाए देश भक्ति से भरे गीत सुनाई न देते हों। इस मामले में रफी सदियों तक याद किए जाते रहेंगे। मोहम्मद रफी की आवाज में अदम्य जोश, राष्ट्र के प्रति समर्पण भाव और वतन पर सब कुछ न्यौछावर कर देने का एक अलग ही जज़्बा दिखाई देता है। यही वजह रही कि संगीतकारों ने देशभक्ति के गीतों के लिये उनकी ही आवाज़ को तरजीह दी। देश भक्ति के गीतों में रफ़ी की आवाज़: अगर आंकड़ों पर जाएं तो बोलती फिल्मों के 90 सालों के इतिहास में जितने भी देशभक्ति गीत बने हैं, उनमें से सर्वाधिक 19 गीत रफी साहब ने गाए हैं। ये सभी कालजयी गीत हैं। राजनीतिक आग्रहों-दुराग्रहों से परे हैं और मातृभूमि के प्रति ऋणी एक आम भारतीय के ह्रदय से फूटने वाले गीत हैं। ये गीत उन अनमोल जज़्बों से भरे हैं, जो कभी खत्म नहीं होगा। चीन के हमले के बाद देशभक्ति की हुंकार: फिल्मी देशभक्ति गीतों के इतिहास पर नजर डालें तो ऐसे सबसे ज्यादा गीत रचे और गाए उस दौरान गए, जब 1962 में भारत पर चीन ने धोखे से हमला किया और पहली बार भारतीय सेना को शर्मनाक पराजय का मुंह देखना पड़ा। इनमें से अधिकांश को स्वर रफी साहब ने ही दिया था। यह कहना गलत नहीं होगा कि राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत इन गीतों ने उस वक्त देश और समाज में वही आत्मविश्वास जगाने की सफल कोशिश की, जो कभी मुगल काल के दौरान भक्ति कालीन कवियों ने की थी।कर चले हम फिदा, जानो तन साथियों : जरा लिस्ट उठाएं तो फिल्म ‘लीडर’ (1964) का अमर गीत ‘अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं…सर कटा सकते हैं, लेकिन सर ‍झुका सकते नहीं’,  ‘कर चले हम फिदा,जानो तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो फिल्म ‘हक़ीक़त’ (1964)। ‘जहां डाल डाल पर सोने की चिडि़या करती हैं बसेरा, वो भारत देश है मेरा’ फिल्म ‘सिकंदर ए आजम’ (1965)। ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ फिल्म ‘शहीद’ (1965)। मेरा रंग दे बसंती चोला, मेरा रंग दे: फिल्म ‘शहीद’ का रफी साहब के साथ अन्य गायकों का गाया गीत ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ और ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, आज भी लाजवाब है। भारत-चीन युद्ध के बाद देश में उपजी मानसिक हताशा और आक्रोश के मद्देनजर बॉलीवुड ने एक ‘नेशनल डिफेंस कमेटी’ का गठन किया था। इस कमेटी के तत्वावधान में मोहम्मद रफी साहब और साथियों की आवाज में दो यादगार गैर फिल्मी गीत रिकॉर्ड हुए थे। उन दोनों गीतों को जावेद अख्तर के पिता स्व. जां निसार अख्तर ने  लिखा था जबकि इनका संगीत खय्याम ने तैयार किया था। आवाज़ दो हम एक हैं, हम एक हैं: उन दिनों ये म्यूज़िकल डाक्युमेंट्री देश के सभी सिनेमाघरों में दिखाई जाती थी। रफी साहब की आवाज में ये दो गीत थे- ‘आवाज दो हम एक हैं तथा वतन की आबरू खतरे में है तैयार हो जाएंगे।‘ इसमें भी ‘आवाज दो हम एक हैं’ तो एक तरह से मार्चिंग सांग जैसा है। सुनते ही युवाओं की भुजाएं फड़कने लगें। इन गीतों का परोक्ष असर ही कहें कि तीन साल बाद 1965 में जब पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया तो भारतीय सेना ने उस युद्ध में विजय प्राप्त की। इसकी पराकाष्ठा 1971 के उस ऐतिहासिक युद्ध में हुई, जिसमें भारत ने न सिर्फ पाकिस्तान पर निर्णायक जीत हासिल की बल्कि धर्म आधारित राज्य की अवधारणा के दो टुकड़े भी कर दिए। बंगला देश का जन्म हुआ।हम हैं इसके मालिक, हिंदोस्ता हमारा: वैसे भारत में देशभक्ति गीतों आगाज 1857 में अजीमुल्लाह खान द्वारा लिखे उस गीत से माना जाता है, जो उन्होंने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय लिखा था। ‘पयाम ए आजादी’ नामक इस गीत थे ‘हम हैं इसके मालिक,हिंदोस्ता हमारा।‘ अजी़मुल्लाह खुद स्वतंत्रता सेनानी थे और अंतिम पेशवा नाना साहब द्वितीय के दीवान थे। वो अंग्रेजी, उर्दू और फारसी भाषा के ज्ञाता थे। नाना साहब पेशवा 1857 के अग्रणी नायकों में थे। अजीमुल्लाह खान का निधन स्वतंत्रता की पहली क्रांति के विफल हो जाने के 1 साल बाद 1959 में हो गया था। बाद में यह धारा और आगे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘आनंदमठ’ के प्रयाण गीत ‘वंदे मातरम्’ से और आगे बढ़ी। फिर आज का राष्ट्रगान और झंडा गीत आया। हम लाये तूफ़ान से कश्ती निकाल के: सिने संगीत में देशभक्ति भरे गीतों की शुरूआत तो आजादी से पहले ही हो गई थी, लेकिन सही स्वरूप स्वतंत्रता के बाद ही मिला। स्वतंत्र भारत में राष्ट्रप्रेम की ऐसी सांगीतिक शुरूआत 1948 में आई फिल्म शहीद’ के उस गाने से होती है, जिसमें मोहम्मद रफी ने गाया था ‘वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हों..। उसके बाद एक यादगार फिल्म ‘जागृति’ (1954) में मोहम्मद रफी का गाया – ‘ हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के’ तो एक ऐसा शाश्वत गीत है जो हर गुजरती पीढ़ी नई पीढ़ी के लिए गा सकती है। गाना चाहिए। इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा: 1957 में आई क्लासिक फिल्म ‘नया दौर’ में मोहम्मद रफी के गाए-‘ ये देश है वीर जवानों का‘ पर थिरके बिना कोई राष्ट्रीय पर्व तो क्या बारात धर्म भी पूरा नहीं होता। इसके बाद एक और सोद्देश्य फिल्म ‘धूल का फूल’1959 में आई। इसमें रफी का गाया एक गीत है- ‘तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा।‘ यह गीत मनुष्यता की सर्वोच्चता स्थापित करने वाला अमर गीत है। देश भक्ति से भरे गीत तो और भी आए मगर उनमें पहले जैसा जज़्बा कम ही नज़र आया। मसलन रफी साहब की आवाज में ही ‘मेरे देश में पवन चली पुरवाई फिल्म ‘जिगरी दोस्त।‘(1969)। ताकत वतन की हमसे है’ फिल्म ‘प्रेम पुजारी (1970)। वर्दी है भगवान, फौजी मेरा नाम’, फिल्म फौजी (1976) और ‘चना जोर गरम’‍ फिल्म क्रांति (1981)। 1980 में रफी साहब का निधन हो गया था।कला अवदान का विराट आकाश: मोहम्मद रफी के कला अवदान का आकाश बहुत विराट है। वो नवरसों को पूरी शिद्दत से अपने सुरों में अभिव्यक्त करने वाले महान गायक थे। फिर चाहे वो प्रेम गीत हो, भजन हों, नात हो कव्वाली हो, शांत रस और रौद्र रस से भरे गीत हों या हास्य रस से भरे गीत हों। शुद्ध शास्‍त्रीय गीत हो या ‍पश्चिमी धुनों पर आ‍धारित गीत हों, लोक संगीत से सजे गीत हो या फिर सितारों की ऊंचाई से स्पर्द्धा करते गीत हों, मोहम्मद रफी का कहीं कोई मुकाबला नहीं है। उम्दा गायक और एक बेहतरीन इंसान: न सिर्फ महान गायक बल्कि एक महान इंसान के रूप में भी लोग मोहम्मद रफी को शिद्दत से याद करते हैं। अपनी कला की बदौलत मिली शोहरत, इज्जत और पैसे को वो केवल ईश्वर की कृपा मानते थे। घमंड उन्हें छू भी नहीं गया था। गायकों को रॉयल्टी देने को लेकर लताजी से जो मतभेद उनके हुए थे, वो सैद्धांतिक थे। कम ही लोग जानते हैं कि उनकी दो शादियां हुई थीं। उनकी पहली पत्नी का नाम बशीरा बानो था। 1947 में देश के बंटवारे के बाद बशीरा ने भारत आने से इंकार कर दिया लेकिन रफी साहब ने नवोदित पाकिस्तान जाने से इंकार कर दिया। रफी साहब की दूसरी शादी बिल्किस बानो से हुई।बेटों को गायन में क्यों नहीं बढ़ाया: रफी साहब ने अपने बच्चों को संगीत के क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ाया। इस बारे में रोचक किस्सा है कि रफी साहब के दो बेटों में गायन की प्रतिभा थी। जिनके साथ बैठकर रफी कई बार रियाज किया करते थे। जब एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि फिल्म इंडस्ट्री में जब सभी अपने बेटो बेटियों को प्रमोट करते हैं तो आपने भी यह काम क्यों नहीं किया? क्योंकि बड़े होने पर उनकी तुलना में मेरे से होती और वो इसमें असफल रहते तो फ्रस्ट्रेशन का शिकार होते – रफी साहब का जवाब था। (संगीतकार कल्याणजी आनंदजी के साथ एक गीत की रिहर्सल)सिने-संगीत में गायकी का रफी स्कूल: रफी साहब का हिंदी फिल्मी गीतों का सफर 1945 में गाए पहले गीत ‘ऐ दिल हो काबू में’ (फिल्म ‘गांव की गोरी’) से हुआ। उसके बाद उन्होंने मुड़कर नहीं देखा। आरंभ में रफी स्वयं उस जमाने के महान गायक अभिनेता के.एल.सहगल को अपना आदर्श मानते थे। लेकिन जल्द ही रफी की अपनी गायकी खिली और सिने संगीत में गायकी का रफी स्कूल ही बन गया, जिसे आज भी कई लोग फॉलो करते हैं। देशभक्ति गीतों से हटकर रफी द्वारा 1966 में (फिल्म ‘सूरज’) गाया गया ‘बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है’ तो ऐसा अमर विवाह गीत है, जिसके बिना उत्तर भारत ‍पश्चिमी में कोई शादी पूरी नहीं होती।रफी साहब की याद में संग्रहालय: गायक मोहम्मद रफी की याद में देश में कई संग्रहालय बने हैं। देश के कानून राज्य मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने पिछले साल पंजाब में अमृतसर के पास मोहम्मद रफी के पैतृक गांव कोटला सुल्तानसिंह में रफी साहब के याद में संग्रहालय स्थापित करने की घोषणा की थी। निजी तौर पर ऐसा संग्रहालय रफी साहब के बेटे सबसे छोटे बेटे शाहिद रफी ने अपने निवास मुंबई में स्थापित किया है। इसका नाम मोहम्मद रफी अकादमी है। शाहिद ने अपने मरहूम पिता मोहम्मद रफी पर एक किताब ‘मोहम्मद रफी वायस ऑफ नेशन’ भी लिखी है। शाहिद रफी के पुत्र फुजैल रफी ने अपने दादा की याद में अनूठा ‘वर्चुअल 3 डी रूमऐ के रूप में स्थापित किया है। उनकी याद में एक संग्रहालय केरल के कोजीकोड में मोहम्मद रफी फाउंडेशन स्थापित किया है। निजी तौर पर दिल्ली में अरूण गौतम और भोपाल में रफी की आवाज के दीवाने मंसूर अहमद फारूकी का भी अनूठा संग्रहालय है। (गीता दत्त के साथ गायक रफ़ी) दिलों पर राज करने वाले कलाकार: मोहम्मद रफी जितने बड़े गायक थे, उस तुलना में सरकार ने उन्हें वैसे सम्मानों से नहीं नवाजB%E, जिसके वो सही मायनों में हकदार थे। रफी साहब जनता के दिलों पर राज करने वाले कलाकार रहे। उन्हें भारत रत्न जैसा सबसे बड़ा अवाॅर्ड बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था। लेकिन इसके लिए कभी किसी ने राजनीतिक लॉबिंग नहीं की। अकेले रामविलास पासवान ऐसे नेता थे, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से मोहम्मद रफी को भारत रत्न देने की मांग की थी। हालांकि उन्हें 1967 में पद्मश्री सम्मान और 6 बार फिल्म फेयर अवॉर्ड सहित कई पुरस्कार मिले। लेकिन रफी साहब का अवदान इससे कहीं बहुत ज्यादा है। आज 43 बरस बाद भी वो रूहानी आवाज हरदम हमारे साथ है। हर दु:ख में हर सुख में। उनकी हर बरसी या जन्म दिवस रफी के चाहने वालों के शहर-शहर पचासों संगीत के आयोजन होते हैं। सोशल मीडिया पर उनकी पोस्ट का सैलाब सा आ जाता है। (लताजी के साथ गायक मोहम्मद रफ़ी) रफी भैया महानतम् पार्श्व गायक थे: भारत रत्न स्व. लता मंगेशकर ने मोहम्मद रफी को श्रद्धांजलि देते हुए कहा था- ‘रफी भैया न केवल भारत के महानतम् पार्श्वगायक थे बल्कि वो लाजवाब इंसान भी थे। उनकी आवाज की रेंज उनके समय के किसी दूसरे गायकों से बढ़कर थी, फिर चाहे वो मैं हूं, आशा हो, मन्ना दा हो या किशोर भैया।‘ 24 दिसंबर 2023 से इस महान् गायक का जन्म शताब्दी वर्ष शुरू होगा। एक बार फिर उनकी याद का उत्सव शुरू होगा, बरसों से की जा रही इस माँग के साथ कि क्या रफी साहब को उनके कला अवदान के अनुरूप भारत रत्न होने का सच्चा और सर्वोच्च मान हासिल होगा। अनेक मंचों से बरसों से यह बात उठाई जा रही है मगर अब तक इस सच्चे, देशभक्त और नेकदिल कलाकार को उसका हक़ नहीं मिल सका है। क्या वह कभी मिलेगा? (तलत मेहमूद के साथ रफ़ी की तस्वीर)(लेखक अजय बोकिल वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार एवं संपादक हैं। आप प्रासंगिक विषयों पर लेखन के साथ ही कला-संस्कृति और सिनेमा पर अपने विशिष्ट लेखों के लिये पहचाने जाते हैं।) आगे देखिये, इंदौर के राऊ में बने ‘लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय’ पर शकील अख़्तर की विशेष वीडियो रिपोर्ट – तुम्हें याद करते-करते।

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