कभी वो बाबू बुला रही, कभी शोना बुला रही है,
मुझे बचपन में भेजकर, फिर से बच्चा बना रही है।
इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। कुमार देशबंधु की ये वो रोमानी कविता है जिसने सुनने वालों को रोमानी अहसास भी दिया और नये ज़माने के लव बर्ड्स के जज़बाती अंदाज़ का मज़ा भी। लाइव पोएट्री का ये यादगार आयोजन इंदौर के रिफ्टिंग कल्ट कैफ़े में हुआ। कार्यक्रम में न केवल इंदौर ,उज्जैन, भोपाल, खंडवा, देवास के 30 से अधिक युवा कवियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य युवा प्रतिभाओं को मंच प्रदान करना था। कार्यक्रम का आयोजन और संचालन का कुमार देशबंधु ने ही किया। वे भोपाल के जाने-पहचाने स्टेज परफॉरमर हैं। पढ़िये इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम की इस रिपोर्ट में इस आयोजन में शामिल कुछ रचनाकारों की कविताएं।

अवधेश शर्मा ‘ध्रुव’ ने इस युवा कवियों के बीच आज के फैशन में पुरानी चीजों को भूलने पर ग़ज़ल पढ़ी।
बादलों ने बरसना छोड़ दिया।
चिड़ियों ने चहकना छोड़ दिया।
कीमत लगी जब से फूलों की,
कलियों ने खिलना छोड़ दिया।
नहीं रहा जब मनाने वाला,
उसने भी रूठना छोड़ दिया।
खुले बालों का फैशन आया,
जुल्फों ने लटकना छोड़ दिया।
मोबाइल से बहुत खुश हैं बच्चे,
खिलौनों पर मचलना छोड़ दिया।
कार्यक्रम में पहली बार परफॉर्म कर रही उज्जैन से आई रुद्राक्षी पाण्डेय ने बेटी का दर्द अपनी कविता में बयान किया-
काश मै लड़का होती माँ, मुझे यूँ हीं लड़की बना दिया।।
मुझे पराया धन और भाई को घर का चिराग बता दिया।


दीपक मालवीय ने पढ़ा-
बर्फ पिघल जाती, है सो पानी को पानी रहने दे,
तिरंगा हमको प्यारा, दूजे झंडे जानी रहने दे,
क्या हूँ, क्यूँ हूँ, ये बातें दुनिया आखिर क्यूँ पूछ रही,
जात धरम ईमान मेरा, तू हिंदुस्तानी रहने दे।”
अभिषेक नेमा ने सावन के दूसरे सोमवार पर कहा,
उम्मीदों का सावन आया, माटी से अंकुर फूटे हैं।
नेह समेटे कारे बदरा, गरज भयंकर टूटे हैं।।
कांवड़ियों ने भांग छान ली, बम बम भोले स्वर की गूँज
महाकाल के दर पे धर दी, ले जा के रेवा की बूँद
त्योहारों का चढ़ा कलेवर, घर आँगन कोना चहका।
बहिन सावनी लेकर आई, पीहर है महका महका।।
कलम चल पड़ी कविता गढ़ने, शब्द अनायस छूटे हैं।
उम्मीदों का सावन आया, माटी से अंकुर फूटे हैं।।”


महेंद्र सिंह पंवार टूटे प्रेम की पीढ़ा व्यक्त की –
बस उसकी याद साथ है, मैं दु:ख मनाऊंगा,
ये क्या खुशी की बात है, मैं दु:ख मनाऊंगा।
शादी हुई है आज ही, उसकी रकीब से,
मातम की पहली रात है, मैं दु:ख मनाऊंगा।
मधु रानेजा ने परिंदों की गुम होती उड़ान को लेकर इंसानी हक़ीक़त पर तंज़ किया-
घरों में वो हमारे नहीं, बल्कि हम उनके घुसने लगे हैं,
अब परिंदे झुँड में नहीं, बल्कि अकेले दिखने लगे हैं।

कान्हा रघुवंशी ने पढ़ा –
मैं जो हूं उसकी आंखों में क़ैद हूं
लोग ढूंढते फिर रहे मुझे ज़माने में।
शुभम चौबे ने पढ़ा-
वह सौदा जज़्बातों का मेरे इस कदर करता है,
छोड़कर बात खुद की ज़िक्र जमाने का करता है।
पार्थ भगत, डॉ अखिलेश, रिशीष, कुणाल, ऋषभ, अवनीश, राजा पाल, मनीष गंगा, गौरव, अक्षय, नितेश आदि ने भी बहुत बेहतरीन रचनाएँ पेश की। आखिर में आभार कुमार देशबंधु ने माना।तस्वीरें: चिंटू सिसोदिया (ब्राइट फोटो ब्लॉग)।

