रवींद्र त्रिपाठी, इंदौर स्टूडियो। रवींद्रनाथ ठाकुर और कादम्बरी देवी के अमर रिश्तों पर आधारित नाटक है ‘कादम्बरी’। नाटक स्मृतियों के एक अलग भाव बिंदू को छूता है। इस बात की तरफ़ ध्यान खींचता है कि क्या कलाकार की स्मृतियाँ उसके सृजन की प्रेरणा बनी रहती हैं? ‘मेटा 2026’ में इस नाटक का मंचन हुआ। इसका निर्देशन मेघना रॉय चौधरी ने किया है। नाटक में इप्शिता चक्रवर्ती सिंह को मुख्य भूमिका ‘कादम्बरी’ में अभिनय के लिये पुरस्कृत भी किया गया है।
25 साल की उम्र में हो गया था निधन: कादम्बरी देवी, महान् कवि रवींद्रनाथ ठाकुर की भाभी थीं। उनका निधन महज़ 25 साल की उम्र में हो गया था। उनमें और रवींद्रनाथ में एक खास तरह का रिश्ता बन गया था। कहा जा सकता है कि कादम्बरी देवी रवींद्रनाथ की प्रेरणा थीं, लेकिन क्या वे आजीवन उनकी प्रेरणा रहीं—उनके निधन के बाद भी? नाटक इसी दिशा में बढ़ता है और अपनी स्मृतियों के साथ एक अलग भाव बिंदु को छूता है।
क्या कादम्बरी ही ‘चारुलता’ हैं: यह माना जाता है कि रवींद्रनाथ ठाकुर ने ‘नष्ट नीड़’ नाम की जो कहानी लिखी थी, वह कादम्बरी देवी के जीवन और मृत्यु को लेकर ही थी। सत्यजीत राय ने इसी पर ‘चारुलता’ नाम की फिल्म भी बनाई थी। नाटक के दौरान सहृदय दर्शक बार-बार यह महसूस करते हैं कि यहाँ चारुलता और कादम्बरी देवी का भेद मिट जाता है। यह एक ‘स्मृति नाटक’ भी है, जिसमें रवींद्रनाथ अपने जीवन के अंतिम चरण में भी कादम्बरी देवी को याद किए हुए हैं। कुछ यादें हैं जो बार-बार आती हैं और मथती हैं। क्या आखिरी दिनों में भी कादम्बरी देवी बार-बार रवींद्रनाथ की चेतना में दस्तक देती हैं? नाटक में भी और शायद वास्तविक जीवन में भी।
पात्रों का जीवंत अभिनय और मिथकीय संदर्भ:कादम्बरी देवी की भूमिका इप्शिता चक्रवर्ती सिंह ने निभाई है, जबकि रबि बाबू की भूमिका में ऋषभ कांति नज़र आए। चारुलता के रूप में प्रियंका चौधरी और अमल (जिसे चारुलता में रवींद्रनाथ का ही प्रतिरूप माना जाता है) के रूप में आयुष ठाकुर ने प्रभावी अभिनय किया है। मृत्यु को भी दो किरदारों—पुरुष और स्त्री—के रूप में दर्शाया गया है, जिन्हें अभिजित विक्रम सिंह और अदिति ने निभाया है।
ग्रीक मिथक कथा का भी इस्तेमाल: निर्देशक मेघना रॉय चौधरी ने उस ग्रीक मिथक कथा का भी इस्तेमाल किया है, जिसमें ऑर्फियस और यूरीडिस (Eurydice) के बीच प्रेम और प्रेरणा का प्रसंग आता है। कादम्बरी देवी क्या वही यूरीडिस थीं, जो रवींद्रनाथ को कला-कर्म में रमने और रचने के पीछे सक्रिय रही हैं? जब वे जीवित थीं तब भी और इस जगत में न रहने के बाद भी? रवींद्रनाथ ने अपने जीवन के आखिरी वर्षों में पेंटिंग शुरू की थी। इस नाटक में उनका यह पहलू दिखता है, जहाँ वे कैनवास पर एक नारी आकृति बनाते हैं। क्या वह कादम्बरी की ही आकृति थी?
स्मृतियों में बिंधा एक कलाकार: मेघना रॉय चौधरी ने बांग्ला कवि के जीवन के उस पहलू को सामने लाया है, जो चर्चा और शोध का विषय रहा है। यहाँ निर्देशक की तारीफ करनी होगी कि वे इस नाटक को व्यक्ति विशेष से आगे ले जाकर उस भाव बिंदु पर पहुँचा देती हैं, जहाँ लगता है कि कोई कलाकार उस याद में हमेशा बिंधा रहता है जो उसके साथ जीवन के किसी मोड़ पर घटित हुआ था। नाटक में सिर्फ यह महत्वपूर्ण नहीं है कि उनके बीच आरंभिक दौर में क्या हुआ था, बल्कि यह भी है कि उस घटना से एक कवि-कलाकार आजीवन कैसे आप्लावित रहा। क्या ‘घरे बाइरे’ की विमला या ‘स्त्रीर पत्र’ की मृणाल में भी कादम्बरी देवी का ही अक्स था?
गीत को मिला नया आयाम: नाटक में रवींद्रनाथ का एक प्रसिद्ध गीत आता है—‘तोबू मोने रेखो जोदि दूरे जाइ छोले’ (दूर भी चली जाऊँ तो याद रखना)। हिंदी समाज में आम धारणा है कि रवींद्रनाथ कह रहे हैं कि ‘मुझे याद रखना’, लेकिन नाटक देखने के बाद यह एहसास होता है कि कादम्बरी देवी कह रही हैं— ‘यदि दूर भी चली जाऊँ तो मुझे याद रखना’। मेघना ने इस गीत को एक नया आयाम दे दिया है।
प्रभावी तकनीकी पक्ष और प्रयोग: ‘कादम्बरी’ में प्रकाश व्यवस्था और संगीत का पक्ष बेहद प्रभावशाली है। चारुलता के प्रसंग में पुतली कला (Puppetry) की तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जो इब्सन के ‘डॉल्स हाउस’ की याद दिलाता है। क्या कादम्बरी देवी या चारुलता परिवार में एक पुतली की तरह थीं? नाटक में हिंदी, बांग्ला और अंग्रेजी तीन भाषाओं का प्रयोग है। यह नाटक बहु-प्रसंगों से युक्त है, जिसमें रवींद्रनाथ का जीवन भी है और फिल्म ‘चारुलता’ का संदर्भ भी। यह एक अभिनव प्रयोग है, जिसका पूर्ण आस्वाद इसे गहराई से जानकर ही लिया जा सकता है। (लेखक रवींद्र त्रिपाठी जाने-पहचाने पत्रकार होने के साथ ही, प्रख्यात फिल्म और कला समीक्षक, फिल्ममेकर और नाटककार हैं।) आगे पढ़िये – शब्दों के पार, यादों का संसार: ‘Y’ What Refuses to fade! https://indorestudio.com/y-what-refuses-to-fade-theatre-review-meta-2026/
कादम्बरी: क्या कलाकार की स्मृतियाँ उसके सृजन की प्रेरणा बनी रहती हैं?
RELATED ARTICLES

