इंदौर स्टूडियो डॉट कॉम। हिंदी कहानी अपने समय का दस्तावेज होती है। आज की कहानी में भी वही स्थिति है। समय के तनाव, उसके विघटन को उजागर करती है। अगर हम प्रेमचंद की कहानी पढ़ रहे हैं तो इसका मतलब है कि हम प्रेमचंद के समय को देख रहे हैं। समय के साथ जो बदलाव हो रहे हैं वो सार्वभौमिक बदलाव नहीं है। गांव का शहर का बदलाव अलग अलग है। इसलिए हम कई परिवेश की कहानी इस समय में पढ़ रहे हैं। कहानी में हमें चिंता होना चाहिए कि क्या हम समय का दर्द लिख रहे हैं। इंदौर लिटरेचर फेस्टिवल 2019 में कहानी की भूमिका, उसकी भाषा और उसके खुलेपन को लेकर चर्चा हुई। सत्र में कहानीकार मनीष वैद्य, प्रशांत चौबे, डॉक्टर गरिमा दुबे, कविता वर्मा, राज बोहरे, किसलय पंचोली ने चर्चा की।
कहानी में कल्पनाशीलता और अनुभव का संतुलन होना चाहिए : कोई भी कहानी आधी हकीकत, आधा फसाना होना चाहिए। पूरी कल्पना से कहानी ख़त्म हो जाएगी और पूरी हकीकत भी कहानी को खत्म कर देगी। इसमे संतुलन होना चाहिए।
कहानीकार का स्टारडम चिंता का विषय है : प्रशांत चौबे ने कहा यह विडंबना है कि अब हर चीज़ कमर्शियल हो गई है, किताबों की दुनिया में भी बेस्ट सेलर कॉन्सेप्ट आ गया है। हो सकता है कि कोई अच्छी किताब हो लेकिन वो बेस्टसेलर में नहीं है तो पाठक तक नहीं पहुँच पाती है। यह चिंता की बात है। इसलिए साहित्य की चिंता करना चाहिए, उसकी सेवा करना चाहिए।
कहानी में जरूरत के मुताबिक खुलापन होना चाहिए : मनीष वैद्य ने कहानी के खुलेपन के बारे में कहा कि
हमारे समाज मे जो खुलापन आया है वो सिर्फ साहित्य में ही नहीं, सिनेमा के साथ और भी क्षेत्रों में आया है, इसलिए सिर्फ साहित्य से ही गरिमा में रहने की अपेक्षा क्यों जाती है। हालांकि जानबूझकर खुलापन लाना कहानी के लिए भी हानिकारक है।
हर भाषा में अच्छा साहित्य हो सकता है : गरिमा दुबे ने कहा कि सिर्फ अंगेरजी से मेरी कहानी अच्छी हो गई ऐसा नहीं है, किसी भी भाषा में आप बहुत अच्छा लिखा सकते हैं। जैसे संस्कृत में लिखी हर बात धर्म या श्लोक नहीं होती, वैसे ही अंग्रेज़ी में लिखी हर बात साहित्य नहीं होती। अंग्रेज़ी में भी कचरा फैला हुआ है।

