सफ़दर शामी, इंदौर स्टूडियो। प्रभु जोशी जी से मेरा परिचय लगभग चार दशक पहले तब हुआ जब मुझे कला में रुचि
तो थी, समझ नहीं थी। प्रभु जी के पास अक्सर जा कर बैठने का वास्तविक कारण, उन से कला के बारे में चर्चा करने का लालच ही हुआ करता था। चित्रकला के प्रति उनके विशिष्ट दृष्टिकोण और गहन अध्ययन की वजह से हम कलाकारों में उनका एक अलग ही स्थान रहा। बड़ी बात ये है कि उनमें कला और कलम दोनों का संगम था। दोनों विधाओं में वे मुकम्मल थे। न वे चित्रकार से थोड़े कम लेखक थे, न लेखक से ज़रा भी कम चित्रकार। चूँकि मैं चित्रकारी के साथ यदा-कदा लिखता रहता हूँ। मैं जब भी कुछ लिखता या पेंटिंग बनाता, पहले प्रभु जी को अवश्य दिखाता। उनसे कुछ न कुछ अच्छे सुझाव मिलते। उनके चले जाने के बाद आज मेरे चित्र और शब्द मुझे कुछ अधूरे मालूम पड़ते हैं। उनमें प्रभु दा की कमी मुझे खलती रहेगी।
जलरंग था प्रभु जी का प्रिय माध्यम: प्रभु जोशी जी का प्रिय माध्यम जलरंग था । भारतीय परिदृश्य में देखें तो जलरंग में चित्रण का एक पारंपरिक और प्रचलित तरीक़ा रहा है। श्यामल दत्त रे, परेश मैती, समीर मंडल जैसे चित्रकारों ने बहुत ही अद्भुत कार्य जलरंग में किया है। महाराष्ट्र और बंगाल के कईं नवोदित कलाकार इस माध्यम में बहुत उम्दा काम कर रहे हैं। हालांकि अधिकांश कलाकारों का जलरंग का ट्रीटमेन्ट पारंपरिक ही है मगर रचनात्मकता के स्तर पर नयापन और निजता अवश्य है। प्रभु जी ने जलरंग का उपयोग नए और निजी ढंग से किया है। जलरंग के बरतने का प्रयोगात्मक तरीक़ा ही उनके दृष्टिकोण में मौलिकता दर्शाता है।
चित्रों का मुख्य विषय भी प्रकृति था: दृश्य चित्रण और व्यक्ति चित्रण हमेशा से चित्रकारों के प्रिय विषय रहे हैं। प्रभु जी के चित्रों का मुख्य विषय भी प्रकृति ही था। लेकिन प्राकृतिक दृश्यों को जस का तस चित्रित करने के लिए आवश्यक कलात्मक कौशल के बावजूद वह भौतिक दृश्य की प्रतिलिपि मात्र से अधिक नहीं होते। लिहाज़ा किसी स्थान विशेष के सीधे चित्रण की बजाय, प्रभु जी की कृतियां, स्मृतियों में बसे हुए दृश्यों की सृजनात्मक प्रस्तुतियां होती थीं। अन्य रंग माध्यमों की तुलना में जलरंग जैसे तरल माध्यम की यह विशेषता भी है कि उसके स्वभाविक मगर नियंत्रित बहाव से जो आकस्मिक प्रभाव पैदा होता है वह भी कलाकृति की रचनात्मकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रभु जी काग़ज़ पर रंगों के रखने और छोड़ने से ऐसा प्रभाव पैदा करते थे कि उस में एक प्राकृतिक दृश्य निर्मित होता था।
लैंडस्केप मात्र लैंडस्केप नहीं: एक स्थान विशेष के चित्र की सीमाओं से बाहर, भिन्न-भिन्न व्यक्ति के लिए भिन्न भिन्न अनुभूति देते ये चित्र लैंडस्केप हो कर भी मात्र लैंडस्केप नहीं हैं। क्योंकि इस में कल्पनाशीलता है, प्रयोग है, रचनात्मकता है, अमूर्तता है। नतीजतन ये कृतियां प्रभु जी के निर्मित किए हुए निजी संसार में ले जाते हैं। प्रभु जी के इस अलौकिक संसार को निहारते हुए, फ़्रेम से बाहर खड़े दर्शक के अलावा वहां कोई दूजा नहीं होता। उनका ये सुंदर संसार नितांत निर्जन संसार होता है। जैसे इंसानी मौजूदगी से इरादतन इसे अछूता रखा गया हो, कि उसका वहां होना प्रकृति के सौंदर्य को नष्ट करने के प्रतीक का होना है। (मुंबई में प्रभुदा और गुलज़ार के साथ सफ़दर शामी।)
चित्रकार की महानता पर प्रभु जोशी ने की थी तल्ख़ टिप्पणी: चूंकि कला और क़लम दोनों पर प्रभु जी का समान अधिकार था। इसलिए कला पर उनका लिखना स्वाभाविक था। प्रभु जोशी जी ने अपने एक आलेख में लिखा था “आज की लज्जास्पद सच्चाई है कि किसी चर्चित कला संग्राहक, कला दीर्घा या संस्थान से जुड़े बग़ैर कोई चित्रकार केवल अपनी कला की उत्कृष्टता के बल पर महान हो ही नहीं सकता। इन संस्थाओं और इन से जुड़े लोगों ने कला के दर्शक पैदा नहीं किए, चित्र के पाठक पैदा किए। यानी चित्र को देखकर नहीं, उस के बारे में पढ़कर जानिए कि वह कितनी महान कृति है। एक चर्चित चित्रकार से पूछा जाए तो वो कहेगा, मेरे पेंटिंग्स फ़लां गैलेरी ने लिए हैं या फ़लां समीक्षक ने मुझ पर लिखा है। ये ऐसी स्थिति है, मान लीजिए, एक घोड़ा खड़ा है। उसका मूल्य पचास लाख है। उस के सामने घास पड़ा है। उसका मूल्य पचास रुपए है लेकिन घोड़ा जैसे ही घास को उदरस्थ करता है, घास का मूल्य घोड़े के मूल्य के बराबर हो जाता है।” नतीजे में आज कुशल चित्रकार की जगह बिकने योग्य चित्रकार बनने के लिये कलाकारों की संख्या बढ़ती जा रही है।
प्रभु जोशी ने अपनी कला को महान बनाया: कला के साथ विचार और दर्शन को जोड़ने का चलन कला को दृष्टव्य की परिधि से ख़ारिज कर देती है। यह बोधगम्य बनाने की व्यवसायिक चेष्टा की तरह है। हालांकि कोई भी श्रेष्ठ कलाकृति अपने प्रत्येक दर्शक से उसकी सोच के स्तर, उस की भावनाओं और अनुभव के अनुरूप रिश्ता क़ायम करती है। किसी उत्तम कलाकृति की संप्रेषणीयता इतनी भर है कि वह अपने दर्शक से नि:शब्द संवाद स्थापित करती है। क्योंकि शब्द… चित्र के विस्तार और दर्शक की कल्पनाशीलता दोनों को सीमित कर देते हैं। यही कारण है कि समृद्ध भाषा के बावजूद प्रभु जोशी जैसे चित्रकार ने अपनी कला को भाषा के ज़रिए महान बताया नहीं, महान बनाया है।
ग़ैर मामूली प्रतिभा का नकारात्मक पहलू : प्रभु जी के निकटता के कारण एक बात का शिद्दत से अनुभव हुआ कि कभी-कभी ग़ैर मामूली प्रतिभा भी किस हद तक ईर्ष्या को दावत दे सकती है। जब किसी प्रतिभाशाली रचनाकार के समक्ष स्थानों और प्रभावशाली पदों पर बैठे, कला की गतिविधियों को नियंत्रित कर रहे लोगों को यह कैसे स्वीकार होगा कि उनकी सहायता के बिना भी कोई महान हो जाए। वैसे भी आत्मनिर्भर और मौलिक कलाकार को नकारात्मकता हताश नहीं करतीं बल्कि चुनौती की ऊर्जा और बढ़ा देती है। इसीलिए प्रभु जी अपनी रचनात्मक निरंतरता को ही अपना प्रतिशोध मानते थे। मगर अपने काम के प्रति आश्वस्त प्रभु जी का मानना था कि इतिहास की छलनी सतही काम को छान कर कूड़ेदान में पहुंचा ही देती है। निंदा और उपेक्षा के रोग से ग्रसित जमात से अलग, देश के पहली पंक्ति के लेखक और चित्रकार प्रभु जोशी के काम के महत्व को जानते भी थे और मानते भी थे। 1994 में जब मैं इंदौर से मुंबई आया तो प्रभु जी के संबंधों के कारण ही संघर्ष के आरंभिक दिनों में मुझे टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, नवभारत टाइम्स और जनसत्ता जैसे समाचार पत्रों में फ्रीलांस आर्टिस्ट के तौर पर काम मिलने लगा।
सहयोग करते रहना उनका स्वभाव था: प्रभु जी हर किसी की सहायता के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। फिर वह चाहे लेखक हो या चित्रकार। सहायता भी केवल सुझाव की हद तक नहीं, बल्कि संशोधन और बदलाव की हद तक भी। इंतेहा तो यह है कि आवश्यकता पड़ने पर किसी कलाकार के लिए स्वयं पेंटिंग्स तक बनाई हैं। मेरे बचपन के एक मित्र का अपने ग़ुरबत के दिनों में अक्सर प्रभु दा के घर जाने और यदा-कदा रात रुकने का संयोग होता था। प्रभु दा रात में चुपके से उनकी जेब में कुछ पैसा रख दिया करते थे। आज वह मित्र अपने क्षेत्र में बहुत सफल और संपन्न है। ऐसे और कईं लोग हैं जो आज अपने अपने मैदानों में स्थापित हैं लेकिन अपने कठिन दिनों में प्रभु दा की बेलौस मदद को कभी फ़रामोश नहीं कर सकते। उनके व्यक्तित्व में ही कुछ ऐसा आकर्षण और आत्मीयता थी कि उनसे मिलने का मोह मुझे भी बना रहता था। बहुत ही कम ऐसा हुआ होगा कि आदरणीय अनीता भाभी जी ने खाना खाए बग़ैर वापस आने दिया हो। मुझे तो ख़ैर प्रभु दा अपना छोटा भाई मानते थे मगर उनके जानने और चाहने वाले अन्य लोगों के लिए भी प्रभु दा और भाभी की ख़ातिर वैसी ही हुआ करती थी।
जलरंग की तरह तरल और सरल थे प्रभु: दरअसल प्रभु दा स्वयं आर्थिक संघर्ष के दौर से गुज़रते हुए यहां तक पहुंचे थे इसलिए वे दूसरे कलाकारों की ज़रूरतों और दिक़्क़तों को अच्छी तरह समझते थे। लिहाज़ा आकाशवाणी और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से लेखकों और चित्रकारों को पहचान और पैसा दिलाने की कोशिश उन्हें अपनी नैतिक ज़रूरत की तरह लगती थी। सच तो यह है कि प्रभु दा का स्वभाव ही उनके पसंदीदा माध्यम जलरंग की तरह तरल और सरल था। हर एक व्यक्ति, निजी जीवन से लेकर व्यवहारिक जीवन तक कभी न कभी सुख दुख की परिस्थितियों से दो-चार होता ही है। ज़ाहिर है प्रभु दा भी इससे अछूते नहीं रह सकते थे। तनाव और परेशानियों से गुज़रने वाला कोई भी व्यक्ति अपने किसी आत्मीय और विश्वसनीय मित्र के साथ ही अपना दुख साझा करता है। सौभाग्यवश प्रभु दा के लिए ऐसे ही निकटतम व्यक्तियों में मैं भी एक था। स्वभावतः संवेदनशील कलाकार जब विपन्न परिस्थितियों से गुज़रते हैं तो उनकी रचनात्मकता बाधित हो जाती है। प्रभु दा की भी काम की गति किसी हद तक प्रभावित अवश्य हुई मगर निरंतरता बरक़रार रही। किसे पता था कि एक महामारी उनकी रचनात्मक प्रक्रिया को बाधित ही नहीं करेगी बल्कि पूर्ण विराम लगा देगी।
(सफ़दर शामी देश के प्रख्यात चित्रकार, लेखक और समीक्षक हैं। मुंबई में रहते हैं। मालवा से उनका पुश्तैनी नाता है।)
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