शकील अख़्तर,इंदौर स्टूडियो। वे चलते-फिरते कला या साहित्य से जुड़े किसी विषय विशेष पर यादगार अंक निकाल सकते थे। कमसेकम समय में कला से जुड़े आयोजन कर सकते थे। हंसते-मुस्कुराते दुनिया के किसी साहित्यकार की जानकारी दे सकते थे। किसी किताब का कोई अंश या किसी कवि की कोई विशिष्ट रचना सुना सकते थे। वे पत्रकारिता और साहित्य का विरल मेल थे। उन्होंने बहुत सी गहरी और मार्मिक कविताएं लिखीं, उन जैसे व्यक्तित्व की अब यादें ही बाक़ी हैं। ये राकेश श्रीमाल थे, रचनात्मक ऊर्जा से भरपूर, विलक्षण कलमकार, कला और साहित्य का छापाखाना।(दिल्ली के रंगायन केंद्र में राकेश श्रीमाल के कविता पाठ से ठीक पहले की तस्वीर। साथ में सीरज सक्सेना और हफीज़ ख़ान)
कला और साहित्य पर राकेश श्रीमाल की चलती थी धारा प्रवाह कलम: पत्रकारिता में रहते हुए मेरा यह सौभाग्य रहा कि मुझे बहुत से दिग्गज पत्रकारों और संपादकों के साथ ही बेहतरीन लेखकों के साथ काम करने या पढ़ने-लिखने का अवसर मिला। इनमें कुछ ऐसे लेखक देखे जो लेखन की फैक्ट्री जैसे थे। इनमें दिग्गज साहित्यकार,संपादक स्व.डॉ.प्रभाकर माचवे सबसे ऊपर हैं। वे विषय बताते ही फुल स्केप काग़ज़ पर आँखों के सामने तेज़ गति से लेख लिखकर दे देते थे। राकेश श्रीमाल भी कुछ इसी तरह के छापाखाना थे। वे कहीं भी, कभी भी कला और साहित्य से जुड़े विषयों पर धारा प्रवाह लिख देते थे। चलते-फिरते उन्हें मैंने कला आयोजनों की समीक्षायें, ख़बरें या लेख लिखते देखा था। बहुत बार मुझे हैरानी होती कि राकेश भाई इतनी तेज़ी से कैसे लिख लेते हैं।
(तस्वीर में राकेश श्रीमाल के साथ डॉ.पकंज शर्मा और वाज़दा ख़ान और लेखक)
बिजली जैसी गति वाला कला पारखी दिमाग़: राकेश जी की बड़ी बात उनका बिजली जैसी गति से दौड़ने वाला कला पारखी दिमाग़ था। ऐसी सूक्ष्म दृष्टि वाला मानस जो वो सब देख लेता है,जो हमें देखकर भी नज़र नहीं आता। वे बातों-बातों में ही किसी भी कला विशेषांक की पूरी कल्पना और उसका खाका तैयार कर लेते थे। वह भी साधारण नहीं, ऐसा विरल जो बहुत गहरा,शोधपूर्ण और दूरगामी भी हो। मैं यह बातें ज़्यादा गहराई से इसलिये भी समझ सकता हूं क्योंकि मैंने बरसों समाचार पत्रों में फीचर पन्नों का काम संभाला है। अपनी रातों की नींद हराम की है। इसी बेचैनी में कि हे भगवान, कल सुबह के चार पृष्ठों पर अब क्या छापेंगे? मुझे यह सब वर्षों में समझना और सीखना आया। मामला जब कला या साहित्य या कुछ अलग किस्म के फीचर सामग्री से जुड़ा हो तब मुझे राकेश श्रीमाल जादू की छड़ी की तरह लगते थे।
(दिल्ली में सीरज सक्सेना और राकेश श्रीमाल के साथ यादगार पल। तीनों ही अपनी प्रकाशित पुस्तकों के साथ)
पलक झपकते कलात्मक पोस्टर,निमंत्रण तैयार कर देते: इंदौर में मेरा उनके साथ बड़ा आत्मीय साथ रहा। तब भी जब वे इस जीवंत शहर में कला आयोजनों को अपनी तरह से गति दे रहे थे। वे किसी भी कला प्रदर्शनी,साहित्य,संगीत की गोष्ठी में पहुंचते। उसपर बड़ी आसानी से अपनी बात लिखकर छपने के लिये दे देते। एक दौर ऐसा भी रहा, जब हम इंदौर की कथक डांसर स्व.सविता गोडबोले के आड़ा बाज़ार वाले घर पर अक्सर मुलाकात करते थे। ताई ‘लयशाला’ नाम की संस्था के आयोजन उनके साथ ही मिलकर किया करती थीं। राकेश जी पलक झपकते ही उसके पोस्टर,निमंत्रण पत्र आदि कलात्मक ढंग से तैयार कर देते थे। उनमें ऐसे शब्द की लय बरसाते कि हम चमत्कृत रह जाते। कमसेकम मेरे अंदर का शब्दकार तो सीखता रहता। मैं यह सोचता कि क्या इस तरह से भी कला विषयों पर लिखा और सोचा जा सकता है?
(रंगायन, दिल्ली के कला केंद्र में राकेश श्रीमाल और कवयित्री सुमन केसरी के साथ की याद की एक तस्वीर।)
स्व. महेश तिवारी पर रंगकृति का वह यादगार अंक: राकेश जी भोपाल से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘कला वार्ता’ के जिन दिनों संपादक थे, तब इंदौर के नाट्य जगत को सदमा लगने वाली एक बड़ी खबर आई थी। उस समय शहर के वरिष्ठ नाट्य निर्देशक,कलाकार प्रो.महेश तिवारी की एक सड़क दुर्घटना में अकस्मात् मृत्यु हो गई थी। शहर के रंगकर्मियों ने उन्हें याद करने के लिये रवींद्र नाट्य गृह, इंदौर में एक बड़ा आयोजन किया। यह जानकारी मिलने के बाद भोपाल से राकेश जी ने तुरंत ही रंगकृति नाम से एक विशेषांक निकालने का कॉन्सेप्ट तैयार कर लिया। मुझे स्व.महेश पर ‘रंगकृति’ का एक विशेष अंक निकालने और उसके संपादकीय सहयोग की ज़िम्मेदारी दे दी। उन दिनों में चौथा संसार अख़बार में सेवारत था। उन्होंने बताया कि लेख और उसके विषय किस तरह के हो सकते हैं। मैंने भागदौड़ की और फिर सभी के सहयोग से सामग्री जुटा ली। राकेश जी ने समय पर छपाई करवाई और प्रतियां आयोजन में वितरण के लिये ठीक समय पर आ गई। पत्रिका में उस दौर के सक्रिय रंगकर्मियों,पत्रकार साथियों के लेख और संस्मरण समाहित किये गये थे। इनमें राकेश जोशी,स्व.रवींद्र शाह,नासिर जमाल,राजेंद्र जैन,अशोक वर्मा,सुभाष शर्मा,सुशील गोयल और तरल मुंशी जैसे साथी शामिल रहे।
विशद था अध्ययन और देते थे बेहतरीन सुझाव: राकेश श्रीमाल की बड़ी ख़ूबी उनका विशद साहित्यिक अध्ययन था। उनका देश के तकरीबन कलाकारों, साहित्यकारों या कवियों से जीवंत संपर्क था। वे कला संस्थानों,अकादमियों और विश्वविद्यालयों के काम पर नज़र रखते थे। वे पारंपरिक और शास्रीय कलाओं के बारे में गहरी समझ रखते थे। ज़ाहिर है कि उनसे कभी भी, किसी भी विषय पर चर्चा करना कुछ नया जानना,समझने जैसा होता था। किसी भी विषय पर बात करते समय उनका दिमाग एक संदर्भ ग्रंथ की तरह काम करने लगता था। उनसे बात करना हर बार कुछ नया जानने और समझने जैसा होता था। एक बार फोन पर कहने लगे, मैंने तुम्हारा नाटक ‘मोनिया दि ग्रेट’ पढ़ा है, तुमने अच्छा लिखा है। कोलकाता में इसका मंचन कराना चाहता हूँ। मगर लॉकडॉउन की वजह से काफी समय चला गया। तब मैंने कहा, लॉकडॉउन में प्राणियों की स्थिति को लेकर भी मैंने ‘जंगल सिटी’ नाटक लिखा है। कहने लगे, अच्छा वाह। फिर पूछा -‘तुमने जॉर्ज ऑरवेल का कालजयी उपन्यास ‘एनिमल फार्म’ पढ़ा कि नहीं’? मैंने कहा,नहीं। कहने लगे, पढ़ना’। यह पहला मौका नहीं था, जब उन्होंने ऐसा कहा था, वे अक्सर किताबों का ज़िक्र किया करते, जिन्हें पढ़ना ज़रूरी हो वे बता देते’। (रंगायन, दिल्ली के कला केंद्र में अनुराधा प्रधान के साथ राकेश श्रीमाल और साथी रचनाधर्मी।)
जहाँ गये अपने काम की अमिट छाप छोड़ी: राकेश जी जहां गये, वहां के साहित्य और कला जगत को उन्होंने अपने काम से रंग दिया। अपनी छाप छोड़ी। याद कीजिये मुंबई में ‘जनसत्ता’ के दस साल। वहां उन्होंने मुंबई की कला,संस्कृति को प्रतिबिंबित करने वाले कई लेख,समीक्षायें लिखी। कई लेखकों को जोड़ा। बहुत से कलाकारों को नये तरीके से परिभाषित कर छापा। जब भी मौका मिला, सबरंग में भी उन्होंने ज़बरदस्त लेख लिखे। अंकों को हमेशा सहेज कर रखने वाले अंक बना दिया। धीरेंद्र अस्थाना जी के संपादाकत्व में ‘सबरंग’ एक ऐसी पत्रिका भी रही, जिसे जनसत्ता के साथ ख़रीदने और पढ़ने का इंतज़ार रहता था। बाद में वर्धा पहुंचे और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय से जुड़ गये। यहां भी ‘पुस्तक वार्ता’ के संपादन जैसे बड़े और विशिष्ट दायित्यों के साथ ही शोध और अध्ययन के अनेक काम किये। फिर कोलकाता में ताना बाना पत्रिका और साहित्य,संस्कृति के अन्य विस्तारित काम आगे बढ़ाते रहे। उनके साहित्यिक योगदान और कामों का आकलन आज करना मुश्किल है।
(दिल्ली की अग्रसेन की बावली में राकेश जी ने दिया था ‘कविता बावली’ कॉन्सेप्ट। साथ में पोएट,पेंटर सीरज सक्सेना )
दिल्ली में खारी बावली से कविता बावली तक: चार साल पहले राकेश जी के कविताओं का एक आयोजन दिल्ली में था। तब राकेश जी के साथ दो-तीन दिन दिल्ली में गुज़ारने का अवसर मिला। दिल्ली में मैं हमारे चित्रकार साथी सीरज सक्सेना, पोएट पेंटर वाज़दा ख़ान, थियेटर पर्सनैलिटी हफ़ीज़ ख़ान और स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़े राकेश जी के पुराने मित्र श्री पकंज शर्मा का साथ रहा। हम उनके कविता कार्यक्रम में शामिल हुए। दिल्ली में आत्मीय पल पुरानी यादों को दोहराते हुए बिताते रहे। उन्हीं तीन दिनों में से एक दिन हम राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से हम खारी बावली पहुंचे। यहां पहुंचते ही राकेश जी ने इस बावली का पुरातन खंडहर नुमा सौंदर्य देखा। उन्होंने तुरंत ही ‘कविता बावली’ नाम का नया कॉन्सेप्ट दे दिया। उन्होंने कहा, हम ऐसे पर्यटन स्थलों पर कविता पाठ का कार्यक्रम कर सकते हैं। सिरज सक्सेना हमारे साथ ही थे। यह कॉन्सेप्ट हम दोनों को बहुत ही अनोखा और दिलचस्प लगा। अगले दिन समय मिलने हम तीनों फिर से उन्हीं सीढ़ियों और मेहराबों वाली जगह पर पहुंच गये। यहां हमने देशी-विदेशी सैलानियों की आवाजाही के बीच अपनी-अपनी कविताओं का पाठ किया। कुछ वीडियो बना लिये।
(बहन तलत परवीन के विवाह की तस्वीर। साथ में दिलीप और श्रद्धा बोस। मंडप की सज्जा राकेश जी ने की थी।)
विवाह के मंडप को रंगीन काग़ज़ों से सजा डाला: राकेश जी के साथ परिवार से जुड़ी कुछ स्मृतियां भी हैं। उनका प्रेस क्लब, इंदौर के पीछे हमारे घर पर आना-जाना था। तब मेरे पिता स्व. श्री हफीज़ इंदौर उच्च न्यायालय में अधिकारी थे। उन्हीं दिनों मेरी बहन ए़डवोकेट तलत परवीन की शादी की तैयारी शुरू हुई। उस समय इंदौर में रंगमंच और पत्रकारिता से जुड़े मेरे साथी परिवार के इस काम में हाथ बंटाने लगे। इस काम के दौरान साउथ तुकोगंज की अरोड़ वंशीय धर्मशाला, नाथ मंदिर में हम 30 दिसंबर 1990 की रात निकाह और प्रीति भोज के मंचों की तैयारी में जुटे थे। राकेश जी को जब यह पता चला। वे रात 10 बजे परिणय स्थल आ पहुँचे। उस रात कुछ और मित्र मेरे साथ थे। इनमें आदिल कुरैशी,चंद्रशेखर दुबे,शाहिद लतीफ़, तनवीर फारूकी,रफ़ीक विसाल,दिलीप बोस,गिरीश शरद,स्व.रऊफ़ आदि शामिल थे। सभी पारंपरिक तरीके मंच सज्जा के विषय में सोच रहे थे। तब राकेश जी ने मंच सज्जा का काम अपने हाथ में ले लिया। उन्होंने हमारे पास मौजूद रंग-बिरंगे काग़ज़ों और साड़ीनुमा रंगीन कपड़ों को स्टेज पर संयोजित कर उसे कलात्मक रूप दे दिया। रात भर हम उस धर्मशाला में यह काम हँसते-गाते करते रहे। ऊपर दी गई तस्वीर में राकेश श्रीमाल जी के कल्पना से बना वही मंच है। इसमें मंच पर बहन एडवोकेट तलत और उनके पति लतीफ़ ख़ान के साथ ही हमारे संगीतकार दोस्त दिलीप बोस और उनकी श्रीमती श्रद्दा बोस नज़र आ रही हैं। नीचे विवाह से पहले की एक तस्वीर है। इसमें बहन तलत परवीन के पति लतीफ़ ख़ान के साथ राकेश श्रीमाल और शाहिद लतीफ़ हैं, पीछे रफ़ीक विसाल।
कला और संस्कृति की बातों के साथ गुज़रे अनमोल पल: राकेश श्रीमाल के साथ मेरा जितना भी वक्त गुज़रा, वे कला और संस्कृति की बात करते हुए, साहित्य के बारे में जानते-समझते हुये गुज़रा। वह सबकुछ जैसे एक लेखक की नज़र वाले कैमरे की मानिंद था। विरासत के बतौर अब राकेश जी के शब्द ही हमारे साथ हैं। उन्होंने अपनी एक कविता में उन्होंने कहा था –
मैं वही हूँ
जो तुम हो
शब्दों के घर में रहते हुये
कभी ख़ुश होते
एकाएक उदास होते हुये
ये शब्द लिखना
जैसे तुम्हें छू लेना
ये शब्द पढ़ना
जैसे मुझे देख लेना।
इस बेहतरीन पत्रकार और रचनाकार मित्र को इंदौर और भोपाल के कलाकार मित्रों की तरफ़ से विनम्र श्रद्धाजंलि।
कला और साहित्य का चलता-फिरता छापाखाना थे राकेश श्रीमाल
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