Saturday, May 9, 2026
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कला का वो ‘घर’, शानदार थी जिसकी रोशनी : रंजना पोहनकर

ख्यात चित्रकार और लेखिका रंजना पोहनकर ने अपने इस लेख में बड़ौदा के फाइन आर्ट कॉलेज की याद की है। बड़ौदा के उस कॉलेज में वे चार दशक पहले चित्रकला के अध्ययन के लिये गई थीं। उन गुज़री यादों में बहते हुए रंजना जी ने कला संकाय के साथ वहाँ के गुरूजनों की भी याद की है। आप भी पढ़िये उनके दिल को छू जाने वाले शब्द- ‘कला का वो घर, शानदार थी जिसकी रोशनी’। – संपादक, इंदौर स्टूडियो।कला संकाय के वो अनमोल दिन: कोई 40 बरस से ज़्यादा हो गये लेकिन आज भी बड़ौदा कला संकाय के वो अनमोल दिन याद आ जाते हैं। शायद उस वक़्त ज़िन्दगी ने सपनों का काफिला चुना था। वहाँ की फैकल्टी को जब-तब याद करती हूँ, उस गुज़रे समय में डूब जाती हूँ। आज लगता है सच में उस घर की रोशनी बेहद शानदार थी। मेरी यादों में आज चित्रकला के शिक्षण और प्रशिक्षण वाले उसी संस्थान की याद।मेरा पहला प्रेम रहा चित्रकारी: चित्रकारी मेरा पहला प्रेम रहा है, संगीत मेरा साथी रहा। बचपन से ही दर्जेदार संगीत आसपास ही रहा। तब सौंदर्य की अनुभूति के आवेगों की शुरुआत हो चुकी थी। बड़ौदा कला संकाय में डिग्री के लिए स्थान मिल गया था। मैं बहुत खुश थी। एक से बढ़कर एक श्रेष्ठतम शिक्षक थे। यह तक़दीर वाली बात थी। मैं आज भी उन सभी के प्रति स्नेह और आदर रखती हूँ, मिलती हूँ वहाँ जाकर। हाँ, अब हमारे आदरणीय मणी सर नहीं दिखेंगे, ग्राफिक्स के जोगलेकर नहीं होंगे, विनोद एस पटेल, विनोद शाह, विनोद आर पटेल नहीं होंगे। बड़ी ज़िम्मेदारी से सीखा काम: बड़ौदा कला संकाय में रहते हुए बड़ी ज़िम्मेदारी से अपना काम सीखा था। प्रसिद्ध चित्रकार गुलाम मोहम्मद शेख़, सादगी और स्पष्ट बोल रखने वाले ज्योति भट्ट, और कला इतिहास में दक्ष रतन पारिमू सर। ये सभी हमारे प्रिय रहे। अपनापन था, है, और हमेशा रहेगा। अब भी इन सभी का आत्मियता से मिलना मन को खुशी दे जाता है। मुझे दोपहर में भी स्टुडियो में काम करने की आदत थी,  एक दफा मणी सर आकर  देख रहे थे। मुझे गाते – गाते काम करने की आदत सी हो गयी थी। आहट सी हुई,  पीछे मुड़कर देखा तो धक्क सा हुआ, लेकिन उनकी मुस्कुराहट ने जवाब दे दिया था। मैं कृतज्ञ हो गई थी। यह मेरे ज़िन्दगी का यादगार क्षण था। ‘… मेरे चित्र में कत्थई धुएं से रंग, काले रंग की ओर जाते थे… फैलते स्ट्रोक्स और राख रंग को ओढ़े, विभिन्न प्रकार के आकारों में ढल रहे थे..। पेंसिल रफ़्तार पकड़ चुकी थी।सांस्कृतिक चेतना जगाते गरबों के दिन: हमारे भारत में नृत्य-संगीत का अनुराग हमेशा से रहा है। ग्रामीण आंचलिक गंध खुशियां दे जाती है, सांवला सुख, चैनदारी और रिश्तों की तहज़ीब का अपना-अलग महत्व भी हमारे जीवन का सौंदर्य दे जाता है। गुजरात के गरबों का कला संकाय में विशेष स्थान होता था। हम सभी को इन दिनों की प्रतीक्षा रहती थी, नये विद्यार्थियों को गरबा नृत्य और लोक संगीत सिखाया जाता था। प्रोफेसर रमेश पण्ड्या हम सभी को एकत्र कर बड़े मज़ेदार ढंग से सिखाते थे। इस नाट्यवृंद का फाईन आर्ट्स मेले में विशेष आकर्षण हुआ करता था। इस बहुचर्चित मेले में क्राफ्ट्स और विभिन्न प्रकार के बर्तन, माटी के और अन्य विधाओं में विद्यार्थियों के बनाये सुंदर शिल्प दुकान में रखे जाते थे। विद्यार्थियों को प्रोत्साहन मिलता था। हम खुशी से भर जाते थे।फाइन आर्ट्स मेले में दर्शकों की हलचल: फाइन आर्ट्स के इस मेले में लोगों की मौजूदगी ख़ासी प्रोत्साहित करती थी। हमारे शिक्षक गण हमारे साथ होते थे। सौहार्द स्थापित होता था। नये प्रयोग करते हुए आनंदमय वातावरण हुआ करता था। मेले में कठपुतली का विशेष कार्यक्रम होता था। सबसे ज़्यादा पौराणिक कथाओं पर आधारित ये कठपुतली नाट्य वृंद खूब पसंद किया जाता था। रस्सियों की बुनाई, नये-नये सुंदर आकारों में बनाएं गये मिट्टी के खिलोने, फाईन आर्ट्स मेले का का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता था। विद्यार्थियों को कल्पनाशीलता की नया रास्ता मिल जाता था। गरबा नृत्य नवरात्रि के जोश में नृत्य के लिए झूमते हुए आनंदमय वातावरण में खो जाते थे। उन गरबों को मैं आज तक भुला नहीं पाई। कई विद्यार्थी ग्रामीण वेशभूषा में आते थे। तब बाहर के लोगों या विद्यार्थियों को हमारे कला संकाय में नृत्य करने की इजाज़त नहीं दी जाती थी।राहुल बारपूते जी की अविस्मरणीय स्मृति: प्रसिद्ध पत्रकार श्री राहुल बारपुते काका हमारे साथ थे, यूनिवर्सिटी घूमते वक़्त। पुरानी स्मृतियों का सन्नाटा मेरे आसपास आज भी घूम रहा है। शिल्प कला के विभागाध्यक्ष प्रसिद्ध शिल्पकार श्री शंखो चौधरी सर भी खूब याद आ रहे हैं। उनकी वो हंसी आती पूरे फैकल्टी में गूंजती थी, कैसे भूल सकती हूँ ? Low Relief, High Relief हम उनसे ही सीखे थे। शंखो चौधरी रोज़ की बात करते थे। पुराने आयाम कहने-सुनने के वे आदी नहीं थे। सहज सरल भाषा में समझाते थे। बहुत स्नेहिल थे। शेख भाई की दरियादिली हमेशा मेरे साथ रही। वे स्वयं संवेदनशील कवि एवं चित्रकार है। हमारे लिए प्रेरणास्रोत रहे हैं। उनकी जीवंतता सदैव वनी रही, सौदर्य शास्त्र, भारतीय तथा विदेशी कला और भारतीय कला शास्त्र हमें पढ़ाते थे, मेरे पास भावनाओं का भंडार है। मैं मेरे गुरुओं के लिए हमेशा नतमस्तक रहूंगी।साधना में उपासना के भीगते पल: अपने काम की साधना में उपासना के भीगते पल याद आते हैं। इसकी वजह थी वहाँ की व्यवस्थित कला साधना। इन अल्फाज़ों के मायने भी वहीं पर मिले। रेखांकनों द्वारा उस खोज को जारी रखना, खुद को ढूंढने जैसा था। असल में शांति निकेतन जाना था मुझे लेकिन इंदौर से बड़ौदा नज़दीक था और मेरे बड़ौदा जाने के पीछे प्रसिद्ध गायक कुमार गंधर्व, श्री राहुल बारपुते जी, तथा श्री विष्णु चिंचालकर जी का बड़ा हाथ था। मैं इन तीनों का योगदान कभी नहीं भूल सकती। कुमार काका के दोस्त वास्तुकार श्री माधव अचवल भी थे। हमारे पिताजी के दोस्त श्री दीक्षित भी थे। बाद में अचवल जी के यहाँ कुमार काका का कार्यक्रम था। मुझे भी फोन के ज़रिये कार्यक्रम में बुलाया गया था। जब कॉलेज में आये कुमार गंधर्व: करीब दो साल कुमार गंधर्व जी भी फैकल्टी में आये थे। उस वक्त तहलका मच गया था। भागते-भागते कोई आया और उसने मुझे बताया, कुमार गंधर्व तुमसे मिलने आए हैं, मेरी खुशी का ठिकाना न रहा।  ‘मैं कैसी हूँ और कैसा चल रहा है’? उन्होंने यह पूछा। उन जैसे महान गायक का अचानक मुझसे मिलने आना बहुत बड़ी बात थी। परंतु सहज ही वे पारिवारिक दायित्व निभा रहे थे। एक बार गंधर्व काका एक बार होस्टल में भी आए थे, तब वो पूरी यूनिवर्सिटी में मेरे साथ घूमे। मैं अभिभूत थी। उन भीगी यादों को याद करते हुए मैं आज भी भावुक हो जाती हूँ। मेरे चित्रकार गुरू सुब्रहमण्यम् जी: जाने-माने चित्रकार केजी सुब्रमण्यम मेरे गुरु थे।  उनमें खास बात यह थी वे किसी भी चकाचौंध से प्रभावित नहीं होते थे। उनके विचारों में स्वतंत्रता थी, मानवीय  संबंधों को उनके चित्रों में, टेराकोटा के सृजन में आसानी से देख सकते हैं, मानवीय अछूते पहलुओं को उद्घाटित करते थे।  सुख – दु:ख के व्यक्त – अव्यक्त पहलुओं के महत्वपूर्ण एहसास, जाने – अनजाने में होने वाली प्रक्रियाएं अचानक जीवंत हो उठती हैं। कितना त्यागना, कितना फ़ासला रखना, यह तय करने वाली शक्ति उनके पास थी। सहज जीवन में फैले प्रशस्त सोपान आत्म जगत की बुनियाद रखते। मणी सर के व्यक्तित्व में ऐसी कई परतें थी, सिद्धांत थे। वे ज़रा भी नहीं बदले। संयोजन में एकात्मता रहे ऐसा वे अक्सर कहते थे.. मेरे आराध्य रहे हैं। फैकल्टी में आपकी उपस्थिति खूब मायने रखती थी। उनके रहते कला – संकाय कृतार्थ हो गया था। कला की महत्ता और संभावनाएं, ज़िन्दगी समझने के लिए मेरे लिए तो सौंधी सुगंध रही है।गुरू जिन्हें हम कहते हैं शेख़ भाई: हमांरे चित्रकार गुरु गुलाम मोहम्मद शेख़। हम सभी उन्हें शेख भाई कहते थे। आज भी वही कहते हैं। कवि हृदय के इस अदभुत कलाकार की यादें आज भी हमारे दिल में ताज़ा है, वे जब पढ़ाने आते थे तब ऐसा लगता था कि वे दिल की गहराई से बात कह रहे हैं। उनकी कहन में चेतना के मौलिक गुण थे, जो अक्सर खुलकर अभिव्यक्त होते थे। वे चित्र के मर्म तक पहुँचते थे और उन सौदर्य क्षितिजों तक ले जाने की ताकत रखते थे। सृजन प्रक्रिया से परिचय कराते थे। विषय चाहे राग माला सिरीज़ का हो, सौंदर्यशास्त्र हो या फिर कोई और। चित्रों में भावनात्मक स्तर तक उनका हमें ले जाना आज भी याद है। अंतर दृष्टि की सूक्ष्म शक्तियों का मिला-जुला अनुभव होता था। आगे पढ़िये –https://indorestudio.com/mere-dilo-dimagh-par-jab-chha-jata-hai-dewas/

 

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