Tuesday, June 16, 2026
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कैनवास पर समाज का अक्स: ‘विज़ुअल लिट्रेसी’ और कला के बाज़ार पर मंथन

कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। अभिनव रंगमंडल की मासिक संवाद शृंखला के अंतर्गत, उज्जैन में शनिवार की शाम एक विशेष ‘कला संवाद’ का गरिमामय आयोजन किया गया। इस विमर्श का मुख्य विषय “चित्रकला: समाज, सरोकार और चित्रकार” रखा गया था। कार्यक्रम में देश के ख्यात प्रयोगधर्मी चित्रकार एवं ग्राफ़िक डिज़ाइनर अक्षय आमेरिया, जाने-माने चित्रकार, नाटककार मुकेश बिजौले और प्रसिद्ध चित्रकार एवं कला समीक्षक महावीर वर्मा ने मुख्य वक्ता के रूप में शिरकत की।A scene from Abhinav Rangmandal's monthly discussion series in Ujjain, on the theme "Painting: Society, Concerns, and the Artist." A report by Indore Studio. कई गंभीर सवालों पर वक्ताओं ने व्यक्त किये विचार:
इस वैचारिक विमर्श की अध्यक्षता वरिष्ठ कलागुरु श्रीकृष्ण जोशी ने की। संवाद के दौरान चित्रकला, समाज के प्रति उसकी जवाबदेही, प्रतिरोध के स्वर, वैचारिक चेतना और चित्रकारों की आजीविका जैसे बुनियादी विषयों पर गहराई से चर्चा हुई। इसके साथ ही चित्रों के मूल्य निर्धारण, कला अकादमियों व आर्ट गैलरीज की कार्य प्रणाली, कला समीक्षा के स्तर, संसाधनों की उपलब्धता, बाजार के बढ़ते हस्तक्षेप, कला संरक्षण, कलाकारों की आपसी एकजुटता, लोक एवं आभिजात्य कलाओं के द्वंद्व तथा कला-संस्कृति मंत्रालयों की भूमिका से जुड़े गंभीर सवालों पर वक्ताओं ने अपने विचार साझा किए।A scene from Abhinav Rangmandal's monthly discussion series in Ujjain, on the theme "Painting: Society, Concerns, and the Artist." A report by Indore Studio.घटती दृश्य साक्षरता और कला के प्रति अटूट प्रतिबद्धता:
विमर्श की शुरुआत करते हुए वरिष्ठ चित्रकार अक्षय आमेरिया ने समाज में लगातार कम हो रही ‘विज़ुअल लिट्रेसी’ (दृश्य साक्षरता) पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, “आज समाज में दृश्य साक्षरता का दायरा सिकुड़ रहा है। हमें सामूहिक रूप से प्रयास करने होंगे कि आम जनमानस में विज़ुअल लिट्रेसी कैसे बढ़े, कला दीर्घाओं की संस्कृति का विकास कैसे हो और ऐसे बौद्धिक संवादों में लोगों की उपस्थिति कैसे सुनिश्चित की जाए।” श्री आमेरिया ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि कला के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता ही किसी भी कलाकार की श्रेष्ठता और उसकी कला की लोकप्रियता की वास्तविक कसौटी होती है।A scene from Abhinav Rangmandal's monthly discussion series in Ujjain, on the theme "Painting: Society, Concerns, and the Artist." A report by Indore Studio.आम आदमी का जीवन और कला का वैचारिक निर्माण:
अपने अनुभव साझा करते हुए जाने-माने चित्रकार-नाटककार मुकेश बिजौले ने कहा, “मेरी कला के केंद्र में हमेशा आम लोग और उनका संघर्ष रहता है। मैं आदिवासियों और वंचित वर्ग के चित्र बनाता हूँ। जब ये आदिवासी समाज हमारे सामने आता है, तो वे मुखर होकर बोलते या खुद को अभिव्यक्त करते हुए नहीं दिखते। उनके चेहरों पर कोई आभिजात्य या बनावटी चमक नहीं होती, बल्कि उनमें एक गहरी करुणा और मौन अपील होती है।” उन्होंने आगे कहा कि आम लोग, उनका दैनिक जीवन, सामूहिकता, पारंपरिक मेले और लोक-उत्सव ही उनकी कला के मुख्य सरोकार हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) जैसी संस्थाओं से जुड़ने के कारण ही उनका वैचारिक निर्माण हुआ और उन्होंने अनेक वरिष्ठ कलाकारों, साहित्यकारों व कवियों से जीवन के जरूरी सबक सीखे।A scene from Abhinav Rangmandal's monthly discussion series in Ujjain, on the theme "Painting: Society, Concerns, and the Artist." A report by Indore Studio.बाजार का हस्तक्षेप और कला की अनमोल विरासत:
प्रसिद्ध चित्रकार और कला समीक्षक महावीर वर्मा ने कला और समाज के अंतर्संबंधों को रेखांकित करते हुए कहा कि कला मूलतः समाज को परिष्कृत कर उसे मनुष्य बनाती है। चित्रकार समाज को नहीं गढ़ता, बल्कि यह समाज ही है जो किसी व्यक्ति को चित्रकार बनाता है। कला समीक्षा की मौजूदा स्थिति पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, “आज की कला समीक्षा की सबसे बड़ी सीमा यह है कि अधिकांशतः साहित्य से जुड़े लोगों ने ही कला समीक्षाएं लिखी हैं।” बाज़ारवाद पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि आज चित्रों के मूल्य बाजार तय करता है, जबकि चित्रकार को केवल उसके श्रम का ही प्रतिफल मिल पाता है। कलाकार के जीवन में संघर्ष बहुत हैं। उन्होंने मकबूल फ़िदा हुसैन (एम.एफ. हुसैन) का उदाहरण देते हुए कहा कि हमारे देश में ऐसे विरले कलाकार भी हुए हैं जिन्होंने अपनी शर्तों पर कला बाजार और गैलरीज का रुख मोड़ दिया। एक चित्र का मूल्य इसलिए अधिक होता है क्योंकि उसका पुनरुत्पादन नहीं होता; चित्र केवल एक बार बनता है और उसका मूल्य भी एक ही बार चुकाया जाता है। कला अमूल्य है और कलाकार के लिए कला ही सर्वोपरि है।Members participating in the monthly series of the Abhinav Rangmandal in Ujjain, on the theme "Painting: Society, Concerns, and the Artist." A report by Indore Studio.जिज्ञासाएं, जीवंत संवाद और वैचारिक हस्तक्षेप:
इस विचारोत्तेजक संवाद में श्रोताओं दीर्घा से भी महत्वपूर्ण हस्तक्षेप हुए। ‘फ़नकार क्लब आर्ट गैलरी’ की प्रमुख वसु गुप्ता, वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. अरुण वर्मा और चर्चित व्यंग्यकार पिलकेंद्र अरोरा ने सक्रिय भागीदारी निभाई और तीखे सवाल पूछकर बहस को और जीवंत बनाया। प्रो. अरुण वर्मा ने याद दिलाया कि लालित्य, माधुर्य और सौंदर्य का समवेत रूप ही सच्ची कला है, और ‘प्रतिरोध’ दर्ज कराना कलाकारों का प्रमुख सामाजिक उत्तरदायित्व है। इसी क्रम में साहित्यकार राजेश सक्सेना ने अक्षय आमेरिया पर केंद्रित अपनी एक कविता का पाठ भी किया।Speaker at the monthly series of Abhinav Rangmandal in Ujjain on the topic "Painting: Society, Concerns, and the Artist." A report by Indore Studio.नाट्यकला का पुनर्जागरण और कलाओं का वैश्विक समुच्चय
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कलागुरु श्रीकृष्ण जोशी ने इस तरह के गंभीर संवाद के निरंतर आयोजन के लिए ‘अभिनव रंगमंडल’ की सराहना की। उन्होंने संस्था के निदेशक शरद शर्मा को उज्जैन में नाट्यकला के पुनर्जागरण का दूत बताया। नाटक की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए श्री जोशी ने कहा कि नाटक सभी कलाओं का एक सुंदर समुच्चय है। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए पूछा, “हमारी शिक्षा पद्धति में कला को अनिवार्य स्थान क्यों नहीं दिया गया है? जबकि संकेत आदि तो शुरुआती भाषाएं हैं, कला ही सार्वभौम भाषा है और समाज का सच्चा हैं।”A scene from the monthly series by Abhinav Rangmandal in Ujjain, on the theme "Painting: Society, Concerns, and the Artist." A report by Indore Studio.सांस्कृतिक परंपरा का निर्वाह और आभार प्रदर्शन
इस कला संवाद का कुशल संयोजन एवं मॉडरेशन जाने-माने कवि-कथाकार शशिभूषण ने किया। विमर्श के दौरान निरुक्त भार्गव, प्रकाश देशमुख, मुकेश जोशी, सुधा शर्मा, भूषण जैन, पांखुरी वक़्त और चेतना जोशी आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। संवाद के समापन पर संस्था के निदेशक शरद शर्मा ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ‘अभिनव रंगमंडल’ एकमात्र ऐसी नाट्य संस्था है जो सभी कलाओं पर समन्वित काम कर रही है और यह विचार उन्हें 1991 में सांस्कृतिक पुरोधा अशोक वाजपेयी से मिला था। आगे पढ़िये – माई रे…दुल्हन का चरित्र एक और मंच पर दुल्हनें तीन!…https://indorestudio.com/mai-re-main-kase-kahun-nsd-theatre-review/

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