(फिल्म समीक्षा – पुनीत बिसारिया) । फिल्म-परमाणु, द स्टोरी ऑफ पोखरण, 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षण की घटना से प्रेरित है। इस फ़िल्म की सफलता इस बात को रेखांकित करती है कि हिन्दी फिल्मों के दशकों की रुचि अब पहले से कहीं अधिक परिष्कृत हुई है और अब वह प्रेम त्रिकोण, खलनायकीय अट्टहास और खोया पाया अथवा स्किन शो से आगे बढ़कर कुछ सार्थक देखने को भी तैयार है, बशर्ते उसे एक कसी हुई पटकथा और दमदार निर्देशन के साथ दिया जाए। फ़िल्म का सबसे प्लस प्वाइंट जॉन अब्राहम तथा डायना पेंटी का दमदार अभिनय है। वास्तविक दृश्य जोड़े जाने से यह फ़िल्म और भी यथार्थपरक तथा विश्वसनीय बन गयी है।

निर्देशक अभिषेक शर्मा और पटकथा लेखकों की त्रयी ने इस फ़िल्म में यह कर दिखाया है। अभिषेक शर्मा तेरे बिन लादेन और द शौकीन्स जैसी बकवास फिल्मों का निर्देशन एवं पटकथा लेखन कर चुके थे और अगम्भीर किस्म के निर्देशक माने जा रहे थे किन्तु इस फ़िल्म से उन्होंने यह दिखा दिया है कि एक अच्छी टीम के साथ एक हटकर प्लॉट मिले यो वे भी कमाल कर सकते हैं। फ़िल्म 1995 के असफल परमाणु परीक्षण की निराशा से शुरू होती है और 11 मई, 1998 में पोखरण के कुम्भकर्ण, ताजमहल एवं द व्हाइट हाउस स्थलों पर दो परमाणु बमों तथा एक हायड्रोजन बम के सफल परीक्षण तथा इसके बाद कुछ अन्य सफल परीक्षणों के साथ हर्षित वातावरण में समाप्त होती है। फ़िल्म का सबसे प्लस प्वाइंट जॉन अब्राहम तथा डायना पेंटी का दमदार अभिनय है। उस समय की कुछ वास्तविक क्लिप जुड़ने से फ़िल्म और भी यथार्थपरक तथा विश्वसनीय बन गयी है।

फिल्मों में गानों की न तो आवश्यकता थी, न ही ये प्रभावित करते हैं। महाभारत के पात्रों के वय क्रम में अर्जुन को दूसरे नम्बर पर रखना तथा नकुल को अंतिम नम्बर ओर रखना त्रुटिपूर्ण है जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए था। पाकिस्तानी तथा अमरीकी गुप्तचरों की उपस्थिति और अमेरिकी संचार उपग्रहों की खुफिया मौजूदगी तथा इनके कैमरों की गिद्ध दृष्टि के बीच भारत ने उन्हें चकमा देते हुए ये परीक्षण किए, यह बात हर्षित होने का अवसर देती है तो हमें हमारे देश के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, सैनिकों, राजनैतिक नेतृत्व, प्रशासनिक नेतृत्व और कूटनीति की सफलता पर फूलने का भी अवसर देती है।

