Wednesday, May 13, 2026
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कविता हमारे आसपास होती है : सघन सोसायटी की संगोष्ठी में युवा कवि अनुज शुक्ला से संवाद

कला प्रतिनिधि,इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। कविता हमारे आसपास होती है। हमें महसूस कर उसे अपने शब्दों में ढालना होता है। सघन सोसायटी फॉर कल्चरल एवं वेलफेयर भोपाल द्वारा आयोजित ‘लेखक के रंग में लेखक के संग’ संगोष्ठी में यह बात युवा कवि अनुज शुक्ला ने कही। 24 अक्टूबर को यह आयोजन मायाराम सृजन सभागार में हुआ। इस संगोष्ठी में अनुज शुक्ला ने उनके लिखी कविताओं का पाठ किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था के अध्यक्ष श्री हीरू चटर्जी ने की। कविता पाठ में ‘फूली रोटी’ हास्य गजल मृत्यु देवता सहित अनेक कविताओं का पाठ किया गया। इसमें से मुख्य रूप से हास्य ग़ज़ल ने कलाकारों को ख़ूब हंसाया।#फूली रोटी
तवे की तपन और सुलगती हुई आग की उठती हुई आंच में पकती हुई रोटी / और भूखों का पेट सब ग्राह्य कर लेते हैं / उस बूढ़ी की जिंदगी जो रोज स्वाहा करती है अपनी उम्र और सांसों को / यह करती आ रही है उस समय से जब से उसने जन्म लिया और जब से उसने जिम्मेदारी को घूंघट समझकर ओढ़ लिया / जिसके एवज में उसे मिला पति और बच्चे / घर के नाम पर ससुराल / लेकिन उसकी खुशी की वजह बस एक ही चीज है वो फूली पकी रोटी।
#हास्य ग़ज़ल
दिल देना दिल लेना तुमसे न हो पाएगा
और तुम्हें अपना बनाना हमसे न हो पाएगा
आशिकों की बस्ती में मजनू रोज़ बनते हैं
तुम्हारे लिए पत्थर ख़ाना हमसे न हो पाएगा
कसरत करते-करते अखाड़ा तक तोड़ दिये हैं
अब तुम्हारे नखरे उठाना हमसे न हो पाएगा
काले हैं कलूटे हैं डामर हैं कोयला हैं
पर महंगा सिंगार कराना हमसे न हो पाएगा
पोंगा गटागट नटखट संतरे की गोली खिला देंगे
लेकिन महंगी चॉकलेट खिलाना हमसे न हो पाएगा
सुनो अगर पैदल घूमने चलना है तो चलो
बार-बार पेट्रोल भरवाना हमसे न हो पाएगा
डेढ़ जीबी डाटा इस्तेमाल रात तक किया करो
डेटा एडऑन रिचार्च करवाना हमसे न हो पाएगा#मृत्यु देवता
जब संसार से मोह भंग हो जाएगा / और इस माटी के देह से मन उचट जाएगा / तन मन से मौन रहना पसंद करूँगा / और अंधकार में बैठकर मृत्यु के देवता का स्मरण व चरण वंदन करूँगा / माया मिथ्या छल सी लगती है, प्रत्येक वस्तु पुच्छल तारे-सी लगती है/ धन-सम्मान धूल जैसे लगते हैं/ अपनत्व लालसा कंटीले शूल जैसे लगते हैं/ नयनों में विश्राम रखना पसंद करूँगा / काल के साथ बैठकर / मृत्यु के देवता का स्मरण व चरण वंदन करूँगा / रात्रि दिन श्वास का घर्षण करूँगा / यह केंचुली जैसे शरीर का मंथन करूँगा / अर्धरात्रि में ध्यान लगाना पसंद करूँगा / दक्षिण दिशा में बैठकर मृत्यु के देवता का स्मरण व चरण वंदन करूँगा।
कविता पाठ के बाद प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे कलाकारों ने अनुज शुकला से प्रश्न पूछे कि आपको कविता लिखने कि प्रेरणा कहां मिली? अनुज ने बताया कि सहित्यकार महेष सक्सेना से प्रेरणा मिली एवं उन्होंने ही उत्साहवर्धन किया। उन्होने ये भी बताया कि  कविता हमारे आसपास होती है। उसे महसूस करने से लेखन के रूप में आ जाती है। अनुज ज़्यादातर मुक्त छंद में कविता लिखते हैं। कार्यक्रम के अंत में संस्था के सचिव आनंद मिश्रा ने युवा के प्रति आभार व्यक्त किया गया।

 

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