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वरिष्ठ पत्रकार रमण रावल का कविता-संग्रह “सुनो, तुमने शांति को कहीं देखा है?” समकालीन हिंदी काव्य-परिदृश्य में एक विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराता है। यह संग्रह किसी साहित्यिक फैशन या प्रयोग धर्मिता का परिणाम नहीं, बल्कि लगभग चार दशकों से अधिक सक्रिय पत्रकारिता में अर्जित जीवन के अनुभवों की आत्मिक परिणति है। रावल की कविताएँ उस व्यक्ति की रचनात्मक अभिव्यक्ति हैं जिसने समाज को बाहर से भी देखा है और भीतर से भी महसूस किया है। शकील अख़्तर ने अपनी इस समीक्षा में यहां उनकी कुछ कविताओं को अपने नज़रिये से प्रस्तुत किया है।
शकील अख़्तर ने लिखा है- इस संग्रह की मूल शक्ति इसकी ईमानदारी और आत्म स्वीकृति में निहित है। कवि स्वयं यह दावा नहीं करता कि वह शास्त्रीय अर्थों में कवि है; वह छंद, अलंकार और संरचनात्मक जटिलता की अपेक्षा भाव-सत्य और अनुभव की प्रामाणिकता को अधिक महत्व देता है। यही कारण है कि इन कविताओं में बनावट की चकाचौंध नहीं, बल्कि संवेदना की सादगी दिखाई देती है।
संग्रह की शीर्षक कविता हमारे समय की सबसे बड़ी बेचैनी को सामने रखती है। कवि प्रश्न करता है—क्या शांति कहीं दिखाई देती है? और उत्तर में वह एक दृश्य उपस्थित करता है:
“शांति का तो पता नहीं,
हिंसा को तेजी से भागते देखा है।
चौराहे पर अंकल साहब खड़े थे—
निर्विकार भाव से।
उन्होंने शांति और हिंसा दोनों को देखा,
पर किसी को नहीं रोका।”
यहाँ कविता की संरचना अत्यंत सरल है, पर अर्थ-संकेत गहरे हैं। ‘अंकल साहब’ उस निष्क्रिय सामाजिक चेतना का प्रतीक हैं जो सब कुछ देखते हुए भी हस्तक्षेप नहीं करती। कवि न तो भाषण देता है और न ही आरोप लगाता है; वह केवल दृश्य रचता है, और यही दृश्य पाठक को आत्ममंथन की ओर ले जाता है। पत्रकारिता से अर्जित अवलोकन-शक्ति यहाँ कविता की संवेदनात्मक भूमि बन जाती है।
संग्रह की कविताओं में “गौरैया” भी विशेष उल्लेखनीय है। एक छोटे-से पक्षी के माध्यम से कवि मनुष्य और प्रकृति के टूटते रिश्ते की ओर संकेत करता है:
“गौरैया आती है,
दाना न मिले तो भी लौट जाती है।
वह खाली पेट रहे तो भी
आपको खाली हाथ नहीं रहने देती।”
यह कविता पर्यावरणीय विमर्श से आगे जाकर मनुष्य की आंतरिक रिक्तता पर प्रश्न उठाती है। गौरैया यहाँ सह-अस्तित्व, धैर्य और निस्वार्थ उपस्थिति का प्रतीक बन जाती है। कविता का प्रभाव उसकी सरलता में निहित है—न कोई जटिल प्रतीक, न अलंकारिक विस्तार; केवल एक दृश्य, जो स्मृति और संवेदना दोनों को एक साथ छूता है।
“अकेला हूँ मैं” कविता में रावल जी आधुनिक जीवन की विंडबना को स्थापित करते हैं। वे कविता में मनोवैज्ञानिक स्थिति—अकेलेपन—को सकारात्मक अर्थ देते हैं:
“अकेला होना कोई मजबूरी तो नहीं,
मायूसी भी नहीं, त्रासदी तो बिल्कुल नहीं।”
यहाँ अकेलापन आत्म संवाद और आत्म निर्माण का अवसर है। कविता में ऐतिहासिक और आध्यात्मिक व्यक्तित्वों के संदर्भ आते हैं, पर उनका उद्देश्य महिमा मंडन नहीं, बल्कि यह स्मरण कराना है कि बड़े संकल्प अक्सर एकांत में ही आकार लेते हैं। यह कविता आत्म चेतना का संयत उद्घोष है।
“एक पक्षी के बच्चे का गिलहरी द्वारा शिकार” कविता संग्रह की दार्शनिक और सामाजिक गहराई को उद्घाटित करती है। एक साधारण-सी प्राकृतिक घटना से कवि व्यापक निष्कर्ष निकालता है:
“कमज़ोर पैदा होने और
ताउम्र कमज़ोर रहने में फर्क है।
कमज़ोर की नियति है कुचला जाना,
बलवान और बुद्धिमान में भी फ़र्क है।”
आगे वे लिखते हैं—
“यहाँ जंगल में भले ही शेर का राज हो,
शहर में तो भेड़ियों का रुआब है।”
यहाँ सभ्यता की चमक के पीछे छिपी क्रूरता पर तीखा व्यंग्य है। कविता संकेत देती है कि आधुनिक समाज में शक्ति और चतुराई का गठजोड़ अक्सर नैतिकता पर भारी पड़ता है। पत्रकार-मन का यथार्थ-बोध और कवि-हृदय की नैतिक बेचैनी मिलकर एक प्रभावशाली वक्तव्य रचते हैं।
“लो चुनाव आ गए” कविता में लोकतंत्र का दृश्यात्मक रूप सामने आता है:
“भीड़ जुट गई है एक बार फिर
ठेला-दर-ठेला,
खोमचा-दर-खोमचा, चौक-दर-चौक…
देश में हो गई है घोषणा
आम चुनाव की।”
यहाँ चुनाव केवल राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक उत्सव और बाज़ार—दोनों के रूप में उपस्थित है। कवि व्यंग्य करता है, पर कटुता से नहीं; वह दृश्य को पाठक के सामने रख देता है।
इसी क्रम में “भूख” कविता अपनी संक्षिप्तता में अत्यंत प्रभावी है:
“हाथ बंधे
मुंह सिला
पेट खाली—
भूख…
कमबख़्त
इतनी ज़ोर से लगती क्यों है?”
यह कविता सामाजिक संरचना की उस विडंबना को उजागर करती है जहाँ अभिव्यक्ति पर बंधन है, पर भूख अनियंत्रित है। शब्दों की मितव्ययिता यहाँ अर्थ की तीव्रता बन जाती है।
“ज़िंदगी” कविता में समय की सरकती रेखा का बोध है:
“लम्हा-लम्हा खिसकती जा रही ज़िंदगी,
खुद से ही बिदकती जा रही ज़िंदगी।”
और “निष्कर्ष” में जीवन को क्षणों की श्रृंखला के रूप में देखा गया है:
“दिल चाहता है
तसल्ली का यह क्षण, वह क्षण…
आत्मा कहती है—
ज़िंदगी है बस
यह क्षण, वह क्षण।”
यहाँ दार्शनिकता सहज है, बोझिल नहीं। कवि जीवन को अंतिम सत्य की घोषणा के रूप में नहीं, बल्कि अनुभव की निरंतरता के रूप में ग्रहण करता है।
इस संग्रह की कुछ और कविताएं गहरे विचारों और अर्थ के भँवर में छोड़ जाती हैं। मुझे इन कविताओं को पढ़ते हुए भी ऐसा ही लगा। इनके शीर्षक हैं – ख़ाक छानते हैं, बदहाल है सड़क, जीवन की परिभाषा, तलाश, भलमनसाहत, एक ये भी दिवाली है, मनुष्य की फ़ितरत, शीशे से दोस्ती, सोच का फर्क़, कोरोना में मैंने जो देखा है, ये शायरी तो नहीं है, अस्ताचल, ख़ामखां, इतना सोचना ही क्यों..,सवाल और सवाल, हल्ला सच पर ही जंचता है, चलाचली की बेला है, मैं कभी था भी नहीं, ये कविता नहीं भारतीयों के मन के भाव हैं, कुछ न होना, राम में बसते प्राण हैं, झांकों अपने भीतर।
कुछ कविताओं की कई पंक्तियां ऐसी हैं कि आप उन्हें अलग से नोट करने या रेखांकित करने को विवश हो जायें। मिसाल के लिये राह के पत्थर, जीवन और मौत भूल-भुलैया, जीवन में ज़रूरी है बस एक बसेरा की इन पंक्तियों पर ध्यान दीजिये।
आशिक़ी और वफ़ा कभी साथ न चली हमारे
ख़्वाबों में भी दामन काँटों से लिपटा पाते हैं
***
मौत न कुरूप है न इसका स्वरूप है
किसी ने इसे देखा नहीं, क्या ख़ूब है
***
रोको मत उड़ने दो दिल के अरमानों को
यहां कौन रोक सका है दीवानों को
रमण जी के कविता संग्रह की भाषा संवादात्मक, स्पष्ट और सहज है। छंद-मुक्त शैली में लिखी गई ये कविताएँ विचार और भावना के संतुलन पर आधारित हैं। कहीं-कहीं कविता सीधे वक्तव्य में बदलती प्रतीत होती है, जिससे पारंपरिक काव्य-रस की अपेक्षा रखने वाले पाठक को अल्प संतोष हो सकता है। रावल का उद्देश्य अलंकारिक चमत्कार नहीं, बल्कि संप्रेषणीयता है—और इस दृष्टि से वे सफल हैं। रमण रावल जी ने कविता संग्रह सप्रेम पत्नी श्रीमती रेखा रावल, पुत्री-दामाद श्याम सलोनी, उत्सव और बेटा-बहू अक्षत-कविता को समर्पित किया है। सौ टंच प्रकाशन के इस संग्रह का मुख पृष्ठ जाने-माने चित्रकार सफ़दर शामी ने तैयार किया है। संयोजन जितेंद्र दुबे का है – और मूल्य है एक सौ पचास रूपये।
संग्रह को लेकर अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में डॉ. आनंद कुमार सिंह ने लिखा है – ‘रमण रावल मूलत: पत्रकार हैं। उनकी खोजी आत्म चेतना हमेशा रचनात्मक लोगों के भीतर छिपे जीवन के स्त्रोतों को पहचानने में सक्रिय रही है। उनका स्वभाव है, बार-बार मन के भीतर झाँकना, वहां से किसी सत्य का टुकड़ा निकाल लेना। उनकी ये कविताएं, उसी भीतरी यात्रा की सहज अभिव्यक्तियां हैं। इनमें छंद, लय, तुक या कविता की औपचारिक संरचना की खोज बेमानी है। ये प्रचलित अर्थ में कवितायें ना भी कहलाईं तो भी ये मानवीय संवेदना की असली आवाज़ है’।
पत्रकार कवि, रमण रावल ने भी अपने विचार स्वाभाविक रूप से व्यक्त किये हैं, उन्होंने भी कहा है कि मैं कोई कवि नहीं हूँ, ये मेरे मनोभाव हैं, कविता का शास्त्र भी मैं नहीं जानता, न ही मुझे अपनी कोई कविता याद है। मैं कवि नहीं हूँ इसलिये इन कविताओं को लिखने में 44 साल लग गये। इतने ही साल में मैंने पत्रकारिता में बितायें हैं। मैंने यह लेखन ‘स्वांत-सुखाय’ के लिये किया है। रमण रावल की कविताएं एक संवेदनशील पत्रकार की आत्मिक डायरी की तरह पढ़ी जा सकती है। यह संग्रह पाठक को बौद्धिक उलझन में नहीं डालता, बल्कि भावनात्मक संवाद स्थापित करता है। इसकी सबसे बड़ी शक्ति इसकी ईमानदारी है। आज के समय में, जब शब्दों की अधिकता और संवेदना की कमी का संकट है, रमण रावल की कविताएँ हमें ठहरकर सोचने को विवश करती हैं।
रमण रावल वरिष्ठ पत्रकार और साहित्य-रुचि संपन्न लेखक हैं। ‘इंदौर के सितारे’ नाम से उनकी एक जानी-पहचानी कॉफी बुक श्रंखला रही है। जैसा कि पुस्तक विमोचन की इस पुरानी तस्वीर से ज़ाहिर है। उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विषयों पर निरंतर लेखन किया है। मीडिया के विविध संस्थानों में सेवाएं दी हैं। स्वतंत्र पत्रकारिता में अपनी तरह से प्रतिमान स्थापित किया है। सार्वजनिक जीवन के व्यापक अनुभव और मानवीय सरोकारों के प्रति सजग दृष्टि उनकी पहचान है। – इंदौर स्टूडियो की रिपोर्ट। indorestudio.com कला को दीजिये मान। बढ़ाइये भारत की शान।

