नाट्य समीक्षा,राजेश कुमार (इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम)। ‘रंगभूमि’ दिल्ली की एक सक्रिय, प्रतिबद्ध नाट्य संस्था है जो कोरोना के दिनों में भी लगातार रंगकर्म करती रही है। बड़े- बड़े नाट्य निर्देशक जहां पिछले दिनों कोरोना की बीमारी का रोना रोते रहे, ‘रंगभूमि’ के निर्देशक नीलेश दीपक लगातार सक्रिय रहे। ऑनलाइन और ऑफ लाइन दोनों मोर्चे पर। पहली लहर खत्म होते उन्होंने ‘बलचनमा’ किया तो दूसरी लहर के बाद ‘ केंचुली’। उन्होंने एक नारा भी दिया है। theatre is back.
जी हां, नाटक फिर से आ गया है। नई ऊर्जा, त्वरा के साथ। वैसे भी थिएटर कभी गया नहीं था, न मर गया था। अलबत्ता इसका रूप जरूर बदल गया था। नीलेश दीपक की नई प्रस्तुति हर उन सवालों का जवाब है जो कहते थे कि इस महामारी में नाटक खत्म हो जाएगा। कोई नाटक देखने नहीं आएगा।जवाब आपके सामने है। पहले यह नाटक एल टी जी में होने वाला था लेकिन ऐन मौके पर जब प्रशासन ने अनुमति देने से इनकार कर दिया तो दर्शकों को लगा कि रंगभूमि का नारा कहीं असत्य साबित न हो जाय? लेकिन नाटक हुआ और दर्शकों की बड़ी संख्या के बीच इसका मंचन हुआ। दर्शकों के उत्साह को देखकर लग रहा था कि वे नाटक की वापसी के इंतज़ार में है।
विजय दान देथा की कहानी का नाट्य रूपांतरण सुमन कुमार ने लोक शैली में वैचारिकता के साथ किया है। यह नाटक स्त्री अस्मिता को लेकर है। लाछी जो इस नाटक की नायिका है, उस पर सामन्त की नजर है। गुर्जर समाज की होने के कारण गाँव का ज़मींदार उसे अपनी संपत्ति के रूप में इस्तेमाल करना करना चाहता है, लेकिन लाछी के तेवर के सम्मुख उसकी कुछ नहीं चलती है। सामन्त का जो करीबी है वो कई चालें चलता है लेकिन लाछी के विरोध के सामने नाकामयाब हो जाती है। लाछी अपने पति को प्रतिरोध के लिए तैयार करना चाहती है, लेकिन वो सामंती जाल में फंसकर इतना दुर्बल हो गया है कि हिम्मत नहीं कर पाता है। अंततः लाछी सांप के केंचुल छोड़ने की तरह अपनी पुरानी सड़ी-गली परंपराओं को तोड़कर बाहर निकल जाती है । व्यवस्था के घड़े को तोड़कर पितृसत्ता के विरोध में निकल पड़ती है।
नीलेश दीपक इस प्रस्तुति में अपने निर्देशन से स्त्री प्रतिरोध को स्पष्ट करने में सफल रहे हैं। लाछी के भूमिका को परिभाषा ने अपने स्वाभाविक अभिनय से जीवंत कर दिया। सामन्त के करीबी की भूमिका को दिलीप गुप्ता ने दर्शकों को काफी प्रभावित किया। नाटक लोक शैली पर आधारित थी इसलिये संगीत इसकी जान थी। भुवनेश्वर भास्कर की बनाई बैक कर्टेन नाटक की कई परतें खोल रही थी। मंच सज्जा में घड़े का सार्थक प्रयोग किया गया था। इस नाटक को बार – बार करने की जरूरत है। इस यथार्थ से लोगों को परिचित कराने की आवश्यकता है।

