49 वें खजुराहो नृत्य समारोह के दौरान नृत्य से जुड़े विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञ वक्ताओं ने ‘कला वार्ता’ व्याख्यान माला में अपने विचार रखें। इन वक्ताओं ने नृत्य के शास्त्रीय आधार से लेकर समकालीन प्रयोगों की ज़रूरत को लेकर चर्चा की। नृत्य कला की ज़रूरी बातों की तरफ़ ध्यान खींचा। इन सत्रों में उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी के निदेशक जयंत भिसे मौजूद रहे। उन्होंने कला विशेषज्ञों का स्वागत किया। विषय प्रवर्तन और संचालन कला समीक्षक विनय उपाध्याय ने किया। समापन समारोह में उपनिदेशक राहुल रस्तोगी ने भी अपनी बात रखी। पढ़िये, कला वार्ता के विशेषज्ञ वक्ताओं की ख़ास बातें। इनपुट, राज बेन्द्रे। संयोजन,संपादन – इंदौर स्टूडियो
नृत्य संगीत प्राचीनतम परंपरा का हिस्सा: प्रख्यात पुरातत्वविद शिवकांत बाजपेयी ने कहा, नृत्य संगीत हमारी प्राचीनतम धरोहर है, पुरा और प्रागैतिहासिक काल में भी इसके प्रमाण मिलते हैं। खजुराहो सहित तमाम प्राचीन मंदिर और स्मारक इसके प्रमाण है। नृत्य संगीत की परंपरा प्रागैतिहासिक काल से चली आ रही है। उन्होंने अशोक से लेकर शुंग काल से लेकर मौर्य और गुप्तकालीन पुरातात्विक प्रमाणों से यह बात सामने रखने की कोशिश की। कहा कि तब भी कला-संस्कृति अपनी उत्कृष्ट अवस्था में थी। उन्होंने बेल्लारी कर्नाटक से खुदाई में मिले एक पाषाणकालीन डांसिंग पैनल को स्लाइड के माध्यम से दिखाया। भीम बैठका,सांची का जिक्र करते हुए कहा, भीमबैठका की खोज वाकणकर जी ने की। यहां 10 हज़ार साल पुरानी 1200 से ज्यादा पेंटिंग्स हैं। उन्होंने बुद्ध के काल में आम्रपाली जैसी नर्तकी का जिक्र करते हुए कहा कि नृत्य तब भी था।
अच्छा साहित्य पढ़ना भी बेहद ज़रूरी: जम्मू के श्री हर्षवर्धन शर्मा ने कहा -‘यदि आप कलाकार हैं तो आपको अच्छा सहित्य पढ़ना चाहिए। यह आपकी कल्पना की उड़ान को कई गुना बढ़ा देता है और फिर जो कुछ आप करेंगे, वह अनूठा होगा। उन्होंने कहा कि कला का क्षेत्र एक तपस्या है साधना है, इसमें डूबना पड़ता है। तभी कुछ मिलता है। दोनों विशेषज्ञों ने श्रोताओं के सवालों के यथोचित जवाब दिए और उनकी जिज्ञासा को शांत किया। शुरू में प्रख्यात कला समीक्षक विनय उपाध्याय ने विषय प्रवर्तन किया। इस अवसर पर उस्ताद अलाउदीन खां संगीत एवं कला अकादमी के निदेशक जयंत माधव भिसे, उपनिदेशक राहुल रस्तोगी, प्रख्यात नृत्यंगना पद्मश्री गीता चंद्रन, प्रख्यात मूर्तिकार अनिल कुमार आदि उपस्थित थे।
नृत्य भावों में मुद्राओं की अहम भूमिका: डॉ.सुधा मलैया ने कहा, मुद्राएं नृत्यभावों में महती भूमिका निभाती हैं। अलग-अलग डांस फॉर्म में इनका अलग तरह से उपयोग होता है। हस्त मुद्राओं में रचनात्मक प्रयोग भी हुए हैं। उन्होंने बताया, नाट्य शास्त्र में अधिकतम 24 हस्त मुद्राओं का वर्णन है लेकिन बाद के ग्रंथों जैसे अभिनय दर्पण या संगीत रत्नाकर आदि में हस्त मुद्राओं की संख्या 30 – 32 से और अब 64 तक है। इन मुद्राओं के नाम तो एक हैं लेकिन स्वरूप भिन्न हैं जो भ्रम पैदा करते हैं। उन्होंने बताया कि मुद्राओं का यह अन्तर क्षेत्रीय कारणों से हो सकता है, कई जगह रचनात्मकता के चलते नए प्रयोगों और समकालीन नृत्य संयोजन के कारण भी नृत्य मुद्राओं में अंतर है। ये कितना सही या गलत है इस पर कुछ कहना ठीक नहीं है। उन्होंने प्रेजेंटेशन के माध्यम से पताक हस्त, त्रिपताक, हस्त, कर्तरीमुख, अर्धचंद्र, अरालहस्त सहित कई हस्त मुद्राओं के विभिन्न स्वरूप बताये और कहा कि अलग-अलग डांस फॉर्म में इन मुद्राओं का अलग-अलग प्रयोग होता है।
नाट्य शास्त्र के बाद शेष ग्रंथों में कुछ नया नहीं: प्रख्यात भरतनाट्यम प्रतिपादक प्रेमचंद होम्बल ने कहा, आचार्य भरत से पहले दो परम्पराएं थी। ब्रह्मा की परंपरा जो शुद्ध नाट्य की थी और दूसरी शिव की परंपरा जो नाट्य की थी। भरत मुनि ने दोनों के समन्वय से तीसरी नृत्य परंपरा बनाई जिसमें नृत्य और नाट्य दोनों के तत्व समाहित थे। उनका यह प्रयास ही नव प्रयोग का संकेत करता है। नाट्य शास्त्र के बाद के ग्रंथों में बहुत कुछ नया नहीं है, बल्कि वही सब कुछ है जो नाट्य शास्त्र में है। होम्बल जी ने कहा कि परम्पराएं चलती है, उनमें बदलाव भी आते हैं। नृत्य कभी मंदिरों में होते थे, फिर दरबारों से होते हुये नबाबों और आम लोगों के बीच तक पहुंचे। आगे और भी बदलाव आएंगे लेकिन हमें जड़ें पकड़कर आकाश में उड़ने का प्रयास करना चाहिए। प्रख्यात कथक गुरु शमा भाटे ने कहा, हमारी ज्ञान परंपरा में कला और परम्पराएं हमेशा से जुड़ी हुई हैं। हमें अपनी ज्ञान परम्परों से जुड़े रहकर कला में प्रयोग और नवाचार होना चाहिये। वे खुद भी नई पीढ़ी से जुड़कर ऐसे प्रयोगधर्मी काम करती हैं।
कला में नया करते रहने की ज़रूरत: प्रख्यात बैले निर्देशक भरत शर्मा और कथकली के विद्वान पियाल भट्टाचार्य ने कहा, नृत्य हो या नाटक या फिर संगीत, कला का कोई भी क्षेत्र हो, उसमें नया करने की ज़रूरत है। भरत शर्मा जी ने कहा, नृत्यों में समकालीनता उदयशंकर लेकर आए लेकिन उनके बाद ठहराव आ गया, इसे आगे बढाने की जरूरत है। नृत्य हो या कोई दूसरी कोई कला उसमें प्रयोग होना चाहिए। उन्होंने कहा कि राधा-कृष्ण के प्रेम को नृत्यों में दिखाते हैं लेकिन कोई और भाव दिखाने की भाषा नहीं है। इसके लिए समकालीनता में आना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि परम्पराओं ने हमें बहुत कुछ दिया है इसमें कोई शक नहीं लेकिन नई उड़ान भरने के लिये साहस करना पड़ेगा, बार-बार अभ्यास करना होगा, तब बात बनेगी। आगे पढ़िये –

