रवीन्द्र त्रिपाठी, इंदौर स्टूडियो। कुछ रचनाएं खास वक्त पर धमाका होती हैं। ऐसा नाटकों की दुनिया में भी होता है। विजय तेंदुलकर का ‘खामोश अदालत जारी है’ (मूल मराठी में ‘शांतता! कोर्ट चालू आहे’) ऐसी ही रचना है। जब यह लिखी गई, तभी इसने मराठी और भारतीय रंगमंच पर अपनी धूम मचाई। कई भाषाओं में भी इसके अनुवाद हुए। हिंदी में भी इसे काफी खेला गया। आज भी यह होता रहता है।
श्रीराम सेंटर रंगमंडल की उत्कृष्ट प्रस्तुति:
पिछले साल अनिरुद्ध खुटवड़ ने इसे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिए खेला। फिर श्रीराम सेंटर के लिए अवतार साहनी ने। अनिरुद्ध खुटवड़ वाला शो मैं नहीं देख पाया था और अवतार साहनी वाला शो भी पहले नहीं देख सका था, पर इस बार श्रीराम सेंटर के समारोह में देखा। वहां के रंगमंडल की यह एक बहुत अच्छी प्रस्तुति रही। अभिनय, प्रकाश योजना, संगीत, मंच सज्जा—सब उत्तम। अवतार साहनी मँजे हुए निर्देशक हैं और बहुत अच्छे प्रकाश परिकल्पक भी हैं। इस नाटक में भी उनकी जो प्रकाश योजना है, वह तो आखिर में जाकर पूरी तरह खिल जाती है। नाटक का प्रभाव भी इस कारण बढ़ जाता है।
अभिनय की बारीकियां: बेनारे और सुखात्मे का जीवंत चित्रण:
श्रीराम सेंटर रंगमंडल के अभिनेताओं की भी तारीफ करनी होगी। सब के सब अपने रोल में असरदार रहे। बेनारे की भूमिका में काव्या थीं। उसका चरित्र शुरू में आत्मविश्वासी लड़की का है, लेकिन अंत की तरफ बढ़ते हुए वह वेध्य और ध्वस्त होती जाती है—समाज के दबाव से टूटती और बिखरती हुई। कमाल का काम! वकील सुखात्मे की भूमिका में आशुतोष बनर्जी शुरू में तो खिलंदड़ हैं, पर धीरे-धीरे ऐसे शिकारी वकील के रूप में उभरते हैं जो अदालत में आरोपी को धर दबोचने के लिए तैयार है; दर्शक के मन में गुस्सा भरते हुए।
हास्य के पुट से सामाजिक क्रूरता तक का सफर:
मिस्टर काशीकर की भूमिका में नवीन और मिसेज काशीकर के रोल में स्वाती नाटक में हास्य का पुट देते हुए आखिर में ऐसे चरित्र में बदल जाते हैं, जो समाज सेवा की आड़ में किसी कमजोर को कुचल देने के लिए तैयार हैं। भानु प्रताप सिंह ने ऐसे शख्स का किरदार निभाया है जो वैसे तो मासूम है, लेकिन अपनी मासूमियत में ही किसी का अहित कर देता है। बाकी के अभिनेता भी सक्षम और असरदार थे।
मौलिकता का सच: स्विस उपन्यास ‘द डेंजरस गेम’ से जुड़ाव:
पर यहां दो बातें भी बतानी जरूरी हैं। पहली तो यह कि विजय तेंदुलकर का यह नाटक एक मौलिक रचना नहीं है, बल्कि एक रूपांतरण है। लेकिन किसका रूपांतरण है, इसके बारे में उन्होंने तब नहीं बताया था। लेकिन आज के सूचना भरे समय में इस तरह की बातें छिपती नहीं हैं। स्विस और जर्मन मूल के फ्रेडरिक ड्यूरनेमाट ने एक उपन्यास लिखा था, जिसका जर्मन नाम ‘डिए पाने’ था और अंग्रेजी नाम ‘द डेंजरस गेम’। अमेरिका में इसे ‘ट्रैप्स’ नाम से जाना गया। उनकी मूल धारणा यह है कि नकली मुकदमे के माध्यम से सच्चाई तक पहुँचा जा सकता है। ‘खामोश, अदालत जारी है’ में भी एक नकली मुकदमा चलता है—एक औरत पर, जो एक स्कूल में अध्यापिका है। शादी नहीं हुई है, लेकिन वह गर्भवती हो गई है। इसी आरोप के चलते उसे उस स्कूल से निकाले जाने की बात चल रही है जहाँ वह पढ़ाती है। जब इस नाटक में उस पर नकली मुकदमा चलता है, तो यह बात उजागर होती है कि वह गर्भवती है।
सिनेमा में भी दिखा इसी वैचारिक धरातल का ‘चेहरा’:
इसी विचार पर आधारित फिल्में भी बनी हैं। वर्ष 2021 में आई फिल्म ‘चेहरे’ (निर्देशक: रूमी जाफरी) में यही विचार मूल में था। इसमें लीड रोल में अमिताभ बच्चन थे। उनके साथ अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती भी थीं, जो सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के बाद काफी चर्चित हुई थीं। इसमें भी एक नकली मुकदमा चलता है।
बदलते दौर में वैचारिक प्रासंगिकता का सवाल:
दूसरी बात यह कि वैचारिक स्तर पर ‘खामोश, अदालत जारी है’ की अहमियत वैसी नहीं रही, जो इसके लिखे जाने के समय थी। तेंदुलकर के इस नाटक के मूल में है—भ्रूण हत्या (गर्भपात) और विवाह के बिना मातृत्व। मिस बेनारे पर यही आरोप लगता है कि वह एक भ्रूण हत्या कराना चाहती थी, यानी गर्भपात। इसी के साथ जुड़ा आरोप यह है कि वह बिना विवाह के माँ बनना चाहती है। लोगों और नकली अदालत की निगाह में यह अनैतिक है और मातृत्व की पवित्रता का अपमान है।
नैतिकता की नई परिभाषा और अभिनेताओं के लिए चुनौती:
जब तेंदुलकर ने यह नाटक लिखा था, तब भारत में भी गर्भपात एक अपराध था, लेकिन अब नहीं है; गर्भपात अब कानूनी बन गया है। दुनिया के कई देशों में यही स्थिति है। दूसरे, अब भारत में भी बिना विवाह किए माँ बनने की बात अनैतिक नहीं मानी जाती। नैतिकता की परिभाषा बदली है। सब जानते हैं कि अभिनेत्री नीना गुप्ता की बेटी मसाबा के पिता वेस्टइंडीज के क्रिकेटर विवियन रिचर्ड्स हैं। नीना और विवियन की शादी नहीं हुई, फिर भी नीना गुप्ता फिल्मी दुनिया और भारतीय समाज में स्वीकृत और सम्मानित हैं। इसलिए तेंदुलकर का यह नाटक अब वैचारिक स्तर पर उद्वेलन पैदा नहीं करता। मगर यह भी कहना पड़ेगा कि बतौर एक यथार्थवादी नाटक, ‘खामोश! अदालत जारी है’ अभिनेताओं के लिए अवसर और चुनौती दोनों ही है। (लेखक रवींद्र त्रिपाठी जाने-पहचाने पत्रकार होने के साथ ही, प्रख्यात फिल्म और कला समीक्षक, फिल्ममेकर और नाटककार हैं।) आगे पढ़िये – 28 साल से क्यों चल रहा है ताजमहल का टेंडर? https://indorestudio.com/tajmahal-ka-tender-drama-nsd-review/
रंगमंच की कालजयी प्रस्तुति और नैतिकता के बदलते मानदंड
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