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उर्दू शायरी की दुनिया के लिए
इस बार
ईद का दिन
एक गहरी उदासी लेकर आया।
मशहूर शायर Bashir Badr…
इस दिन हमारे बीच नहीं रहे।
ख़ुशी के मौके पर जैसे ही उनके निधन की यह दुखभरी ख़बर आई…
सोशल मीडिया पर शोक की लहर दौड़ गई।
फ़ेसबुक पर…
इंस्टाग्राम पर…
व्हाट्सऐप स्टेटस पर…
और लोगों की बातचीत में…
अचानक…
बशीर बद्र फिर लौट आए…
अपने शेरों में…
अपनी आवाज़ में…
अपनी यादों में।
किसी ने लिखा—
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो…ना जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए ”
तो किसी ने उनकी लिखी ग़ज़ल का ये शेर साझा किया—
“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों…”
और सच कहें तो सभी को फिर लगने लगा…
आज के समय में…
यह शेर पहले से कहीं ज़्यादा मौजूं लगता है।
पंद्रह फ़रवरी उन्नीस सौ पैंतीस में…
उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद…
यानी आज के अयोध्या में जन्मे बशीर बद्र…
इक्यानवे वर्ष की उम्र में…
भोपाल में इस दुनिया को अलविदा कह गए।
वे लंबे समय से बीमार थे।
पिछले कुछ सालों से…
पब्लिक लाइफ़ से दूर भी हो गए थे।
वे डिमेंशिया की बीमारी से जूझ रहे थे
बेशक वे लोगों से दूर हो गये लेकिन…
एक बात कभी दूर नहीं हुई…
उनकी शायरी।
वो लोगों के दिलों में महफ़ूज़ रही।
बातों में, यादों में।
और शब्दों की दुनिया में।
बशीर बद्र…
सिर्फ़ एक नायाब शायर नहीं थे।
वे रिश्तों के शायर थे।
मुहब्बत के शायर थे।
टूटते हुए वक्त में…
इंसानियत की बात करने वाले शायर थे।
उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को…
सिर्फ़ किताबों और महफ़िलों तक महदूद नहीं रहने दिया।
उन्होंने उसे…
आम आदमी के दिल तक पहुँचाया।
इसलिए उनके शेर…
सिर्फ़ पढ़े नहीं गए…
लोगों की ज़ुबान बन गए।
उनकी शायरी में प्रेम था…
लेकिन सिर्फ़ प्रेम नहीं था।
उसमें बिछड़ना था…
इंतज़ार था…
रिश्तों की नर्मी थी…
वक्त, हालात और समाज की बेचैनी थी…
और सबसे बढ़कर…
एक उम्मीद थी।
मुशायरों की दुनिया में…
बशीर बद्र का अंदाज़ अलग था।
वे शेर सुनाते नहीं थे…
जैसे उन्हें जीते थे।
उनकी आवाज़ में ठहराव था।
एक अपनापन था।
देश और दुनिया के बड़े मुशायरों में…
लोग उन्हें देर रात तक सुनते रहते थे।
आज भी उनकी ग़ज़लें और मुशायरे सुने जा रहे हैं……
मगर ज़िंदगी ने उन्हें आसान रास्ते नहीं दिए।
मिसाल के लिये साल उन्नीस सौ सत्यासी…
और तब हुए मेरठ के दंगे…
उनका घर जल गया।
उनकी कई अप्रकाशित रचनाएँ…
हमेशा के लिए ख़ाक़ हो गईं।
उनके लिये यह सब एक बड़ा सदमा था…वे भोपाल चले आये…नये बसेरे की ओर…
लेकिन…
इस दुख और ट्रैजिडी के बाद भी…
उनकी शायरी में तल्ख़ी नहीं आई।
उन्होंने नफ़रत के जवाब में नफ़रत की बात नहीं कही …
हमेशा मुहब्बत की भाषा चुनी।
दिल से दिल की बात कही।
उर्दू साहित्य में योगदान के लिए…
उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित…
उन्हें कई नामी अवॉर्ड मिले।
“आस”…
“आहट”…
“आमद”…
और “उजाले अपनी यादों के”…
उनकी ऐसी किताबें हैं…
जिन्हें लोग आज भी बड़ी दिलचस्पी से पढ़ते हैं।
एक बातचीत में…
बशीर साहब ने कहा था—
“मैंने ग़ज़ल को नहीं…
ग़ज़ल ने मुझे ढूँढा है…”
उनका मानना था…
कि शायरी सीखी नहीं जाती।
वो पैदा होती है…
ज़िंदगी के तजुरबों से।
दर्द से।
मोहब्बत से।
अकेलेपन से।
और इंसानी रिश्तों से।
वे कहते थे—
एक अच्छा शायर वही है…
जो कम शब्दों में…
दिल की सबसे गहरी बात कह सके।
शायद यही वजह है…
कि उनके शेर…
लोगों के दिलों में बस गए।
आइए…
इस मौके पर…
बशीर बद्र के कुछ चुनिंदा शेर याद करें…
जो हमेशा ज़िंदा रहेंगे।
“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो…”
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में…”
“कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता…”
और…
अक्सर याद किया जाने वाला उनका एक और शेर—
“घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें,
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए…”
बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं हैं…
लेकिन…
उनकी शायरी ज़िंदा रहेगी।
उनके अल्फ़ाज़ हमेशा साथ रहेंगे।
और रहेगी…
मुहब्बत से भरी उनकी वो आवाज़…
जिसकी गूँज लोगों के दिलों में…
बरक़रार है…जिसके लिये वे आज के दिन यू ट्यूब पर उन्हें ही खोज रहे हैं…
देश और दुनिया के इस अज़ीम और पसंदीदा शायर को…
इंदौर स्टूडियो की तरफ़ से…
विनम्र श्रद्धांजलि। ख़िराजे अक़ीदत।

