Wednesday, May 13, 2026
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ख्यात सितार वादक पं.देबू चौधरी का देहावसान, कोरोना संक्रमण ने ली जान

संजय दौराल,इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। मई महीने के पहले ही दिन भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत के लिये स्तब्ध कर देने वाली ख़बर आई है। दिग्गज सितार वादक पंडित देवव्रत (देबू चौधरी) का दिल्ली में निधन हो गया है। इंदौर स्टुडियो अपने शास्त्रीय संगीत रसिकों की तरफ से उनके निधन पर अपनी विनम्र श्रद्धाजंलि व्यक्त करता है।पंडित देबू का जन्म (01 जून 1935) में मयमनसिंह (अब बांग्लादेश) में हुआ था उन्होंने चार साल की उम्र से सितार बजाना शुरू कर दिया था उनका पहला प्रसारण 1953 में ऑल इंडिया रेडियो में अठारह वर्ष की आयु में हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्राप्त की वह 1971 से 1982 तक एक पाठक के रूप में पूर्व डीन और हेड, फैकल्टी ऑफ़ म्यूज़िक, दिल्ली विश्वविद्यालय में शामिल हुए और 1985 से 1988 तक डीन और संगीत विभाग के प्रमुख रहे उन्होंने 1991 से 1994 तक महर्षि इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी (जिसे अब प्रबंधन का महर्षि विश्वविद्यालय कहा जाता है ।) में एक विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में काम किया। उन्होंने स्वर्गीय पांचू गोपाल दत्त और सितार का प्रशिक्षण ‘सेनिआ घराने’ के महान संगीतज्ञ आचार्य उस्ताद मुश्ताक अली खाँ साहब जी से लेना प्रारम्भ किया ।  पंडित देबू चौधरी जी को दुर्लभ संगीत और वाद्य यंत्रों पर आधारित रचनाओं का संग्रह करने में विशेष लगाव था, जिसके परिणामस्वरुप इन्होंने इस अनूठी परियोजना को प्रारंभ किया। उन्होंने 8 नए रागों का सृजन किया बिस्वेश्वरी, पलास-सारंग, अनुरंजनी, आशिक़ी ललित, स्वानंदेश्वरी, कल्याणी बिलावल, शिवमंजरी और प्रभाती मंजरी (अपनी पत्नी मंजू जी की याद में) उन्होंने भारतीय संगीत पर ‘सितार ऐंड इट्स टेक्निक्स’, ‘म्यूजिक ऑफ इंडिया’ और ‘ऑन इंडियन म्यूजिक’ पर तीन किताबें लिखी हैं उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका में दिन के 24 घंटों में 24 सीडी रिकॉर्ड की हैं उन्हें पेडल टोन (जिसे ”जोड़” भी कहा जाता है) के दूसरे स्वर के टॉनिक पिच के साथ (जिसे ‘जोड़ी’) भी कहा जाता है। उसे बजाने का एक प्रमुख प्रस्तावक माना जाता है, मूल प्रत्यावर्तन पथ पाकर जारी रखने से पहले बाहर निकलने की अनुमति देने वाले झल्लाहट में स्ट्रिंग खींचना उन्हें उस्ताद विलायत खाँ साहब, पंडित रविशंकर जी और निखिल बनर्जी जी के साथ इस युग के सबसे महान सितार वादकों में से एक माना जाता है, इन्हें 17 फ्रेट सितार का उपयोग करने में भी अद्वितीय माना जाता है जबकि अधिकांश संगीतकार 19 फ्रेट सितार का उपयोग करते हैं।अप्रैल 2010 में उन्होंने अपने गुरु उस्ताद मुश्ताक अली खाँ साहब जी की याद में संस्कृति के लिए यूएमऐके (उस्ताद मुश्ताक अली खान) केंद्र शुरू किया। पंडित जी को कई पुरुस्कारों से भी सम्मानित किया जा चूका हैं इनमें ‘पद्मभूषण’ और ‘पद्मश्री’ जैसे प्रतिष्ठित सर्वोच्च नागरिक सम्मान शामिल हैं । दिल्ली विश्वविद्यालय से अवकाश प्राप्त करने के बाद ये वर्तमान में अपने पुत्र-पुत्री,दामाद और भतीजा-भतिजिओं के साथ चितरंजन पार्क, नई दिल्ली में रहे थे। वे कोरोना से संक्रमित थे। 1 मई की आधी रात को उनका निधन हो गया।

 

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