(सुभाष अरोड़ा की विशेष फीचर रिपोर्ट)
इंदौर स्टूडियो। यथार्थ और कल्पना लोक के संतुलित मिश्रण से रेखाओं और रंगों का जादू बिखेरने वाले चित्रकार हैं ग्वालियर के बृजमोहन आर्य। जैसा कि प्रख्यात चित्रकार फ्रांसिस न्यूटन सूजा ने कहा है कि महान कला मनोरंजक होने के साथ मस्तिष्क को उत्तेजना प्रदान करती है। श्री आर्य की पेंटिंग देखने पर भी यही अनुभूति होती है।
कला गुरु श्री पीके श्रीवास्तव के साथ कुछ दिन पहले मैं श्री आर्य से उनके निवास में मौजूद स्टूडियो में मिला था। इस दौरान उनकी कला साधना को लेकर मेरी चर्चा हुई। थोड़े समय में बहुत सारी कलाकृतियों का अवलोकन करने के बाद उनकी कला यात्रा का जो खाका मेरे दिमाग में बना अपनी इस रिपोर्ट में वही विचार साझा कर रहा हूँ।
रचनात्मकता का समय के साथ ख़ास रिश्ता: रचनात्मकता के मनोविज्ञान का समय के साथ खास प्रकार का रिश्ता रहता है। दिसंबर 2013 में ललित कला अकादमी नई दिल्ली में हुई उनकी पहली एकल प्रदर्शनी का कैटलॉग मेरे हाथों में था और मैं उनके कुछ मौजूदा कामों को भी निहार रहा था। वक्त कलाकार के अवचेतन मन को सूक्ष्म सत्य से जोड़ता है और सामाजिक प्राणी होने के नाते कलाकार अपने परिवेश से भी जुड़ा रहता है। तकरीबन एक दशक पहले बनाई उनकी कलाकृतियों में रंगों की विविधता, लय और गति से भरे चेहरे और जीवन संदर्भ दृश्यमान थे। तब आर्ट क्रिटिक केशव मलिक ने सादृश्यता और कल्पना के बीच झूलते चित्रकार इस चित्रकार के द्वंद का उल्लेख किया था। प्रसिद्ध दार्शनिक क्रोचे और कलिंगवुड ने ‘अतीत और वर्तमान का चेतना में एक साथ होना’ माना था। वही दार्शनिक ‘बर्गसां’ ने भी स्मृति चिंतन को विशेष महत्व दिया।
अतीत,वर्तमान और भविष्य के आयाम: श्री आर्य की चित्रकारी में कल,आज और कल का त्रिआयामी मेल साफ़ झलकता है। चित्रकार अपने जीवन अनुभवों को चित्रपट पर उकेरते हुए कभी ‘सॉरी’ जैसी कलाकृति की रचना करते हैं और कभी प्रकृति में खो जाते हैं। उनकी विदेश यात्राओं के बाद के कामों में यूरोप का प्रभाव भी स्पष्ट दिखाई देता है। दरअसल यूरोप में हुए कला आंदोलनों के प्रभाव से कोई भी समकालीन कलाकार प्रभावित हुए बिना नहीं रहा। हमारे देश के कला पाठ्यक्रम भी कुछ ऐसा ही रुझान उत्पन्न करते हैं । कला शिक्षक होने के नाते भी श्री आर्य समकालीन कला के प्रभावों से अछूते नहीं रहे।
चित्रों में नीले रंग की बिखरी अनुभूतियाँ: बृजमोहन आर्य ने नीले रंग विधान में कई पेंटिंग्स तैयार की हैं। वे कहते हैं, कला ही मेरा जीवन है तथा सृजनात्मक ऊर्जा का पूरा श्रेय मेरी दिवंगत पत्नी को जाता है। उनकी पत्नी का कैंसर रोग से लड़ते हुये निधन हो गया था। श्री आर्य जल्द ही दिवंगत पत्नी की स्मृति में एकल प्रदर्शनी की आकांक्षा रखते हैं। वे इस काम में लगन से जुटे हुये हैं।
पाँच राज्य स्तरीय कला पुरस्कारों से सम्मानित: बृमुरैना जिले के सबलगढ़ में जन्में बृजमोहन आर्य को 5 राज्य स्तरीय कला सम्मान मिल चुके हैं। उनका एक काव्य संग्रह ‘सफेद कैनवास’ भी प्रकाशित हो चुका है। उन्होंने ग्वालियर और खैरागढ़ में कला अध्ययन कर स्नातकोत्तर उपाधि अर्जित की और शासकीय कला शिक्षक के रूप में इंदौर, जबलपुर में सेवाएं दी हैं। आप वर्तमान में फाइन आर्ट कॉलेज ग्वालियर में अध्यापनरत हैं । श्री आर्य की अब तक 5 एकल प्रदर्शनियाँ लग चुकी हैं। इसके अलावा राज्य और राष्ट्रीय स्तर की 9 और 7 अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में उनके काम को भरपूर सराहना मिली है। उन्होंने अब तक 70 ग्रुप शो और 40 कला शिविरों में शिरकत की है। आशा है बृजमोहन आर्य अपने काम से चंबल का नाम रोशन करते रहेंगे, साथ ही युवा कलाकारों का मार्गदर्शन कर उन्हें सही दिशा भी देंगे। (लेखक, समीक्षक श्री सुभाष अरोरा ग्वालियर के प्रख्यात मूर्तिकार हैं।)
बृजमोहन आर्य की चित्र कला….मनोरंजन और उत्तेजना का एहसास
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