इंदौर, 21 अप्रैल ( जावेद अहमद शाह खान ‘अल-हिंदी’ )। ‘कुछ दिल ने कहा, कुछ भी नहीं’…। फिल्म ‘अनुपमा’ के इस सदाबहार गीत की तरह कई और सुरीले गीतों की शहर में यादगार महफिल सजी। इस महफिल में अमेरिका से आईं स्मिता सप्रे की मीठी आवाज़ गूंजी। संगीत रसिकों खुश्क मौसम में सुरों की भीनी फुहार से खिल उठे। स्मिता के साथ यादों की मीठी लोरियां गाते-गुनगुनाते रहे। उनका साथ दिया आशीष जैन ने।


इस महफिल में स्मिता सप्रे ने लता ,नूरजहाँ ,सुरैय्या से ले उमा देवी तक गीत सुनाये ..कुछ दिल ने कहा ,छोड़ दो आँचल ज़माना क्या कहेगा ,अफ़साना लिख रही हूँ ,ज़मीं से हमें आसमां तक। डोएट में उनका साथ दिया आशीष जैन ने। शास्त्रीय गीतों को बड़ी आसानी से निभाने वाले राजेन्द्र गलगले ने भी बेहतरीन नग़में सुनाये । सुर न सजे क्या गाऊं में ,पूछो न कैसे मैंने रेन बितायी ,एक मराठी भक्ति गीत “फिरत्या चाकापरती देसी मातीळा आकार विठ्ठला ,तू वेडा कुंभार ” भी भावपूर्ण प्रस्तुति दी गयी ।

महफ़िल में जहां प्रकाश खानवलकर अपने बुलबुल तरंग से संगीत संयोजन कर रहे थे ।हारमोनियम पर अक्षय चिखलीकर और संवादिनी पर विजय गावड़े थे ,ढोलक मृदंगम पर सुधीर कोरान्ने और वुडन चाईम और ब्लाक्स पर नन्हें शौर्य कोरान्ने थे । संगत कलाकारों में विवेक थोरात और तबले पर प्रकाश घोड़गांवकर थे । लोक विधा समन्वय से यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था। साउंड सिस्टम अफेयर्स का था।

आपको बता दें, कुछ दिनों के लिये भारत आईं स्मिता अमेरिका के के मिल्फोर्ड (कनेक्टिकट) में रहती हैं। अमेरिका में रहते हुए भी उनका शास्त्रीय और सुगम संगीत से कभी नाता नहीं टूटा। इसकी बड़ी वजह उनका परिवार भी है। उनके घर में संगीत की लंबी परंपरा रही है। स्मिता ने अपनी मां सें संगीत सीखा अब वो इस विरासत को अपने बेटे को सौंप रही हैं। स्मिता अमेरिका में थिएटर से जुड़ी हुई हैं। साथ ही वे संगीत पर शोध भी कर रही हैं। सुगम गीतों को ही नहीं उनकी खूबी है वे शास्त्रीय रागों पर आधारित गीतों को भी उतनी ही खूबी से गाती हैं।

