कुछ ख़्वाबों को ज़िंदा ही दफ़नाना होता है

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कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। पलकों में ही अपना अश्क सुखाना होता है / कुछ ख्वाबों को जिंदा ही दफनाना होता है। राजीव रियाज प्रतापगढ़ी ने अपनी यह ग़जल आंबेडकर जंयती के अवसर पर आयोजित दलित चेतना कार्यक्रम में सुनाई। उनके एक और शेर पर भी तालियां बजी जब उन्होंने पढ़ा – जमाने तोड़कर तेरा हर दस्तूर जाऊंगा / नशे में चूर था  मैं, नशे में चूर जाऊंगा। सभी ने सुनाई अपनी रचनाएं: कार्यक्रम में राजकुमार, रजत रानी मीनू, रजनी दिसोदिया ने भी अपनी-अपनी रचनाएं प्रस्तुत की। अध्यक्षता प्रख्यात पंजाबी लेखक बलबीर माधोपुरी ने की। इसमें सर्वप्रथम राजकुमार ने बाबा साहेब की आत्मकथा का एक अंग्रेजी अंश प्रस्तुत किया और उसके बाद मराठी कवि नामदेव ढसाल और तेलुगु कवि की बाबा साहेब पर लिखी कविताओ के अंग्रेज़ी अनुवाद प्रस्तुत किए। रजत रानी मीनू ने “क्या मैं बता दूं” शीर्षक से  कहानी प्रस्तुत की। कहानी में आज भी शिक्षित लोगों द्वारा दलित लोगों के प्रति अमानवीय भेदभाव का चित्रण किया गया था। दलितों की सजगता के नये बिंब: रजनी दिसोदिया ने अपनी चार कविताएं प्रस्तुत की जिनके शीर्षक थे – शंबूक अट्टहास  कर रहा है, एकलव्य, कहानी बहुत पुरानी है और पीढ़ियां सीढ़ियां होती हैं। सभी कविताओं का स्वर दलितों की सजगता को नए बिंबों में प्रस्तुत करने वाला था। अंत में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे बलबीर माधोपुरी ने अपने उपन्यास ‘मट्टी बोल पयी’ के एक अंश का पाठ किया। उन्होंने सभी रचनाकारों को उत्कृष्ट रचनाओं की प्रस्तुति के लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि दलित लेखन में नारेबाजी नहीं बल्कि एक संतुलित सोच की जरूरत है। https://indorestudio.com/

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