मनोज शर्मा, इंदौर स्टूडियो। ‘क्या थियेटर में पैसा नहीं है? बहुत लोग यही कहते हैं थिएटर में पैसा नहीं है। इसलिए उन्हें फिल्मों में जाना पड़ता है’। प्रख्यात नाट्य निर्देशक और अभिनेता एम. के. रैना ने यह बात नाटक एवं रंगमंच संकाय के छात्रों से कही। वे ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय (RMTS) द्वारा आयोजित छात्रों के साथ रंग-संवाद कार्यक्रम को सम्बोधित कर रहे थे। कार्यक्रम का संयोजन नाटक एवं रंगमंच विभाग के अध्यक्ष एवं संगीत नाटक अकादमी द्वारा सम्मानित डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने किया।
अच्छे थियेटर में भी पैसा मिलेगा: श्री रैना ने थियेटर और पैसे के सवाल पर आगे कहा, ‘बहुत सारे कलाकार फिल्मों में चले भी जाते हैं। परंतु यह बात भी हमें समझना चाहिये कि अगर आप अच्छा थिएटर करेंगे तो आपको उसमें भी पैसा मिलेगा। हां, फिल्म और थियेटर से मिलने वाले पैसे की हम तुलना नहीं कर सकते हैं। फिल्म में जितना पैसा है, जितना बजट है, उतना रंगमंच में नहीं है लेकिन अच्छे प्रॉडक्शन या उत्कृष्ट रंगमंच करने पर आप ठीक-ठाक तरीके से अपना जीवन यापन कर सकते हैं’।
अभिनेता का सवाल करना ज़रूरी: श्री रैना ने कहा -‘थिएटर में सवाल करना बहुत जरूरी है। जब तक हम सवाल नहीं करेंगे। तब तक हमें उसके जवाब कैसे मिलेंगे? अभिनेता को यह करना पड़ता है। उन्होंने कहा, एक अभिनेता जो चरित्र निभाने जा रहा है, अगर वह उस चरित्र से जुड़े सवालों के बारे में नहीं सोचेगा, तो वह उसके जवाब भी नहीं ढूंढ पायेगा। उलझन बनी रहेगी। इसका सीधा असर उसके परफॉरमेंस पर पड़ेगा’।
सवाल पूछना हमारे ज्ञान की परम्परा: सौ नाटकों और दो दर्जन के करीब फिल्मों में काम करने वाले अनुभवी एक्टर ने कहा -‘ सवाल पूछना हमारे ज्ञान की सबसे अनुपम और रूचिप्रद परंपरा है। ऐसी विशिष्ट परंपरा जिसमें निरंतर सवाल और जवाब होते हैं। शिष्य, गुरु से सवाल पूछता है और गुरु उसका जवाब देते हैं। वह फिर सवाल पूछता है, वे फिर जवाब देते है। शिष्य फिर सवाल पूछता है, गुरु पुनः उसका जवाब देते हैं। सदियों से यह परंपरा चली आई है’।
नाटक एवं रंगमंच विभाग का अवलोकन: श्री एमके. रैना ने संवाद से पहले रंगमंच विभाग का अवलोकन भी किया। उन्होंने छात्र-छात्राओं द्वारा बनाए गए सैट, कॉस्ट्यूम, मास्क और रिसर्च जुड़े कामों को देखा। साथ ही विश्वविद्यालय में अध्यापन पर प्रसन्नता जताई। श्री रैना ने कहा, विभाग अल्प संसाधनों में बेहतर कार्य कर रहा है, यह ख़ुशी की बात है’।
नाट्य विभाग की उपलब्धियों का विवरण : कार्यक्रम के अंत में डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने नाट्य एवं रंगमंच विभाग की उपलब्धियों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि संकाय के विद्यार्थियों ने विगत छह सालों में कई प्रतिस्पर्धाओं में पुरस्कार प्राप्त किये हैं। इनमें युवा उत्सव सेंट्रल जोन, ओवर ऑल थियेटर चैंपियन, स्टेट एवं नेशनल थियेटर चैंपियनशिप आदि शामिल हैं। डॉ. द्विवेदी ने बताया कि विश्वविद्यालय से दीक्षित कुछ छात्र फिल्मों और वेब सिरीज़ में भी अभिनय कर रहे हैं। बहुत से छात्रों ने नेट जेआरएफ की परीक्षा उत्तीर्ण की है। विभाग के विद्यार्थियों का हर साल संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा दी जाने वाली स्कॉलरशिप एवं फैलोशिप में भी चयन हो रहा है। कई छात्र शिक्षक, प्रशिक्षक के रूप में भी अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
नाट्य कला की कमाल शख़्सियत: आइये जानते हैं, नाट्य कला की कमाल शख़्सियत एम.के. रैना (महाराज कृष्ण रैना) के बारे में। रैना का 1948 में श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर में हुआ। उन्होंने अपनी पढ़ाई श्रीनगर से पूरी की। बाद में वे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) दिल्ली में अध्ययन के लिये आ गये। 1970 में पास हुए और फिर कला सिनेमा में अभिनय शुरू किया। पहले पहल ’27 डाउन’ फिल्म से चर्चा में आये। इसके बाद – सतह से उठता आदमी, एक रुका हुआ फैसला, तमस, जेनेसिस, तारे जमीन पर, रब ने बना दी जोड़ी, आयशा, नूर, लक्ष्य आदि फिल्मों में काम किया। अमेज़ॅन प्राइम की चर्चित वेब सिरीज़ ‘द फॉरगॉटन आर्मी’ में भी अहम किरदार निभाया।
सौ से ज़्यादा नाटकों में अभिनय: बतौर अभिनेता श्री रैना ने सौ से ज़्यादा नाटकों में काम किया। उनके द्वारा निर्देशित किये नाटकों की फेहरिस्त लंबी है। उनमें से कुछ चर्चित नाटक हैं – कबीरा खड़ा बाज़ार में (ऊपर चित्र), द मदर, भानभट्ट की आत्मकथा, गोदान, तुम सआदत हसन मंटो हो, बाक़ी इतिहास, हिरोशिमा, हत्या एक आकार की, द ग्रेट ट्रायल, अंधा युग और जसमा ओड़न। रंगमंच में योगदान के लिये आपको कई पुरस्कार मिले। इनमें संगीत नाटक अकादमी (1995) और बीवी कारंत लाइफ़ टाइम एचिवमेंट अवार्ड (2007) प्रमुख हैं। आगे पढ़िये, अमेरिका में हिंदी नाटक का विरोध फिर ज़बरदस्त प्रशंसा – https://indorestudio.com/us-me-atankwadi-ki-premika/
‘क्या थियेटर में पैसा नहीं है? इस बारे में क्या बोले एम.के.रैना?
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