Wednesday, May 13, 2026
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क्यों टूटता जा रहा था राकेश श्रीमाल से संपर्क का ताना-बाना?

शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। हाल ही में राकेश श्रीमाल का कोलकाता में आकस्मिक निधन हो गया। 60 साल के राकेश श्रीमाल जब तक ख़ुद को ठीक महसूस करते रहे, उनकी कलम चलती रही। भोपाल से प्रकाशित अख़बार ‘सुबह-सवेरे’ में उनका स्तंभ छपता रहा। परंतु वे यह स्तंभ भी मुश्किल से लिख पा रहे थे। बीते एक साल से उनका अपने बहुत से साथियों से संपर्क टूटता जा रहा था। वे अपने आप में सिमटते जा रहे थे। आख़िर किस वजह से उनसे संवाद और संपर्क का ताना-बाना टूटता जा रहा था? मध्यप्रदेश कला और साहित्य जगत की बड़ी क्षति: राकेश श्रीमाल के करीबी मित्र और दैनिक ‘सुबह सवेरे’ के वरिष्ठ संपादक अजय बोकिल के अनुसार, ‘सुबह-सवेरे’ में उनका कॉलम ‘कला चर्या’ के बाद ‘जीवन चर्या’ हाल के दिनों में शुरु हुआ था। परंतु वे इस कॉलम को लिखकर भेजने में पहले की अपेक्षा विलंब कर रहे थे। उनका स्वास्थ बहुत खराब हो गया था। वे मुश्किल से सोच और लिख पा रहे थे। अजय बोकिल ने कहा, ‘उनका जाना मध्यप्रदेश के कला और साहित्य जगत के लिये एक बड़ी क्षति है। इंदौर में हम दोनों ने ‘प्रभात किरण’ से पत्रकारिता की शुरूआत की थी। कला और संस्कृति को लेकर उनकी समझ के साथ ही विचारों की समानता हमारी गहरी मित्रता वजह रही। वे इंदौर,भोपाल से गहरे तक जुड़े थे, मैं चाहता था कि वे अब यहीं पर आकर अपना काम शुरु करें। परंतु बेटी की पढ़ाई की वजह से वे कोई भी निर्णय नहीं ले पा रहे थे। और फिर..’
ज़बरदस्त रचनात्मक ऊर्जा से भरे थे राकेश श्रीमाल : उनके असमय निधन की वजह रही उनकी गंभीर बीमारी लिवर सिरोसिस। दिसंबर 2022 के अंतिम दिनों के आते-आते उनके शरीर ने पूरी तरह से जवाब दे दिया। इसके साथ ही अपनी विलक्षण वैचारिक प्रतिभा,नई सोच और दृष्टि से हलचल पैदा करते रहने नवोन्मेषी राकेश श्रीमाल, हम सबसे विदा हो गये। राकेश श्रीमाल के जाने के बाद मेरी उनके बारे में जिनसे भी बातें हुई, सभी ने एक बात ज़रूर कही, ‘राकेश जी में ग़ज़ब की क्रियेटिविटी थी, वे बहुत अलग तरह से सोचने और लिखने वाले कलमकार थे। हर बार कुछ नया प्रयोग उनकी विशिष्ट प्रतिभा थी जिससे वे चौंका देते थे’। बेशक उनकी इस रचनात्मक प्रतिभा की उर्वरता को बनाये रखने में उनकी पत्नी अनुराधा जी का भी योगदान रहा। इसके बावजूद कि वे कबीर की तरह एक फक्कड़ किस्म के इंसान रहे।जहाँ भी गये, अमिट छाप छोड़ी: इंदौर से लेकर भोपाल,मुंबई,दिल्ली,वर्धा,कोलकाता…वे जहाँ भी गये अपनी अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने  साहित्य और कला को लेकर जो भी पत्रिकाएं निकाली,आयोजन किये वे हमेशा के लिये यादगार बन गये। उनके निधन का समाचार उनकी क्रियेटिविटी को जानने,समझने और करीब से देखने वालों के लिये स्तब्ध करने वाली ख़बर थी। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि उनकी तबीयत इस कदर बिगड़ जायेगी कि…लेकिन सच यही था। उनका शरीर अंदर से बेहद कमज़ोर होता जा रहा था। चिकित्सकों ने उन्हें बेहद सख़्त हिदायतें दे रखीं थीं।
मानसिक बीमारी बढ़ती जा रही थी: शारीरिक दिक्कत के साथ ही राकेश जी को मानसिक समस्या भी परेशान करने लगी थी। वे सिज़ोफ्रेनिया जैसी भ्रम और आभासी बीमारी से घिरने लगे थे। उन्हें कुछ आवाज़ें सुनाई देने लगी कुछ आकृतियां नज़र आती थीं। घर से शाम को निकलने में डर लगने लगा था। इस मानसिक दशा के बारे में उन्होंने अपने कुछ मित्रों से चर्चा भी की थी। इस विषय में उन्हें किसी अच्छे मनोचिकित्सक से उपचार कराने की सलाह भी दी गई थी। ज़ाहिर है कि राकेश जी शारीरिक और मानसिक दोनों ही परेशानियों से जूझ रहे थे। इसलिये भी वे लगातार अपने आप में सिमटते और अकेले होते जा रहे थे।2021 की दस्तक के साथ स्थितियां बिगड़ने लगीं:  साल 2021 के आने के बाद से ही राकेश की स्थिति बिगड़ने लगी थी। एक बार गिरने की वजह से उन्हें लंबे समय तक अस्पताल और फिर घर पर बिस्तर पर रहना पड़ा था। इसके बावजूद वे बनती कोशिश रचनात्मक रूप से सक्रिय रहने की कोशिश कर रहे थे। सेवानिवृत होने के बाद वे नये सिरे से कुछ कामों की शुरूआत करने के बारे में योजनाएं बना रहे थे लेकिन वह सब अधूरा ही रह गये। वे दो-तीन कलाकारों पर किताबें लिख रहे थे। नई पत्रिका के बारे में विचार कर रहे थे।
पिछले साल के अंत तक वे काफी लोगों के संपर्क में थे: बीते साल अक्टूबर के महीने तक उनकी काफी साथियों से बातें हो रही थीं। उस महीने में उन्होंने मुझे फोन कर कहा था, ‘मैं दिसंबर में रिटायर होने वाला हूँ। इस मौके पर कोलकाता में उनके कुछ  विद्यार्थी उनपर के रचनात्मक कामों को लेकर एक विशेषांक निकालने जा रहे हैं। मैं चाहता हूँ उसके लिये तुम भी एक लेख लिखकर उन्हें भेज दो’। यही बात दिल्ली में उन्होंने चित्रकार मित्र सिरज सक्सेना से कही। अक्टूबर से कुछ और पहले उन्होंने मुझसे कहा था -‘ मैंने तुम्हारा नाटक ‘मोनिया दि ग्रेट’ नाटक पढ़ा है। उसका कोलकाता में शो कराना चाहता हूँ। लॉक डाउन के बाद अब हालात कुछ ठीक हो रहे हैं। कुछ प्लान करता हूँ’। सफ़दर शामी की चित्रकला पर किताब लिखना चाहते थे: बीते साल ही मुंबई में रह रहे चित्रकार साथी सफ़दर शामी को भी उन्होंने फोन से संपर्क कर कहा था, ‘मैं चित्रकला से जुड़े आपके काम को लेकर एक किताब पर काम करना चाहता हूँ। तुम कोलकाता आ जाओ। यहाँ पर आपकी चित्रकला से जुड़े काम को लेकर कुछ कलाकारों के साथ बातचीत का एक कार्यक्रम भी रखेंगे’। सफदर भाई के मुताबिक, उस वक्त राकेश श्रीमाल जी के दो-तीन बार फोन आये,बातें हुईं। उन्होंने ये शिकायत भी कि भई सफ़दर तुम कॉल नहीं करते हों। सफदर जी ने बताया, ‘मैंने राकेश जी को जब फोन करना शुरु किये, तब उनसे बात नहीं हो सकी, वे फोन ही नहीं उठा रहे थे फिर उनसे संपर्क लगभग टूट गया’।मुझे कुछ आवाज़ें सुनाई देती हैं: दिल्ली में राकेश जी के एक और मित्र डॉ.पकंज शर्मा रहते हैं। उन्होंने बताया, वे कुछ वक्त पहले कोलकाता जाना चाहते थे। उन्होंने यह बात राकेश श्रीमाल से कही। राकेश जी ने कहा -‘आ जाओ, अच्छा रहेगा’। मगर इसके बाद उनसे बात नहीं हो सकी। बाद में जब उनकी पत्नी अनुराधा जी से बातचीत हुई, तब पता चला कि वे काफी बीमार हैं। अपोलो अस्पताल में काफी समय तक भर्ती रहे। डॉक्टरों ने स्थिति गंभीर बताई है। इससे पहले जब उनसे बात हुई थी। तब उन्होंने यह भी कहा था, मुझे कुछ आवाज़ें सुनाई देती हैं। आकृतियां नज़र आती है। बाहर निकलने में डर लगता है।
इंदौर और भोपाल के लिये एक बड़ी क्षति: इंदौर में जन्मे राकेश श्रीमाल का जाना कला और साहित्य जगत की एक बड़ी क्षति है। उन्होंने अपनी पत्रकारिता की शुरूआत इंदौर में ‘प्रभात किरण’ और ‘नवभारत’ से की था। इंदौर में ‘लयशाला’ जैसी संस्था की स्थापना में आगे रहे। नृत्य,संगीत,नाटक,चित्रकला के कई आयोजन किये। ‘दि आर्ट गैलरी’ नाम की पत्रिका निकाली। फिर मध्यप्रदेश कला परिषद की मासिक पत्रिका ‘कलावार्ता’ का संपादन किया। बाद में मुंबई जनसत्ता से जुड़े। कला पृष्ठ के प्रभारी रहे। ‘सबरंग’ के कई विशिष्ट अंक निकाले। मुंबई में उन्होंने ‘थियेटर इन होम’ कॉन्सेप्ट की स्थापना की। रंगमंच संबंधी समीक्षाओं के लिये दिनेश ठाकुर ने गुलज़ार से उनका सम्मान कराया। बाद में वे दिल्ली आकर महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की पत्रिका ‘पुस्तक वार्ता’ के संपादक बने। फिर वर्धा से कोलकाता केंद्र में पहुँचे। वहाँ रहकर वे ‘ताना-बाना’ पत्रिका का संपादन करते रहे। वे ऐसे अनूठे संपादक थे जो ‘क’ अक्षर से पत्रिका निकालने जैसे साहसिक काम कर करने के साथ बड़ी रचनात्मक चुनौती पेश कर सकते थे।
उनके इस अनूठे शब्द संसार के साथ हमारे साथ उनकी प्रेम कविताएं भी हैं जिनमें अनुभूतियों और अभिव्यक्ति का एक अलग संसार है। कोई आया है शायद में वे लिखते हैं –
मैं तुमसे दूर रहते हुये
तुम्हारी देह के कागज़ पर लिख रहा हूँ
तुम इसे फाड़ मत देना
संभाल लेना
अपने ही जीवन में
किसी स्मृति की तरह
ताकि
मैं जीवित रह सकूँ
उस लिपि में
जिसे कोई भी नहीं पढ़ सकता।

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