Wednesday, September 9, 2026
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लगान के 25 वर्ष: एक असंभव सपने की सिनेमाई विजय गाथा

हेमंत पाल, इंदौर स्टूडियो: भारतीय सिनेमा के सुनहरे पन्नों को पलटें, तो कुछ फिल्में महज़ बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों से परे एक सांस्कृतिक आंदोलन बन जाती हैं। आज से ठीक पच्चीस साल पहले, 15 जून 2001 को एक ऐसी ही फिल्म रूपहले पर्दे पर उतरी थी, जिसने न सिर्फ औपनिवेशिक कालखंड की धूल भरी आंधियों को जीवंत किया, बल्कि पूरी दुनिया को भारतीय सिनेमा का लोहा मनवाया। ‘लगान: वन्स अपॉन अ टाइम इन इंडिया’: आशुतोष गोवारिकर के निर्देशन और आमिर खान के निर्माण में सजी ‘लगान: वन्स अपॉन अ टाइम इन इंडिया‘ महज एक क्रिकेट मैच की कहानी नहीं थी; यह मानवीय जिजीविषा, अटूट विश्वास और असंभव को मुमकिन कर दिखाने की एक ऐसी महागाथा थी, जिसकी गूंज ढाई दशक बाद भी उतनी ही स्पष्ट और प्रेरणादायक है।फिल्म 'लगान' का दृश्यनिर्माता बनने की झिझक से इतिहास रचने तक:
‘लगान’ का निर्माण उस दौर में हुआ जब आमिर खान एक सफल अभिनेता तो थे, लेकिन निर्माता बनने से कतराते थे। पिता ताहिर हुसैन के आर्थिक संघर्षों और कर्ज को देखकर उन्होंने कभी फिल्म न बनाने का प्रण लिया था। मगर, आशुतोष गोवारिकर की दमदार पटकथा ने उन्हें यह जोखिम उठाने पर मजबूर कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि आशुतोष की पिछली दो फिल्में फ्लॉप रही थीं, फिर भी कहानी पर भरोसे ने आमिर खान प्रोडक्शंस की नींव रखी और यह दांव भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ।फिल्म 'लगान' का दृश्यक्रिकेट के मैदान में आज़ादी का संघर्ष:
पहली नजर में यह एक खेल की कहानी लगती है, लेकिन इसकी असली ताकत इसके प्रतीकवाद में छिपी है। फिल्म में क्रिकेट सत्ता और प्रतिरोध के बीच संघर्ष का माध्यम है। चंपानेर के ग्रामीण अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाने के बजाय, उन्हीं के खेल में उन्हें चुनौती देते हैं। क्लाइमैक्स की वह आखिरी गेंद, केवल एक मैच का परिणाम नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ जीत की वह भावनात्मक अनुभूति थी जिसने हर भारतीय दर्शक को गर्व से भर दिया।फिल्म 'लगान' का दृश्यबिना खास तैयारी के गढ़ा गया अमर किरदार ‘भुवन’:
यह एक रोचक तथ्य है कि आमिर खान ‘लगान’ में अपने अभिनय को सबसे कम तैयारी वाला मानते हैं। निर्माता के रूप में बजट, लोकेशन और विशाल यूनिट की जिम्मेदारियों ने उनकी अधिकांश ऊर्जा ले ली थी। इसके बावजूद, एक आम किसान ‘भुवन’ का किरदार उनकी सहजता के कारण अमर हो गया, जो किसी सुपरहीरो जैसी ताकत से नहीं, बल्कि अपने अदम्य साहस और सच्चाई के दम पर असंभव को संभव बनाता है।फिल्म 'लगान' का दृश्यकच्छ की तपती रेत और ‘प्रेशर कुकर’ जैसी शूटिंग:
गुजरात के कच्छ में फिल्म की शूटिंग किसी युद्ध से कम नहीं थी। ब्रिटिश अधिकारी कैप्टन रसेल की भूमिका निभाने वाले पॉल ब्लैकथॉर्न ने इसे ‘प्रेशर कुकर’ जैसा अनुभव बताया था। चार महीनों तक 50 डिग्री की तपती गर्मी, धूल भरी आंधियों और टिड्डियों के हमलों के बीच भारतीय व ब्रिटिश कलाकारों ने पसीना बहाया। पर्दे पर दिखने वाला संघर्ष कृत्रिम सेट का नहीं, बल्कि इसी यथार्थपरक मेहनत का परिणाम था।फिल्म 'लगान' का दृश्यकिरदारों में रची-बसी प्रामाणिकता :
फिल्म के सहायक पात्र आज भी दर्शकों के जेहन में जिंदा हैं। मूक ढोल वादक ‘बाघा’ (अमीन हाजी) ने मूक-बधिरों के साथ समय बिताकर अपने किरदार को संवेदनशीलता से जीवंत किया। वहीं, ‘गोली’ (दया शंकर पांडे) का अजीबोगरीब गेंदबाजी एक्शन इतना सटीक था कि सौरव गांगुली और वीरेंद्र सहवाग जैसे दिग्गज क्रिकेटर भी इसे कंप्यूटर ग्राफिक्स का कमाल समझ बैठे थे।फिल्म 'लगान' की सीडी, एआर रहमान का यादगार संगीतऑस्कर का सफर और रहमान का रूहानी संगीत:
वर्ष 2002 में सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म श्रेणी में ऑस्कर नामांकन हासिल कर ‘लगान’ ने विश्व पटल पर भारत का मान बढ़ाया। आठ राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली इस फिल्म की कहानी यदि इसका शरीर थी, तो एआर रहमान का संगीत इसकी आत्मा था। ‘घनन घनन’, ‘मितवा’ और ‘चले चलो’ जैसे जावेद अख्तर के रचे गीत आज भी दर्शकों को सीधे चंपानेर के उसी गांव में खींच ले जाते हैं।फिल्म 'लगान' का दृश्यकच्छ के ग्रामीणों से किया गया वह खास वादा :
शूटिंग के दौरान कच्छ के स्थानीय लोगों ने पूछा था कि सिनेमाघर न होने के कारण क्या वे कभी यह फिल्म देख पाएंगे? आमिर खान ने वादा किया था कि पहली स्क्रीनिंग वहीं होगी। रिलीज से पहले पूरी टीम ने ब्रिटिश कलाकारों के साथ भुज पहुंचकर स्थानीय लोगों के लिए फिल्म का विशेष प्रदर्शन किया, जो इस प्रोजेक्ट के गहरे भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाता है।'लगान: वन्स अपॉन अ टाइम इन इंडिया'ढाई दशक बाद भी क्यों प्रासंगिक है ‘लगान’?
25 साल बाद भी ‘लगान’ का जादू इसलिए कायम है क्योंकि यह समय की सीमाओं में नहीं बंधी। यह टीमवर्क, नेतृत्व और सामूहिकता का ऐसा पाठ है, जिसमें राष्ट्रवाद है पर उग्रता नहीं। दिग्गज निर्माता नासिर हुसैन सही कहते थे, “महान फिल्में बनाई नहीं जातीं, वे बस हो जाती हैं।” ‘लगान’ भी भारतीय सिनेमा के इतिहास में केवल बनी नहीं, बल्कि एक चमत्कार की तरह घटित हुई है। (लेखक हेमंत पाल जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक और फिल्मों के ख्यात स्तंभकार हैं।) आगे पढ़िये – रंगमंच की पाठशाला में खिलता बचपन https://indorestudio.com/rangmanch-ki-pathshala/

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