‘लापता लेडीज़’ में दुल्हनों की अदला-बदली!

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जेद्दा (सऊदी अरब) से अजित राय की रिपोर्ट आमिर खान की पूर्व पत्नी किरण राव की नई फिल्म का नाम है ‘लापता लेडीज़’। यह फिल्म सऊदी अरब के जेद्दा में आयोजित तीसरे रेड सी अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह (RSIFF) में दिखाई गई जिसे दर्शकों ने काफी पसंद किया। आमिर खान और जियो स्टूडियो ने इस फिल्म को प्रोड्यूस किया है। यह फिल्म अगले साल 5 जनवरी 2024 को भारतीय सिनेमा घरों में रिलीज़ होगी। किरण राव ने ‘धोबी घाट’ (2011) के 12 साल बाद कोई फिल्म बनाई है। कहानी बिप्लव गोस्वामी की है। इसे स्नेहा देसाई ने लिखा है। फिल्म में मुख्य भूमिकाएं रवि किशन, स्पर्श श्रीवास्तव, प्रतिभा रत्ना, नीतांशी गोयल, गीता अग्रवाल, छाया कदम, दुर्गेश कुमार, सत्येंद्र सोनी की हैं। दो ग्रामीण औरतों की कहानी: ‘लापता लेडीज़’ दो ग्रामीण औरतों की कहानी है। दोनों शादी के बाद लाल जोड़े में अपने अपने पति के साथ ससुराल जाते वक्त ट्रेन में लंबे घूंघट की वजह से खो जाती हैं। पहली दुल्हन फूल का पति भूल से दूसरे की दुल्हन को लेकर अपने गांव के रेलवे स्टेशन पर उतर जाता है। उसकी असली दुल्हन फूल, ट्रेन में आंख लग जाने के कारण छत्तीसगढ़ के किसी पतीला रेलवे स्टेशन पर पहुंच जाती है। वहाँ दूसरी दुल्हन को उतरना था। तब था पर्दा प्रथा का प्रचलन: पतीला स्टेशन पर फूल को एक नकली अपाहिज भिखारी और उसके दोस्त छोटू की मदद मिलती है। वह रेलवे प्लेटफॉर्म पर चाय-पकौड़े की दुकान चलाने वाली एक चाची के यहां शरण लेती है। चाची मर्दों के धोखेबाज़ चरित्र से जली-भुनी बैठी है। उसे लगता है कि फूल के पति ने दहेज लेकर और सुहागरात मनाकर जान-बूझकर उसे छोड़ दिया है। जबकि फूल हमेशा शादी वाला लाल जोड़ा पहने रहती है क्योंकि उसे यकीन है कि एक-न-एक दिन उसे खोजता हुआ उसका पति जब यहां आएगा तो इसी लाल जोड़े के कारण उसे पहचान लेगा। घूंघट के फेर में साथ आई दूसरी दुल्हन : फूल का पति ससुराल से अपनी दुल्हन की विदाई कराकर मोटर साइकिल, नाव, बस और ट्रेन से जब अपने गांव पहुंचता है। दुल्हन का घूंघट उठाया जाता है तो पता चलता है कि यह तो किसी दूसरे की दुल्हन है जो लंबे घूंघट के कारण गलती से यहां आ गई है। फूल का पति जब थाने में अपनी पत्नी की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने जाता है तो थानेदार (रवि किशन) उससे फूल की फोटो मांगता है। उसके पास उसकी पत्नी के साथ शादी के समय खींचा गया एकमात्र ऐसा फोटो है जिसमें दुल्हन का चेहरा लंबे घूंघट से ढका हुआ है। अब समस्या है कि इन लापता औरतों की खोज कैसे की जाये ?दूसरी दुल्हन की अलग है कहानी: फूल का पति जिस दूसरी दुल्हन को गलती से घर ले आया है। उसकी भी रहस्यमय कहानी है। उसकी शादी मर्जी के खिलाफ एक अपराधी किस्म के बिगड़ैल से कर दी गई थी। वह उससे पीछा छुड़ाने के बारे में सोच ही रही। संयोग से फूल का पति उसे अपनी पत्नी समझ कर ले आया। वह सबसे पहले अपने मोबाइल का सिम कार्ड जलाकर, नया सिमकार्ड डालती है। ताकि उसके घर या ससुराल वाले उसे ढूंढ न पाए। असल में वह कृषि विज्ञान की पढ़ाई करना चाहती है। वह शादी के गहने बेचकर अपनी बहन को चुपके-चुपके मनी ऑर्डर करती है। गुमशुदा दुल्हन की तलाश का पोस्टर: वह फूल के पति की कल्पना से उसके गुमशुदा होने का पोस्टर बनाती है। उसे सारे रेलवे स्टेशनों पर चिपका दिया जाता है। उसी पोस्टर की मदद से पतीला स्टेशन से फूल को खोज निकाला जाता है। फूल की जगह आई दूसरी औरत का पति भी उसे खोजता हुआ गांव के थाने पहुंचता है। पुलिस इंस्पेक्टर को सबके सामने रिश्वत देकर वह उसे जबरदस्ती ले जाना चाहता है। पर यहां सब लोग उसके खिलाफ हो जाते हैं। सबकी मदद से दूसरी औरत आज़ाद होकर अपनी पढ़ाई पूरी करने चली जाती है।औरतों की दयनीय हालत पर टिप्पणी: किरण राव की यह फिल्म बेशक सुखांत है पर भारतीय समाज में औरतों की दयनीय हालत पर सख़्त टिप्पणी करती है। फिल्म की मेकिंग कामेडी स्टाइल में है। परंतु इसे यथार्थवादी तरीके से फिल्माया गया है। सभी चरित्र बेहद स्वाभाविक लगते हैं। लड़के की मां (गीता अग्रवाल) अपने पति पर हमेशा कटाक्ष करती रहती है। लड़के का बड़ा भाई शहर में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता है और अपनी पत्नी और बच्चों को गांव में छोड़े हुए हैं। उसकी पत्नी उसका चित्र बनाकर तकिए के नीचे रखती है और छुप-छुप के देखती रहती है। लड़के का दादा भी सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी से रिटायर होकर आया है। वह हमेशा आधी आंख खोलकर सोता है और नींद में बड़बड़ाता रहता है – जागते रहो। इलाके का विधायक एक चुनावी सभा में फूल के खो जाने की घटना को विरोधी दल की साज़िश और उनके द्वारा अपहरण बताता है। अब कहाँ निष्पाप और सीधा-सादा गाँव:  फिल्म में प्रकट हिंसा तो कहीं भी नहीं है। लेकिन चुटीले अंदाज में काफी कुछ कहा गया है। बस एक ही बात खटकती है कि किरण राव ने कुछ ज्यादा ही निष्पाप भाव (इनोसेंट) से गांव और ग्रामीण जनता को दिखाया है। भले ही इस फिल्म का समय 2001 के आस-पास का है और इलाका मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ का बार्डर है, पर इतना निष्पाप और सीधा सादा गांव तो आज कहीं नहीं बचा है।RSIFF में भारत की 3 फ़िल्में : रेड सी फिल्म समारोह में इस बार भारत से कुल तीन फिल्में दिखाई गई जिसमें दो हिंदी और एक पंजाबी की है। किरण राव की ‘लापता लेडीज़’ के साथ-साथ करण जौहर और गुनीत मोंगा द्वारा निर्मित निखिल नागेश भट्ट की ‘किल’ और टी सीरीज के भूषण कुमार और अन्य द्वारा निर्मित भारतीय मूल के कनाडाई फिल्मकार तरसेन सिंह की पंजाबी फिल्म ‘डियर जस्सी’ को भी यहां काफी पसंद किया गया। ‘डियर जस्सी’ को ‘ओ माय गॉड -2’ के निर्देशक अमित राय ने लिखा है। (अजित राय प्रख्यात कला और फिल्म समीक्षक हैं। दुनिया के प्रमुख फिल्म उत्सवों की हिन्दी में रिपोर्ट्स के वे अग्रणी पत्रकार हैं।) आगे पढ़िये –

#RSIFF: ‘इन फ्लेम्स’ को मिला बेस्ट फ़िल्म का गोल्डन यूसर अवॉर्ड

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