(लेख: नितिन सप्रे/पोट्रेट: सफ़दर शामी)
इंदौर स्टुडियो। भारत रत्न लता मंगेशकर के पिता दीनानाथ मंगेशकर एक अच्छे ज्योतिषी भी थे। लता के जन्म से पहले ही उन्हें इस बात का अहसास हो गया था कि उनकी होने वाली बेटी में कुछ दैवीय अंश हैं। उन्होंने लता को बताया था कि वो ऐसी सफलता हासिल करेगी जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता, लेकिन उसकी इस कामयाबी को देख पाना मेरे नसीब में नहीं होगा। ख़ुद लताजी ने एक इंटरव्यू में पिता की इस भविष्यवाणी के बारे में बताया था। पढ़िये लता मंगेशकर के जीवन प्रसंगों और उनके संगीत सफ़र से जुड़ी रोचक दास्तां का यह स्मृति लेख।
पिता ने की थी विवाह न हो पाने की भविष्यवाणी: दीनानाथ मंगेशकर ने अपने ज्योतिषीय आकलन में यह भी बताया था कि उनकी बेटी लता की शादी नहीं हो सकेगी। उसे बहुत कम उम्र में ही पारिवारिक ज़िम्मेदारी का दायित्व उठाना होगा। उसे अपने काम को पाने और सीखने के लिये अथक श्रम करना होगा। पिता की भविष्यवाणी सत्य साबित हुई। लता जी अविवाहित रहीं और उन्हें महज़ 13 साल की कम उम्र से ही पेशेवर गायन की दुनिया में क़दम रखना पड़ा। काम की तलाश में एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो के चक्कर काटना पड़ा। पुणे का आशियाना छोड़कर मुंबई आना पड़ा। उनके पिता मराठी रंगमंच के सिद्धहस्त कलाकार और शास्त्रीय गायक थे। पिता के साथ लता जी 5 साल की उम्र से मराठी स्टेज पर काम कर रहीं थीं, लेकिन उनका साया उठ जाने के बाद उन्हें अकेले ही अपने जीवन को आगे बढ़ाना पड़ा। उन्हें अभिनय करना पसंद नहीं था लेकिन पारिवारिक ज़िम्मेदारियों की वजह से उन्हें फिल्मों में अभिनय भी करना पड़ा।1942 में उन्होंने पहली बार ‘मंगलगौर’ फिल्म में काम किया था।
पिता संगीत के आकाश के आफ़ताब: पिता के अकस्मात् निधन के बाद लता की शास्त्रीय संगीत की शिक्षा भी रूक गई। उनकी शुरूआती संगीत शिक्षा पिता से ही मिल रही थी। पिता मास्टर दीनानाथ से नन्ही लता जी की तालीम पुरिया धनाश्री से शुरु हुई थी। पिता के निधन के पश्चात मास्टर विनायक ने शास्त्रीय संगीत की तालीम आगे बढ़ाने में मदद की। इस तरह पहले अमान अली भिंडी बाज़ार वाले और फिर उस्ताद अमानत ख़ां देवास वाले से उनकी संगीत शिक्षा आगे बढ़ी। बाद में पंडित तुलसीराम शर्मा और उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ साहब से भी उन्हें शास्त्रीय संगीत की तालीम मिली। परंतु पार्श्वगायन की बढ़ती व्यस्तता और बढ़ती ज़िम्मेदारियों की वजह से वे संगीत की तालीम जारी नहीं रख सकीं। इस बात का उन्हें ताउम्र मलाल रहा। एक साक्षात्कार में लताजी ने कहा था, ‘काश मैं क्लासिकल संगीत की तालीम फिर से शुरू कर पाती। हालांकि मेरी कोशिश जारी रही। उन्होंने विनम्रता से यह भी कहा, ‘संगीत एक ऐसी कला हैं जिसमें कभी भी कोई परिपूर्णता हासिल नहीं कर सकता। भले ही आप सफलता की चोटी पर पहुँच जायें लेकिन यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि आपने कुछ पा लिया है’।
दिलीप कुमार की वजह से सीखी उर्दू :पिता के मृत्यु के बाद जब लताजी बेसब्री से काम की तलाश रही थी, तब अनिल बिस्वास ने एक फिल्म के लिये उन्हें गायिका के रूप में चुना था। फिल्म के नायक थे दिलीप कुमार। जब लता को उनसे मिलवाया गया तो नाम सुनते उन्होंने प्रतिक्रिया में कहा, ये तो मराठी गायिका हैं। मराठी कलाकारों के तलफ्फुज़ में कुछ कमी रह जाती है। स्वाभाविक रुप से लताजी को दिलीप कुमार की यह बात अच्छी नहीं लगी लेकिन उन्होंने इस बात को अन्यथा नहीं लिया बल्कि संगीतकार मोहम्मद शफी से उर्दू सीखने के लिये मदद मांगी और फिर उन्होंने बकायदा उर्दू की तालीम हासिल की। इस तरह वे दिलीप कुमार की शुक्रगुजार रहीं कि उनकी वजह से वे उर्दू सीख गईं जिससे उनकी गायन में आगे की राह आसान हुई। बाद में लता जी और दिलीप साहब में भाई-बहन का अटूट रिश्ता बना। हर साल लताजी ने दिलीप साहब को राखी बाँधी। एक बार दिलीप कुमार ने लता जी के लिये अदालत में एक प्रोड्यूसर के खिलाफ़ ख़ुद केस लड़ा। प्रोड्यूसर ने लता जी पर पैसे लेने का झूठा आरोप लगाया था। दिलीप कुमार ने केस लड़ने के लिये बकायदा कानूनी तैयारी की। केस जीतने के बाद कहा, ‘बहन तुम बेफिक्र रहो। हमने केस जीत लिया है’।
आज़ादी के साथ शुरू हुआ पार्श्वगायन :
अगस्त 1947 में देश की आज़ादी के साथ-साथ ही लताजी के पार्श्वगायन का सिलसिला भी शुरू हुआ। 1948 से संघर्ष की राह धीरे-धीरे कुछ आसान होने लगी। सालभर के अंदर ही लता ने फिल्म का हिट गीत ‘आयेगा-आयेगा आनेवाला’ को आवाज़ दी। इसके साथ ही फिल्म इंडस्ट्री और आलोचकों ने मान लिया कि लताजी पार्श्व गायन में बहुत दूर तक जायेंगीं। 1949 में उनकी महल,दुलारी,बरसात और अंदाज़ जैसी फ़िल्में आईं और फिर वे गायिका के शिखर पर हमेशा के लिये स्थापित हो गईं। वे शंकर जयकिशन, एस.डी.बर्मन, सी.रामचंद्रन मोहन, हेमन्त कुमार और सलिल चौधरी जैसे नामी-गिरामी संगीतकारों की चहेती गायिका बन गईं। साहिर लुधियानवी के लिखे गीत और एस.डी. बर्मन के संगीत निर्देशन में लता ने कई हिट गाने गाये। साहिर लुधियानवी के रचित गीत पर लता ने वर्ष 1961 में फिल्म “हम दोनों” के लिए ‘अल्लाह तेरो नाम. भजन गाया’ जो सुपरहिट हुआ। हेमंत दा के संगीत निर्देशन में “आनंद मठ” के लिए लता मंगेशकर ने “वन्दे मातरम..” गीत गाकर अपनी एक अलग पहचान बनाई। सी. रामचंद्र के संगीत निर्देशन में लता ने प्रदीप के लिखा गीत “ए मेरे वतन के लोगों..” गाया, 1963 में गणतंत्र दिवस के समारोह में दिल्ली में लता जी ने यह गीत गाया था, गीत को सुनकर प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की आंखों से आंसू बह निकले थे।
आवाज़ के मुरीद बने दिग्गज संगीतकार :अनिल बिश्वास, सलिल चौधरी, शंकर जयकिशन, एस.डी. बर्मन, आर.डी. बर्मन, नौशाद, मदनमोहन, सी. रामचंद्र जैसे तमाम संगीतकार उनकी आवाज़ और हुनर के कायल रहे। लता जी ने “दो आंखें बारह हाथ”, “दो बीघा ज़मीन,” “मदर इंडिया”, “मुग़ल ए आज़म” जैसी कई बड़ी फिल्मों के गीत गाये। राजकूपर जैसे शो मैने हमेशा उनकी आवाज़ को प्राथमिकता दी। उन्हें चार बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1958 में फिल्म “मधुमती” के गीत आजा रे परदेसी..,1962 में फिल्म “बीस साल बाद” के गाने कहीं दीप जले कहीं दिल, 1965 में फिल्म “खानदान” के तुम्हीं मेरे मंदिर तुम्हीं मेरी पूजा और 1969 में फिल्म “जीने की राह” के गाने आप मुझे अच्छे लगने लगे.. के लिए लताजी को फिल्म फेयर अवार्ड मिले।
कई बड़े पुरस्कार और सम्मान मिले : 1994 में लता मंगेशकर फिल्म “हम आपके हैं कौन” के गाने दीदी तेरा देवर दीवाना.. गाने के लिए फिल्म फेयर के विशेष पुरस्कार का सम्मान मिला। उनके गाए गीत के लिए 1972 में फिल्म “परिचय”, 1975 में “कोरा कागज” और 1990 में फिल्म “लेकिन” के लिए नेशनल अवार्ड से नवाज़ा गया। बॉलीवुड की इस लाजवाब आवाज़ को पदमभूषण,राजीव गांधी सम्मान,पद्मविभूषण के साथ ही 1989 में फिल्म जगत का सर्वोच्च दादा साहेब फाल्के और 2011 में देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया। उनके नाम पर गिनीज़ बुक में 30 हज़ार से ज़्यादा गीत गाने का रिकॉर्ड दर्ज है। इसमें कोई शक नहीं कि लता की आवाज़ में जो रूहानी कशिश है, वो बात फिल्म इंडस्ट्री की किसी और महिला गायिका में महसूस नहीं की गई। हालांकि लता जी ने बड़ी विनम्रता से हमेशा कहा, मेरी आवाज़ विलक्षण है और उसे अमरत्व प्राप्त हो गया है, मैं ऐसा नहीं मानती। इतना ज़रूर कहती हूं कि मुझे औरों की अपेक्षा ज़्यादा मिला, यह नसीब की बात है।
सहज,सरल स्वाभाव,लगन से काम : लता जी के बारे में गीतकार गुलजार ने एक साक्षात्कार में कहा था, लताजी को जो भी गीत गाना होता, वे उस पूरे गीत को ख़ुद लिखती हैं ताकि वे उसे ठीक तरह से पढ़कर समझ सकें, किसी छोटी ग़लती की भी गुंजाइश न रहे। पार्श्व गायन में श्रेष्ठतम माने जाने के बावजूद उनका व्यवहार एकदम सरल रहा। लताजी से जुड़ा वे एक किस्सा बताते हैं, ‘फ़िल्म ‘घर’ लिखे एक गीत, ‘आपकी आँखों में कुछ’ के अंतरे में मैंने बदमाश लफ़्ज़ का उपयोग किया है। इस पर संगीतकार आरडी बर्मन को लग रहा था कि शायद लताजी इस लफ़्ज़ पर एतराज़ करें। मैंने कहा, हम वैकल्पिक शब्द भी रखते हैं, मगर कुछ बदलने से पहले उनसे बात कर देखते हैं। अब हमने दीदी से बात की। इस पर दीदी ने सहजता से कहा, ‘उन्हें कोई एतराज़ नहीं है, बल्कि अंतरे में जिस तरह से वह लिखा गया है उस हिसाब से उन्हें एक नया लफ़्ज़ गाने को मिला है। उन्होंने गाते वक्त एक हल्की सी हंसी के साथ गीत में उस लफ़्ज़ को बड़ी खूबी से निभाया’।
क्या ओपी नैयर से
थी अनबन ? :
फिल्म इंडस्ट्री के तमाम संगीतकारों ने लताजी की आवाज़ का भरपूर उपयोग किया, मगर ओपी नैयर ने लताजी के साथ कभी काम नहीं किया। इसपर कहा जाने लगा कि दोनों में कुछ अनबन है। कई तरह ही अफवाहें उड़ीं। यह बात लताजी को हमेशा ख़राब लगी। उन्होंने कई बार ओपी नैयर के साथ अपनी अनबन की अफ़वाहों को खारिज किया। ओपी नैयर के निधन के बाद मैंने लताजी से दूरदर्शन के लिये उनकी शोक संवेदना रिकॉर्ड करने को लेकर बातचीत की थी। तब स्वास्थ ठीक न होने के बावजूद उन्होंने नैयर साहब को लेकर भावपूर्ण संवेदना ज़ाहिर की थी। उन्होंने बताया था कि दोनों का ही हमेशा एक दूसरे के प्रति बहुत आदर का भाव रहा। बल्कि एक बार ऐसा भी हुआ कि एक गीत की रिकॉर्डिंग के लिये डेट भी फिक्स हो गई। मगर साइनस की दिक्कत की वजह से मैं रिकॉर्डिंग में नहीं जा सकी। और वह मौका भी टल गया। दोनों का यह भी मानना था कि नैयर साहब के संगीत में जिस तरह की आवाज़ की ज़रूरत थी वह लताजी की आवाज़ से मेल नहीं खाती थी। इसलिये भी तालमेल नहीं बैठ सका।
पार्श्व गायकों के लिये लड़ी अहम जंग : लताजी ने गायक कलाकारों के लिये एक अहम लड़ाई भी लड़ी थी। एक दौर था जब पार्श्व गायकों का टाइटल्स में नाम नहीं दिया जाता था। लताजी ने राज कपूर से इस बात का ज़िक्र किया था। राज जी ने उनकी बात को फौरन समझा। फिल्म ‘बरसात’ लता मंगेशकर और मुकेश का नाम दिया गया और उसके बाद से पार्श्वगायकों के नाम भी शामिल किये जाने लगे। इसी तरह ग्रामोफोन रेकॉर्ड पर पहले हीरो हीरोइन के किरदारों के नाम देने का चलन था। मिसाल के लिये फिल्म ‘महल’ के गानों की रेकॉर्ड पर फिल्म की मुख्य किरदार कामिनी का नाम दिया गया था। लताजी ने इसके लिये भी संघर्ष किया, जिसमें राज कपूर और नौशाद साहब की मदद मिली। इस तरह फिल्म ‘बरसात’,’अंदाज’ की रेकॉर्डस् से गायकों के नाम देने का प्रचलन शुरू हुआ।
बहनों के अनबन की विवादित कहानी : लता जी और आशा भोंसले के बीच संबंधों को लेकर भी बहुत कुछ कहा, लिखा जाता रहा। कहानियां बनाई और सुनी-सुनाई गईं। कहा गया कि दोनों में आपसी प्रतिस्पर्धा की वजह से मनमुटाव है। मगर दोनों बहनों में कभी प्यार कम नहीं हुआ। न ही लता दी ने कभी आशा के लिये अपना प्यार कम किया। लताजी अब संगीत या सार्वजनिक कार्यक्रमों में कम ही जाती हैं लेकिन आशाजी जब कभी संगीत के कार्यक्रमों में जाती हैं, अक्सर दीदी की तारीफ किये बिना नहीं रहती। यह सच है कि दोनों के बीच कुछ साल तक बातचीत बंद थी लेकिन इसकी आशा के पहले पति गणपतराव भोसले थे, जिनके साथ आशा भोंसले ने 13 साल की उम्र में किसी को बताये बिना शादी कर ली थी। इसके बाद की पारिवारिक स्थितियां बेहद नागवार और असहज रहीं। परंतु बाद में सबकुछ सामान्य हो गया।
इसी तरह सुमन कल्याणपुर और वाणी जयराम को भी फिल्म इंडस्ट्री में आगे बढ़ने से रोकने के लताजी पर आरोप लगे। परंतु लताजी ने इन बातों को भी हमेशा ही खारिज किया। एक साक्षात्कार में लताजी ने कहा था, सुमन जी को उन्होंने अपना रिर्हसल किया गीत दे दिया था। इसी तरह वाणी जयराम के गायन की उन्होंने ही सबसे पहले प्रशंसा की थी।
मेरा कोई पुर्नजन्म ना हो : एक साक्षात्कार में लताजी ने कहा, ‘हिंदू ,पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं । मैं भगवान से प्रार्थना करुंगी की मेरा कोई पुनर्जन्म ना हो लेकिन अगर हो तो वह महाराष्ट्र में किसी छोटे परिवार में एक लड़के के रूप में हो। …लता जी की कामना चाहे जो हो लेकिन उनके चाहने वालों की तमन्ना यही है कि लता की आवाज़ उन्हें हर जन्म सुनने को मिले, वो आवाज़ जो सदियों में एक बार जन्म लेती है। (चित्र साभार सौजन्य: गूगल सर्च और अन्य पत्र-पत्रिका स्त्रोत)
(लेखक नितिन सप्रे भारतीय सूचना सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप डी.डी.न्यूज,(दूरदर्शन) नई दिल्ली में उप निर्देशक के पद पर कार्यरत हैं l लेख में व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।)

