Wednesday, May 13, 2026
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लेखक आजकल लिख ज़्यादा रहे हैं, पढ़ कम रहे हैं-डॉ. राम विद्रोही

ग्वालियर,19 मई ( डॉ.राकेश पाठक )। लेखक आजकल लिख ज्यादा रहे हैं,पढ़ कम रहे हैं। आज जो लिखा जा रहा है,जो छापा जा रहा है वो आम आदमी को उद्वेलित क्यों नहीं करता, इसपर विचार करने की ज़रूरत है। वरिष्ठ संपादक डॉ.राम विद्रोही ने यह बात नगर में जारी पुस्तक मेले में बतौर मुख्य अतिथि कही। संगोष्ठी का विषय था-‘किताबें कैसे पहुंचें गांव ?’ परिसंवाद का आयोजन ‘ग्रामीण पत्रकारिता विकास संस्थान’ ने राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के सहयोग से किया था।

 

गांवों में पुस्तकालयों का वजूद नहीं -डॉ. विद्रोही

डॉ.वद्रोही ने कहा, इस बात पर भी गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है कि आख़िर गांवों तक किताबें कैसे सुविधाजनक तरीके से पहुंचें ? गांवों और स्कूलों में पुस्तकालयों का कोई वजूद ही नहीं है। विश्वविद्यालयों तक के पुस्तकालय बेहाल हैं। शिक्षा की प्रणाली बदलने से हम किताबों से भी दूर हो गए हैं। छपे हुये शब्द की महत्ता हमेशा रही है लेकिन आज हालात बदल गए हैं। साहित्य समाज को सुसंस्कृत बनाता है। गांव तक पुस्तकालयों की श्रृंखला स्थापित करना होगी।

गांव में किताबें नहीं पहुंच रहीं – सुरेंद्र माथुर

वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र माथुर ने कहा कि आज बिजली, इंटरनेट सब गांव तक पहुंच गए हैं लेकिन किताब नहीं पहुंच रही है। किताबें दुनिया की , समाज की, मूल्यों की जानकारी किताबों से मिलती है। किताब किसी को धोखा नहीं देती। किताब दूर दूर ,गांव-गांव तक पहुंचना ही चाहिए। परिसंवाद में वरिष्ठ पत्रकार रविन्द्र झारखरिया ने अपने संबोधन में कहा, किताबों और गांव के बीच का बिंदु होता है पाठक। जब किताब की बात होगी तो केंद्र में पाठक की बात जरूर होगी। बदलाव के दौर में गांव की तस्वीर भी उलट गयी है। बाज़ारवाद के असर से किताबें भी अछूती नहीं हैं। इसका असर लेखक पर भी होता ही है। हर साल 10 लाख गांव के लोग उपभोक्ता के रूप में बाजार से नये जुड़ते हैं। आज बाज़ार ख़ुद चलकर उपभोक्ता के दरवाजे पर चलकर आता है। हमारी संवेदनाएं मर रहीं हैं ये खतरनाक स्थिति है। किताबों जैसा तालमेल टीवी या इंटरनेट से सम्भव नहीं है। लेखक को भी गांव से जुड़ना होगा तब रचना या किताब गांव तक पहुंचेगी।

मोबाइल वैन से गांवों तक पहुंचे पुस्तकें – सुभाष अरोरा

जनसंपर्क के सेवानिवृत्त संयुक्त संचालक सुभाष अरोरा ने कहा कि लोककल्याणकारी राज्य का पहला काम नागरिकों को हर सुविधा प्रदान करना है। समाज को शिक्षित करने का काम भी इसमें शामिल है। उत्तर पूर्व के राज्यों में अन्य राज्यों की तुलना में पाठकीय प्रवृत्ति बेहतर है। पुस्तकालय आंदोलन को बढ़ाना आवश्यक है। मोबाइल वेैन के ज़रिए गांव-गांव तक क़िताबों को पहुंचाना चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार और कथाकार प्रमोद भार्गव ने कहा कि ग्रामीण समाज ने मिथकों तक का संरक्षण किया। ग्राम्य जीवन लोककथाओं तक के लिए जागरूक रहा है। वाचिक परम्परा के जरिये गांवों ने साहित्य को हमेशा सुरक्षित रखा है। आज गलत नीतियों के कारण किताबों को गांव तक पहुंच नहीं पा रहीं। जिला स्तर तक लगने वाले मेले तक बंद हो गए हैं। इंटरनेट ने किताबों की पठनीयता को कम किया है। अनुचित सामग्री इस माध्यम से लोगों तक पहुंच रहीं हैं इस पर रोक लगाना चाहिये।

संगोष्ठी के प्रारंभ में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के सम्पादक पंकज चतुर्वेदी ने ‘गांव तक किताबें कैसे पहुंचे’ विषय की रूपरेखा रखी। उन्होंने पुस्तक न्यास द्वारा किताबों के प्रचार, प्रसार के लिए किए जा रहे कामों की जानकारी दी। आभार प्रदर्शन संस्थान के अध्यक्ष देव श्रीमाली ने जताया। इस अवसर पर मप्र उर्दू अकादमी द्वारा हाल ही ‘शिफा ग्वालियरी अवार्ड’ से सम्मानित रश्मि सबा और पन्नालाल’नूर’ अवार्ड से सम्मानित अतुल अज़नबी का अभिनंदन भी किया गया। रश्मि और अतुल ने अपने चुनिंदा शे’र भी सुनाए।

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