शकील अख़्तर,इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। ‘लिटिल थेस्पियन की धड़कन और मेरी ज़िदंगी थे अज़हर। मेरा बस चलता तो मैं उनके साथ ही चली जाती। मगर इस कोरोना काल में हमारे परिवार के सात लोग इस दुनिया से चले गये। ऐसे हालात में मुझे अपने पूरे परिवार को लेकर चलना है। मुझे उन सबकी हिम्मत बनकर खड़े रहना है। वो सब मेरी तरफ़ बड़ी उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं। बस इसीलिये मैं मुस्कराकर आगे बढ़ रही हूं, ज़िंदा हूं।
वरना हम सब तो बेइंतेहा दर्द में डूबे हुए हैं।’
कोलकाता रंगमंच समूह ‘लिटिल थेस्पियन’ की प्रमुख,अभिनेत्री,निर्देशक, कवियित्री और कहानीकार उमा झुनझुनवाला ने यह बात कही। वे स्व. प्रो.एसएम अज़हर आलम की पत्नी हैं। इसी साल अप्रैल में अज़हर आलम का अकस्मात् निधन हो गया था। वे कोरोना की दूसरी लहर में अपने पूरे परिवार समेत संक्रमित हो गये थे। संक्रमित होने से पहले तक वे रंगमंच के लिये बड़ी सक्रियता से काम कर रहे थे। दिल्ली में अपने नाटक ‘रूहें’ के लिये नटरंग प्रतिष्ठान से नेमिचन्द जैन नाट्य लेखन अवॉर्ड से पुरस्कृत होने के तुरंत बाद कोलकाता में अपने नाट्य समारोह ‘जश्न ए रंग’ के लिये बड़ी ऊर्जा से उन्होंने काम किया था। उनके नाट्य समूह ‘लिटिल थेस्पियन’ का यह दसवां राष्ट्रीय नाट्य समारोह था।
उमा जी ने कहा, अप्रैल में पहले मेरे पिता, फिर अज़हर, छोटी भाभी, ननद की सास और उनके पति और फिर चाचा-चाची इस दुनिया से चले गये । उन्होंने कहा, ‘अज़हर के जाने के बाद रंगमंच के इस सफ़र में मैं बिल्कुल तन्हा रह गई हूं। अज़हर के साथ रात-रात भर नाटक की बातें होती थीं। हम कार्यक्रमों की योजना बनाते हुए सारी की सारी रात आँखों में गुज़ार देते और उजाला होते ही मॉर्निग वॉक पर निकल पड़ते थे। सच तो यह है कि अज़हर ने एक तरह से अपना पूरा जीवन ही रंगकर्म को दे दिया था’।
उमा जी ने बताया, ‘अंतिम वक्त तक वे लगातार रंगकर्म से जुड़ा काम कर रहे थे। श्रीराम सेंटर, दिल्ली के लिये उन्होंने ब्रात्य बासु के एक नाटक ‘मीर जाफ़र’ को तकरीबन तैयार कर लिया था लेकिन लॉक डाउन के कारण शो नहीं हो पाया। अगर संभावना बनी तो इस नाटक का काम मैं पूरा करूंगी। अज़हर ने इसी साल मार्च में अपनी तीसरा मौलिक नाटक ‘चाक’ भी पूरा लिख लिया था। अब उस नाटक का मैं ‘जश्न ए अज़हर’ समारोह के बाद अलग से निर्माण करूंगी।’ आपको बता दें, प्रो.अज़हर आलम के अन्य नाटकों के नाम ‘रूहें’ के अलावा,’नमक की गुड़िया’ और ‘सुलगते चिनार’ भी हैं। उन्होंने अंग्रेज़ी,बांग्ला और उर्दू से भी कई कृतियों का अनुवाद और उसका रंगमंच के लिये सदपुयोग किया था।
जब मैंने उनके काम के आकलन को लेकर सवाल किया तब उमा जी कहा, ‘यह हिसाब तो हमने कभी लगाया नहीं कि हमने पिछले करीब 27 सालों में रंगकर्म से जुड़ा कितना काम किया, कितने नाटक किये, कितनी वर्कशॉप की, कितने बच्चों को थियेटर का प्रशिक्षण दिया। मगर अज़हर ने तकरीबन 70 से अधिक नाटकों में अभिनय और 30 से अधिक नाटकों को तैयार और निर्देशित करने का काम किया। सभी नाटकों के एक हज़ार से ज़्यादा शोज़ किये। उन्होंने तीन मौलिक नाटक लिखे, कुछ अनुवादित किये। देश के कई राज्यों में हमारे शोज़ हुए। खुद मैंने भी 100 से ज़्यादा वर्कशॉप की। 38 कहानियां निर्देशित की। अज़हर के साथ नाटकों में अभिनय किया और उनके साथ थेस्पियन की कमान संभालती रही। उन्होंने बताया, उनके लिखे नाटक ‘रूहें’ और ‘नमक की गुड़िया’ के अलावा एंडगेम,चेहरे,धोखा,कबीरा खड़ा बाज़ार में, रेंगती परछाइयां, गैंडा, पतझड़,सवालिया निशान, हयवदन,महाकाल, मंटो ने कहा,ब्लैक संडे आदि उनके निर्देशित बहुत चर्चित नाटक रहे। बहुत से नाटकों में हमने साथ काम किया’।
उमा जी ने कहा,’1992 से हम रंगकर्म साथ कर रहे थे। कोलकाता युनिवर्सिटी में हम पहली बार अगस्त 1990 में मिले थे। वे ऊर्दू लिटरेचर में एमए और मैं हिन्दी साहित्य में एमए कर रही थी। मैं यूनिवर्सिटी की कल्चरल सेक्रेटरी थी। एक कार्यक्रम के बाद से हम जुड़े और नाटकों के लिये साथ काम करने लगे। जैसे मैं उनके परिवार की चहेती हूं वैसे ही अज़हर मेरे परिवार में सबके प्यारे रहे। अज़हर के परिवार में सभी मेरी बहुत परवाह करते हैं। आज अज़हर नहीं लेकिन उनकी गै़र मौजूदगी में ख़ुद को समेटकर चल रही हूं। मुझे तो लगता है, अज़हर गये नहीं बल्कि ईश्वर ने उन्हें हमसे छीन लिया है। हम अगले साल जनवरी में ‘जश्न ए अज़हर’ नाम का रंगोत्सव करने जा रहे हैं। इसमें कुल 6 नाटकों का मंचन होगा। अज़हर अभिनीत 4 नाटकों की स्क्रीनिंग होगी। हमारी प्रोफेशनल रेपेटरी चलती रहेगी।
अज़हर सरकारी कॉलेज में उर्दू के प्रोफ़ेसर थे। उनके कॉलेज ने अज़हर को सम्मान देते हुए उनके नाम के अवॉर्ड की घोषणा की है। इसी वर्ष से उर्दू एमए के सेकंड टॉपर को अज़हर आलम अवॉर्ड दिया जाएगा। इसके साथ ही कलकत्ता की मशहूर इदारा मुस्लिम इंस्टीट्यूट ने भी अज़हर आलम की याद में अवार्ड् की घोषणा की है। इससे पहले यहां के फाइन आर्ट्स अकादमी में उनकी याद में एक श्रद्धाजंलि कार्यक्रम हुआ। उनकी याद में एक फ़िल्म का प्रदर्शन हुआ। यहां के कलाकारों और दिग्गजों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।
उमा जी ने कहा,’अज़हर का यह काम रूकेगा नहीं। शो मस्ट गो ऑन की तर्ज पर चलता रहेगा।’ उमा जी ने अज़हर आलम मेमोरियल ट्रस्ट की स्थापना की है जिसमें देश के कई प्रसिद्ध हस्तियाँ जुड़ी हैं। इस ट्रस्ट के 4 मुख्य उद्देश्य हैं। 1) उनकी याद में हर वर्ष एक रंग-व्यक्तित्व को अज़हर आलम मेमोरियल अवॉर्ड, 2) वर्ष में तीन से चार सेमिनार, 3) अज़हर आलम मेमोरियल फेलोशिप जो हर वर्ष हिन्दी/उर्दू भाषा में रंगमंच पर शोध करने के लिए दी जाएगी, 4) अज़हर आलम मंच का निर्माण। ज़ाहिर है कि यह मेमोरियल ट्रस्ट स्व. अज़हर की याद का सिलसिला बना रहेगा। वे एक बेहतरीन अभिनेता,निर्देशक और नाटककार थे। उन्होंने रंगमंच में पीएचडी की थी। 1987 से लगातार थियेटर के लिये समर्पित रूप से काम कर रहे थे।
उमा झुनझुनवाला से बात करते महसूस हुआ कि वो किसी तरह अपने सदमे से उभरने की कोशिश कर रही हैं। टूटे मन को जोड़ रही हैं। वे एक संवेदनशील अभिनेत्री होने के साथ एक कहानीकार और कवियित्री भी हैं। वे भावनाओं के प्रवाह में बहती रहती हैं। उनका एक हफ़्ते पहले ही एक नया कहानी संग्रह ‘लाल फूल का जोड़ा’, प्रलेक प्रकाशन,मुंबई से प्रकाशित हुआ है। यह संग्रह अब एमेजॉन पर उपलब्ध है। ज़ाहिर है कि उनकी रचनात्मकता का सिलसिला फिर आगे बढ़ रहा है। हालांकि मन है कि अज़हर की याद में डूबा हुआ है। उन्होंने अपने जीवन साथी को याद करते हुए लिखा है-
‘अगर तुम चाहो तो / लिख दूँ सारे जज़्बात / अपनी छुअन से / उन रिक्त बिन्दुओं में / भेजी थी जो तुमने / साँझ ढले या चाहो तो / लिख दूँ सारे अफ़साने / अपनी आँखों से तुम्हारी आँखों की / मुस्कुराती जगमगाती सुबह पर / या लिख दूँ / अपनी साँसों को / तुम्हारी साँसों पर / जलती है जो हमारे मध्य / पवित्र ज्योति बनकर…’
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आगे देखिये, प्रो. एसएम. अज़हर आलम की रंगकर्म को समर्पित ज़िदंगी का एक दस्तावेज़ी वीडियो –
लिटिल थेस्पियन और मेरी ज़िदंगी थे अज़हर: उमा झुनझुनवाला
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