( रायपुर से योग मिश्र, इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम )। कहते हैं कि जो जातियाँ जितना अधिक नाचती-गाती हैं, उनके भीतर जीवन संघर्षों को झेलने की उतनी ही अदम्य शक्ति भी होती है । लोक जीवन की अपनी अनेक कठिनाइयाँ हैं। हमारा देश विभिन्न बोली भाषा और परंपराओं वाला देश है। यहाँ जितनी बोली भाषाएँ हैं, उतनी ही विविध यहाँ की लोककलाएं और लोकनाट्य परंपराएं भी हैं।
भारत के प्रमुख लोकनाट्यों में ब्रज की रासलीला, उत्तर प्रदेश की रामलीला और नौटंकी, बिहार का विदेसिया, कर्नाटक का यक्षगान, केरल का कुडिअट्टम एवं कृष्णाट्टम, तमिलनाडु का तेरूकुथु, असम का आंकिया, महाराष्ट्र का तमाशा और गम्मत, हरियाणा का ख्याल, कश्मीर का भाड़ जश्न, गुजरात का भवई, आँध्रप्रदेश का विधि नाट्क, बुन्देलखण्ड का राई, राजस्थान का कड़ा, बंगाल एवं उड़ीसा का जात्रा और छत्तीसगढ़ का नाचा। ये सभी गौरवशाली नाट्य परम्पराएँ हैं । लोक जीवन में दु:खों का कोई अंत नही तो हास्य की भी अनंत संभवनाएं हैं। जो हमारे फक्कड़ और कबीराना लोक कलाकारों के अंतस से सदा हास्य के रूप में झरता रहता है । यही हास्य की सूझ उनके जीवन को नित नई उर्जा भी देती रहती है ।
नज़दीक से दु:ख, दूर से हास्य : शायद हमारे लोक कलाकार इस बात से अच्छी तरह परिचित हैं कि कोई भी दु:ख नजदीक से ही दु:ख है लेकिन दूर से देखो तो वह हास्य है । जैसे केले के छिलके से फिसलकर गिरते व्यक्ति को दूर से देखने वाले के लिए, हास्य की स्थिति बनती है । लेकिन यही दृश्य आप जब नजदीक से देखते हैं तो आपको उसकी चोट और पीड़ा भी नज़र आती है और आप करूणा से भर जाते हैं। बस दुख-दर्द और हास्य में इतना मामूली सा फर्क है जिसे हमारे लोक कलाकार बखूबी समझते हैं और दु:ख दर्द पीड़ा समस्या सब में अपने दर्शकों के लिए हास्य के पुट खोज निकालते हैं । किसी भी अंचल के लोकनाट्य की सबसे बड़ी विशेषता उनकी संप्रेषणीयता होती है । जिसे क्षेत्रीय बोली में सभी तरह की भाषा और व्याकरण की सारी मर्यादा को लांघ तोड़कर लोक कलाकार अपने दर्शकों के लिए हासिल करता है । नाचा में लोकनृत्य, लोकगीत व अभिनय की तीनों धाराएं एक साथ प्रवाहित होती हैं । लोक जीवन के रंग के साथ धार्मिक, एतिहासिक, और समसामयिक समाजिक घटनाओं, जीवन के सुख-दु:ख, रहन-सहन, बोल-चाल, आचार-विचार, हंसी-ठिठोली को मिलजुलकर एक लड़ी में पिरोकर छत्तीसगढ़ी नाचा में प्रस्तुत किया जाता है ।
लोक नाटक स्वछन्द अभिनय की कला : लोक नाटक शिष्ट नाट्य की तरह लिखी न होकर स्वच्छन्द अभिनय की अनूठी विधा है । हमारे यहाँ छत्तीसगढ़ की लोकनाट्य विधा नाचा का लोक कलाकार रचनाकार और अभिनेता दोनों स्वयं हो सकता है और यही इसकी विशिष्टता भी है। शहरी रंगकर्म में सब बंधे से चलते हैं । उसी तरह संगीत में भी शास्त्रीय संगीत की तरह कोई ताल, मात्रा, लोकसंगीत में नहीं है । हमारे यहाँ भरतमुनि से भी पहले नाच भिन्न-भिन्न लोक समाजों में भिन्न-भिन्न नामों से लोक में मौजूद रहा है । छत्तीसगढ़ में भी रहा होगा । शास्त्रीय नाटकों में नाचा के जोक्कर को विदूषक कहा जाता है । वह “विदूषक” यानी जोक्कर, एक महत्वपूर्ण पात्र या चरित्र के रूप में संस्कृत के नाटकों में तो दिखाई पड़ता है, पर नगरीय नाटकों में विदूषक हो ही यह जरूरी नही समझा जाता ।नाट्यशास्त्र के विदूषक के महत्व को प्रमाणिकता के साथ नाचा में बड़ी प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाता है । नगरीय, सभ्य शिष्ट कहे जाने वाले नाटकों में वह सिर्फ़ संस्कृत के नाटकों को छोड़ दें तो कम ही नज़र आया है।

नाचा का विदूषक यानी जोक्कड़ : छत्तीसगढ़ी नाचा में उसे विदूषक कहने की बजाय उस हास्य पैदा करने वाले पात्र के लिए अंग्रेजी में प्रचलित शब्द जोकर को, उच्चारण की अशुद्धता के साथ जोक्कड़ या जोक्कर स्वीकार कर लिया गया । यह प्रयोग भी संभवतः अंग्रेजों का माखौल उड़ाने की मंशा से ही नाचा में विदूषक की जगह जोक्कर शब्द अपनाया गया होगा ऐसा लगता है । नाचा में नाट्यशास्त्र के विदूषक के चरित्र को छेड़ा नही गया बल्कि विस्तार देकर नाचा में विदूषक को और ऊँचाई के साथ और महत्वपूर्ण बनाकर नायक की तरह पेश किया गया । नाचा में जोक्कर ही प्रमुख पात्र होता है। जबकि नागर नाट्य सभ्यता में या संस्कृत नाटकों में वह नायक का सहायक होता है । आरंभ से अंत तक छत्तीसगढ़ी नाचा में सहज हास्य मौजूद रहता है । जोक्कर से ही होकर सारी सामाजिक समस्याएं, सुख-दु:ख, रीति-कुरीति के झगड़े फसाद हास्य की गुंजाइश बनाकर दर्शकों तक पहुंचती रहती हैं ।
रात भर चलता है नाचा : छत्तीसगढ़ी नाचा रात भर चलता है और छत्तीसगढ़ी दर्शक रात भर जाग कर नाचा देखता है । जबकि छत्तीसगढ़ी नाचा में बिना किसी मंचीय तामझाम के बड़ी से बड़ी समाजिक समस्या, दुख तकलीफ, सहज चुटीले हास्य के माध्यम से बड़ी सरलता के साथ ग्रामीण बोली में ही पूरे असर के साथ प्रस्तुत की जाती है । छत्तीसगढ़ी नाचा के हरेक नकल (प्रहसन) में गंभीर से गंभीर बात गंवई अंदाज में बड़े सरल सुलभ तरीके से स्वाभाविक उत्पन्न हास्य को माध्यम बना कर कही जाती हैं, जिसका सीधा असर दर्शकों पर पड़ता है । नाचा के कलाकारों की अदाकारी के सम्मोहन में बंधा-रमा दर्शक सुबह चिड़ियों की चहचहाहट के साथ ही चेतना में लौट पाता है ।
नाचा में नायिका या नटी को परी : हमारे यहाँ अवतारवादी नाटक जिन्हें हम लीला कहते हैं । इसका प्रचलन छत्तीसगढ़ी लोक समाज में कहीं नजर नही आता या नही के बराबर है । लीला महापुरूष या देव पुरूष करते हैं और नाचा-गम्मत-तमाशा लोक पुरूष करते हैं ।छत्तीसगढ़ी नाचा के नायक जोक्कड़ की तरह नाट्यशास्त्र में नटी और नायिका का उल्लेख मिलता है पर छत्तीसगढ़ी नाचा में नायिका या नटी को परी कहा जाता है । परी शब्द फारसी है । पर यहाँ भरत मुनि की अवधारणा से परी को समझा गया होगा.ऐसा लगता है। जैसा कि भरतमुनि ने लिखा है कि उन्होंने नाट्यशास्त्र में तीन वृतियों को अपने नाट्यशास्त्र में लिया । किन्तु ब्रम्हा जी ने चौबीस अप्सराएं भी प्रदान कर दीं थीं । अप्सरा को फारसी में परी कहते हैं । पुराणों में अप्सराओं के परों का विवरण मिलता है । जो अपने परों के कारण परी कहलाती थीं। परी और अप्सरा सुन्दरता का मापदण्ड है। हो सकता है कि पुराणों किस्से कहानियों में सुना गया परी शब्द नाचा की नायिका के लिए अद्वितीय सुन्दरी जताने के लिए गढ़ा गया होगा।


नाचा में परी पहले पुरूष बनते थे : नाचा में पहले परी की भूमिका पुरूष ही निभाते रहे हैं । आजकल नाचा में यह भूमिका स्त्रियां भी निभा रही हैं । पहले नाचा में कुछ अश्लीलता के कारण नाचा में स्त्री पात्र के लिए स्त्रियों को नही रखा जाता था पर महिलाओं की यह झिझक फिल्मों ने जब तोड़ दी तो नाचा में स्त्रियां भी जुड़ने लगी और साथ ही फिल्मी लटके-झटके भी नाचा में नज़र आने लगे । इसी के साथ नाचा का नैसर्गिक रूप भी प्रभावित होता चला गया और नाचा के पारंपरिक दर्शक नाचा से दूर होते चले गए । नाचा में स्त्री के अवतरण से पूर्व परी की भूमिका निभाने वाला पुरूष पात्र और जोक्कड़ के बीच परस्पर खुली और प्रतिस्पर्धी नोक झोंक चलती थी । गहरे से गहरे कटाक्ष पर दोनों में आश्चर्यजनक सहभागिता दिखती थी और वह किसी भी स्तर तक चली जाती थी । महिलाओं के लिए वह उस समय की असहज स्थिति समझी जाती थी । जैसे- सन्यासी रूपधारी, स्त्री लोलुप सन्यासी की भूमिका अदा कर रहे जोक्कड़ को उसकी छेड़छाड़ का किसी परी रूपधारी पुरूष से यह जवाब उसे सहज मिल सकता है-“अई, तैं सन्यासी आस, तो सन्नावत काबर हस ?” यह जवाब किसी महिला के लिए असहज होता, जो परी बने पुरूष के लिए संभव था। उस समय के लिए यह जवाब ही काफी अश्लील माना जाता था । चूंकि परी का किरदार कोई पुरूष ही निभाता था तो संवाद में जरा अश्लील स्थिति निर्मित होने पर भी उतना बुरा नही लगता था। स्त्री का पात्र निभा रहे कलाकार के लिए यह सहज बात थी और दर्शक भी उस छेड़छाड़ का रस ले लेते थे । फिर भी मर्यादा से ज्यादा बाहर कोई कलाकार कभी नही जाता था । अब अश्लीलता की न कोई सीमा है, न परहेज । महिलाएं भी सहजता से नाचा में परी का पात्र निभा रही हैं। आज के व्यवसायिक युग में कला का इंजन कला की पटरी छोड़, अश्लीलता के ट्रेक में घुसकर कहीं भटक गया है। (लेखक रायपुर के वरिष्ठ रंग निर्देशक हैं, स्व. हबीब तनवीर के नया थिएटर के कलाकार रहे हैं।)

