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शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। ‘पारंपरिक लोककलाएं आज ख़त्म हो रही हैं। इन्हें बचाने के लिये समाज, सरकार और संस्कृतिकर्मियों को मिलकर काम करना होगा। राजस्थान फोरम के माध्यम से हम यही कोशिश कर रहे हैं’। जयपुर के वरिष्ठ लेखक और नाट्य निर्देशक अशोक राही ने यह बात कही। वे राजस्थान फोरम द्वारा आयोजित ‘संगत’ कार्यक्रम के सम्बंध में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। पढ़िये इस विषय में श्री राही से हुई बातचीत के मुख्य अंश।
स्कूल में हुआ ‘संगत’ का नया कार्यक्रम: श्री राही ने कहा – ‘संगत का नया कार्यक्रम इस बार जयपुर की कच्ची बस्ती झालाना के एक स्कूल में किया गया। इसमें छोटी-छोटी ढाणी चंदनवास, अरनिया, कतरवाडा और टीला के सुल्तान जोगी, भगवान, अशोक, सुमर और जय नारायण योगी ने अपने गायन और वादन का कार्यक्रम प्रस्तुत किया। इनमें आये कलाकारों ने दूल्हा धाडी़, गोपीचंद, भरथरी जैसे प्राचीनतम गीत प्रस्तुत किये। सुल्तान ने मशक पर राजा रिसालू गीत गाया। कच्ची बस्ती के जिस स्कूल में यह कार्यक्रम हुआ, उस स्कूल को गोपाल सिंह और सुनीता यादव बच्चों से लिए बिना ही, सेवा भाव से चलाते हैं।
संस्कृति पर आधुनिकता का बढ़ता ख़तरा: वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी ने कहा-‘असल में आज हमारी संस्कृति पर आधुनिकता का ख़तरा भी मंडरा है। आज पारंपरिक और लोक कलाओं का प्रवाह ख़त्म हो रहा है। कलाकारों के सामने आज रोज़ी-रोटी का संकट है। वे और उनके बच्चे परम्परागत कलाओं को छोड़कर दूसरे पेशे अपनाने को मजबूर हैं।
अनेक लोक नाट्य खात्म की ओर: अशोक राही ने चिंता जताते हुए कहा- ‘राजस्थान में पांडून का कड़ा, अलीबक्षी ख्याल, दूल्हा-दाढ़ी की बात सहित अनेक लोक नाट्य अब ख़ात्मे की ओर है। यही हाल दूसरे राज्यों का भी है। लोक कलाकारों की नई पीढ़ी अपनी पुरानी कलाओं को सीखने से भी कतरा रही हैं। हजारों साल में जो गीत, संगीत नृत्य ,वाद्य यंत्र, लोक वाद्य लोक कथाएं, लोक गाथाएं का निर्माण हुआ है, वह अब तेज़ी से ख़ात्मे की ओर बढ़ रही हैं। सरकार को तुरंत ही इस दिशा में क़दम उठाना चाहिये। यहाँ यह कहना भी ज़रूरी है कि बहुत सी परंपरा के कलाकारों की अब आख़िरी पीढ़ी ही बची रह गई है’।
टाइगर संरक्षण की बतर्ज़ बने प्रोजेक्ट : श्री राही ने कहा – ‘करीब 50 साल पहले जब बाघ (टाईगर) विलुप्ति की कगार पर पहुंचे। फ्लोरा और फोना दोनों के नष्ट होने की आशंका पैदा हुई। तब सरकार ने अरबों रुपए के टाइगर प्रोजेक्ट शुरू किये। अभ्यारण्य बनाए गए। यह एक अच्छा प्रयास था। टाइगर बच गए। आज टाइगर प्रोजेक्ट से सरकार पर्यटन के क्षेत्र में करोड़ों रुपए कमा रही है। इसी तरह के प्रयासों की आज हमारी संस्कृति और लोक कलाओं बचाने के लिये ज़रूरी है। आज तुरंत एक्शन में आने का वक्त आ गया है। सरकार ही नहीं समाज और जागरूक संस्कृति कर्मियों का दायित्व भी बनता है कि वे ऐसी कलाओं को सहेजने, संवारने और सुधारने के कामों में अपना योगदान दें।
राजस्थान फोरम पहल को लेकर गंभीर: अशोक जी ने कहा -‘राजस्थान फोरम स्थिति की गंभीरता को समझते हुए अपनी पहल में जुटा है। राजस्थान फोरम के सभी सदस्य और साथी शामिल हैं। वे इस महति काम में अपना हाथ बंटा रहे हैं। हमें विशेषकर संदीप भूतोडिया, पंडित विश्व मोहन भट्ट, अपरा जी और सर्वेश जी का भी समर्थन और साथ मिल रहा है। इसके साथ ही यशवंत सिंह, आधार कोठारी, नितिन सैनी, सुप्रिया शर्मा जैसे युवा साथी भी हैं जो नि:स्वार्थ भाव से संगत सुधारने में जुटे हैं, उनका योगदान प्रशंसनीय है। इसमें भी शक नहीं कि राजस्थान फोरम की युवा टीम के मिले-जुले प्रयासों से कुछ हो पा रहा है। मैं मानता हूं कि मिल-जुलकर किए गये प्रयासों से ही चीज़ें बदलती है, समाज बदलता है,संस्कृति अक्षुण्ण बनी रहती है’। आगे पढ़िये –
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