शकील अख़्तर,इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। ‘सबसे पहले हम सारा ध्यान अपनी श्वास पर लगाएंगे, जैसे-जैसे श्वास पर हमारा ध्यान लगेगा, वो शीतल और शांत होती जाएगी। अब हम अपनी धरती मां और उन किसानों का तहेदिल से शुक्रिया अदा करेंगे जिन्होंने हमारे लिए अन्न पैदा किया, और उन बच्चों ( साथियों ) को जिन्होंने हमें ये भोजन बनाकर प्यार से परोसा है।‘
क्रिएटिव विलेज जाने का संयोग : दोपहर के भोजन से पहले इस तरह की प्रार्थना मेरा लिये नया अनुभव था। ग्वालियर के अलकापुरी में 22 फरवरी की दोपहर, भोजन से पहले हमें यह प्रार्थना करा रही थीं ‘क्रियेटिव विलेज’ की कल्पना को आकार देने वाली संस्कृतिकर्मी और समाजसेवी नंदिनी कुमार। उनके साथ मौजूद थीं मशहूर गायिका डॉ.नीलिमा शर्मा। नीलिमा जी, नंदिनी कुमार की बरसों पुरानी सहेली हैं, नंदिनी जी अपने क्रियेटिव विलेज में कला और पर्यावरण को जोड़कर काम कर रही हैं। खुशनसीबी से नंदिनी जी के पास डॉ.नीलिमा हमें लेकर पहुंची थी। इस संयोग की एक और कड़ी डॉ. आभा मिश्रा बनीं। मैं उनके बेटे देवांश के विवाह समारोह में मैं पहुंचा था और वहां नीलिमा जी से मेरी मुलाक़ात हुई। नंदिनी जी चाहती थीं कि ग्वालियर की यात्रा में वक्त निकालकर मुझे क्रिएटिव विलेज ज़रूर आना चाहिये।
..और सच में मैं क्रियेटिव विलेज के साकार होते स्वरूप को देखकर अंचभित था, जिस शौक से नंदिनी और उनके दो साथी अनिल और घनश्याम इस संकल्प को पूरा करने में जुटे हैं, उस तन्मयता ने भी मुझे बेहद प्रभावित किया। मैं जैसे मशीनी युग में गुम सपनों के गांव में पहुंच गया था।
याद आया बरसों पुराना गांव : मुझे लगा मैं शहर के बीच किसी बरसों पुराने उस गाँव में पहुंच गया जिसे हमने और हमारी तेज़गाम सभ्यता ने बहुत पीछे छोड़ दिया है। नंदिनी जी इस गांव को हमारे पुरातन ज्ञान, हमारी परंपरागत कला और प्रकृति के अनुरूप विकसित करने की कोशिश में लगी हैं। करीब साढ़े आठ हज़ार फीट के क्षेत्र में मेन गेट से अंदर आते ही दायीं तरफ उन्होंने एक मिट्टी का घर बनाया है। हालांकि उसमें एक ही कमरा है लेकिन अंदर घुसते ही उसमें जो ठंडक महसूस हुई, वो क्रांकीट के लाखों के फ्लैट से बेहतर थी। कमरे के अहाते में सबसे पहले मुझे जिस आसन पर बैठने को कहा गया, वो बेंत की पुरानी खाटनुमा बेंच या कुछ चौकी जैसा था। यहां बैठकर शुरूआती परिचय की औपचारिकता पूरी हुई। कमरे के बाहर परंपरागत वंदनवार था, उसके ऊपर मिट्टी की ही घड़ी लगी थी। बाहर एक शीशा भी था, जिसमें मैं खुद को देख सकता था। कमरे के अंदर जाने पर नंदिनी जी ने कहा-‘ मिट्टी का ये कमरा सिर्फ एक बैठक का या आराम का कमरा भी नहीं है, हम यहां पर छोटी संगोष्ठियां करेंगे। कविता या कहानी या पर्यावरण जैसे किसी विषय पर विमर्श या संवाद करेंगे।
पुरानी चीज़ों का सौ फीसदी उपयोग : उन्होंने बताया, यह सब हमने पुरानी इस्तेमाल की गई वस्तुओं और मिट्टी से छापकर,लीपकर बनाया है। कमरे में बैठने के लिये लकड़ी की छोटी कुर्सियां,स्टडी टेबल और एक चारपाई थी। कमरे के बाहर में मुझे सजावट के लिये रखे गए शिल्प नज़र आए। कमरे से आगे टहनियों और घांसफूस की छत के नीचे एक खुला आंगन जैसा हिस्सा था। उसी के बगल में मिट्टी के चूल्हे वाली रसोई। आंगन वाले हिस्से में ही मुझे भोजन कराया गया। आंगन को भी गोबर और लाल मिट्टी से लीपा गया था। (मुझे बरसों पुराने जबलपुर के शंकरशाह नगर का अपना पुराना घर याद आया, कान में अम्मी के शब्द गूंजे, जा भैंस तालाब नहाने जा रही हैं, उनके पीछे जा, गोबर लेकर आ। साथ में लाल मिट्टी भी। वार-त्यौहार पर तो हमारा काम यही होता था।)
पत्तल में भोजन का फिर मिला आनंद : मुझे अनिल और घनश्याम चूल्हे पर सेकी गईं गरमागरम फूली और नरम रोटियां परोस रहे थे। हम किसी प्लेट में भोजन नहीं कर रहे थे बल्कि भोजन पत्तल में परोसा गया था। मुझे पत्तल में भोजन किये भी बरसों हो गये हैं। पत्तल में गरम दाल, आलू गोभी की सब्ज़ी। गुड़ का छोटा टुकड़ा, हरी चटनी थी। और गरमागरम रोटियों पर घी टपकाया जा रहा था। शहरी सभ्यता ने मुझे इस तरह खाना ही भुला दिया था। खाना खाते वक्त नंदिनी जी की सलाह थी। भोजन आराम से करना है। पूरा स्वाद लेकर करना है। शांति से करना है और कमसेकम बीस मिनट करना है। मुझे खयाल आया, हम भोजन के वक्त अक्सर कितनी हड़बड़ी में रहते हैं। हम तैयार होने में भले ही एक घंटा लगा दें लेकिन जाते वक्त खाना या नाश्ता तकरीबन निगलकर भागते हैं। जैसे खुदपर डियोड्रेन्ट उड़ेल रहे हों !!! खाना जिन बर्तनों में था, वो पात्र भी मिट्टी के थे। भोजन को ठंडा और ताज़ा रखने के लिये यहां पर ज़मीन के अंदर एक आला बनाया गया था जो फ्रिज का काम कर रहा था। भोजन से पहले मेरे हाथ धुलाते वक्त बताया गया था कि हमें पानी को बेवजह बहाने की जगह अगर हम इसे किसी पेड़ की जड़ में बहाएं तो पानी बेकार नहीं जाएगा।
अनिल और घनश्याम हमकदम, हमसाज़ : भोजन के साथ ही हमने क्रिएटिव विलेज का एक चक्कर लगाया। नंदिनी जी बताने लगी, वे और उनके साथ अनिल और घनश्याम सुबह से शाम तक इस विलेज को अपनी कल्पना से सजाने और बनाने में जुटे रहते हैं। रसोई के आगे ही मुझे एक बड़े पलंग वाला विश्राम गृह देखने को मिला। यहां पर सिलाई-कढ़ाई के काम की तैयारी भी की जा रही थी। विश्राम के घर के आगे जैविक खेती की तैयारी दिखी। नंदिनी कहने लगीं, हम काफी समय से यहां पर केचुँए वाली खाद बना रहे हैं। हम यहां पर खेती की छोटी मोटी शुरूआत कर चुके हैं। ताकि यहां आने और रहने वालों के लिये ज़रूरत की सब्जियां,फल और फूल मिल सकें। उन्होंने बताया, यहां चारों तरफ की दिवारों पर वॉल पेटिंग की तैयारी है। एक तरफ एक मंच बनाया जाएगा, जहां पर कार्यक्रमों के लिये मंडप होगा। अतिथियों के रहने के लिये अतिथि गृह भी तैयार होगा। पूरे परिसर में अलग-अलग राज्यों से तरह-तरह की शिल्प वस्तुएं और कलात्मक वस्तुएं आएंगी। उनके बनाने वाले शिल्पकार और कलाकार यहां आएंगे। आयोजनों का एक कला कैलेंडर होगा । एक तरह से यह क्रिएटिव विलेज एक एजुकेशनल टूर सेंटर होगा। इसमें आधुनिक शहरियों के साथ ही स्कूली बच्चों के लिये सीखने और समझने को बहुत कुछ होगा।
नंदिनी कुमार अपनी धुन और रौ में अपनी कल्पना के बारे में हरेक चीज़ बता रही थीं और मैं उनकी इस कल्पना को देख रहा था, जो था उसे भी जो नहीं था उसे भी। तभी डॉ. नीलिमा ने अपनी सहेली से कहा, सुनो नंदिनी मेरे पास दो एक्सट्रा पायदान है। वो यहां पर काम आ जाएंगे। नंदिनी जी बोली, हां, हम ऐसी हर चीज़ जो काम की नहीं है, जिसका हम यहां उपयोग कर सकते हैं, काम में ले लेते हैं। बशर्ते वो पर्यावरण के अनुकूल हों। परिसर का चक्कर लगाने के बाद हम उसी कक्ष के अहाते में पहुंचे जहां से हमारा सफर शुरू हुआ था। नंदिनी जी ने कहा, शकील जी, यहां हम जो कुछ शो केस करेंगे, वो सिर्फ दिखाने के लिये नहीं होगा। उसे यहां आने वाले खुद करके भी देखेंगे। मिसाल के लिये रोटी का आटा निकालने के लिये यहां हम दो पाटों वाली चक्की भी है, जहां आप खुद अपने हाथ से आटा पीसकर रोटी बनाने और खाने का मज़ा ले सकेंगे।

