इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। ”दरअसल मदारी पासी भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के ऐसे नायक थे, जिन्होनें न केवल आजादी के आन्दोलन में भाग लिया, अपितु तत्कालीन वर्ण व्यवस्था,धार्मिक भेदभाव, जातीय विसंगतियों के खिलाफ देशी शासकों से लोहा लिया। उनका मानना था कि जितना खतरा हमें अग्रेंजों से नहीं, उतना खतरा पूंजीवादियों एवं सामन्तों से है। मदारी पासी उपन्यास आजादी के आन्दोलन का जीवन्त दस्तावेज है।’ यह बात मुख्य वक्ता के रुप में वरिष्ठ कहानीकार एवं दिल्ली साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित विवेक मिश्रा (नई दिल्ली) ने कथाकार बृजमोहन के लिखे ताज़ा उपन्यास ”क्रान्तिवीर मदारी पासी” पर प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस), भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) झाँसी इकाई व आगाज विचार मंच के संयुक्त प्रयासों से आयोजित पुस्तक परिचर्चा कार्यक्रम में कही। उन्होनें कहा कि मदारी पासी ने व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लडी, जिसको लेखक ने इस तरह प्रस्तुत किया है, मानो वह स्वयं उस समय का साक्षी हो। उन्होंनें कहा कि मदारी पासी ने व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई चार आयामों उपनिवेशवाद, सामन्तवाद, धर्म और वर्ण व्यवस्था पर लड़ी। इनसे मुक्त होकर ही आजादी की मुकम्मल लड़ाई हो सकती है।
वंचितों का कोई इतिहास नहीं लिखा गया : कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि लेखक, पत्रकार जाहिद खान ने कहा कि उपन्यास की पृष्ठभूमि उस दौर की है, जब स्वाधीनता आन्दोलन अपने चरम उत्कर्ष की ओर था, उस दौर में ग्रामीण समाज किस तरह से वर्ण व्यवस्था की विद्रूपताओं और शोषण का शिकार था, उसे लेखक ने मदारी पासी के नेतृत्व में हुए ‘एका आन्दोलन’ के जरिए दर्शाया है। उन्होंने कहा कि वंचितों का कोई इतिहास नहीं लिखा गया,और न ही इस वर्ग के नायकों को वह जगह मिली, जिसके वह हकदार थे। यह उपन्यास इस कमी को दूर करता है।
इतिहास के अल्पज्ञात प्रसंग की विस्तृत व्याख्या : विषय प्रवर्तन करते हुए प्रलेस झाँसी के अध्यक्ष डाॅ. अनिल अविश्रान्त ने कहा कि क्रान्तिवीर मदारी पासी उपन्यास एक लेखक के रुप में बृजमोहन जी की उपलब्धि तो है ही, यह इतिहास के एक अल्पज्ञात प्रसंग की विस्तृत जानकारी देकर पाठकों को और हिन्दी साहित्य के ऐतिहासिक उपन्यासों की परम्परा को समृद्ध करता है।
मदारी पासी के गाँव और उनसे जुड़े लोगों के साक्षात्कार तथा दस्तावेजों का शोध : लेखकीय व्यक्तव्य देते हुए बृजमोहन ने अपनी रचना प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए उपन्यास के लिखे जाने में आई चुनौतियों का जिक्र किया तथा मदारी पासी के गाँव मोहनखेड़ा के स्थलीय निरीक्षण एवं उनसे जुड़े व्यक्तियों के साक्षात्कार और सम्बन्धित दस्तावेजों के विषय में जानकारी दी। उन्होनें बताया कि परिवार के सहयोग से यह उपन्यास आठ माह के अल्प समय में पूर्ण हुआ।
धर्म और जाति की रुढ़ियों से अन्तिम सांस तक विद्रोह : अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए कथाकार निरंजन धुलेकर ने कहा कि मदारी पासी उपन्यास एक लेखक के द्वारा जनता को दिया गया बेशकीमती उपहार है। इसका नायक भूखों की भूख और प्यासों की प्यास मिटाने के लिए धर्म और जाति की रुढ़ियों से विद्रोह करता है और अन्तिम सांस तक उनसे संघर्ष करता है। इस उपन्यास के जरिए लेखक ने वंचित वर्गाें के गुमनाम नायकों को साहित्य पटल पर आने का रास्ता खोला है।
कार्यक्रम का संचालन इप्टा एवं प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेसं) झांसी के महासचिव डाॅ. मुहम्मद नईम ने किया। जबकि अतिथियों का स्वागत वरिष्ठ रंगकर्मी आरिफ शहडोली एवं आभार डाॅ. कमलेश कुमार ने व्यक्त किया। इस अवसर पर मनोरमा मोहन, ब्रह्मादीन बन्धु, राहुल मिश्रा, डाॅ. कुन्ती हरिराम, अजय दुबे, कामिनी बघेल, रुचि वर्मा ने भी अपने विचार रखे। पुस्तक परिचर्चा में मेधाविनी मोहन, शेख अरशद, शिवम् वर्मा, अमन नायक, आरना आदि भी उपस्थित रहे।

