शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। ‘ मैडबेथ, शेक्सपियर के नाटक मैकबेथ पर आधारित एक फिज़िकल कॉमेडी है। एक नया रंगानुभव है। इसमें मैंने अपनी ईजाद की गई ‘क्लाउन टेक्निक’ का उपयोग किया है। यह एक सोलो प्ले (एक पात्रीय नाटक) है। इसमें एक अभिनेता और दर्शकों के बीच मौजूद, चौथी दीवार यानी “फोर्थ वॉल” टूट जाती है। किरदार सीधे दर्शकों से संवाद करता है, उन्हें नाटक का हिस्सा बना लेता है’। यह बात इस नाटक के प्रबुद्ध अभिनेता और परिकल्पना कार रूपेश टिल्लू ने कही।
विवेचना में आज इस नाटक की प्रस्तुति: रविवार 9 नवंबर की शाम विवेचना के 31 वें नाट्य समारोह में रूपेश टिल्लू अपने इस नाटक का प्रदर्शन करेंगे। विवेचना के नाट्य समारोह की यह समापन संध्या और अंतिम प्रस्तुति होगी। इसके साथ ही विवेचना के 50 साल के पूरे होने पर आयोजित ‘कला महोत्सव’ का समापन भी होगा। बता दें कि भारत के साथ ही, रूपेश इस नाटक के दुनिया के कई देशों में प्रदर्शन कर चुके हैं। मैडबेथ, रेडनोज़ इंटरटेनमेंट और कारवां थियेटर ग्रुप, मुंबई की यह साझा प्रस्तुति है।
शेक्सपियर के मैकबेथ पर आधारित कॉमेडी: मुंबई में जन्मे और कई नाटकों और फिल्मों में अभिनय कर चुके रूपेश टिल्लू इस नाटक के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत और ख्याति प्राप्त अभिनेता हैं। उन्होंने बताया -‘ शेक्सपियर का मैकबेथ- सत्ता की लालसा, अपराध बोध और पतन की त्रासदी है। मैडबेथ, इसी मूल कथा को हास्य और फिजिकल कॉमेडी के माध्यम से मैंने अपनी तरह से परफार्म करने की कोशिश की है। इसमें मूल थीम को व्यंग्य और दर्शकों की भागीदारी से एक नया रूप दिया गया है’।
टूट जाती है एक्टर और दर्शक के बीच की दीवार: रूपेश टिल्लू ने कहा- ‘यह नाटक एक तरह से “फोर्थ वॉल” यानी मंच के सामने बैठे दर्शकों और एक्टर के बीच की चौथी दीवार को गिराने का काम करता है। मंच पर आमतौर पर तीन दीवारें होती हैं। मंच के पीछे और उसके दोनों तरफ। चौथी दीवार दर्शकों की ओर होती है, लेकिन उसे “काल्पनिक” माना जाता है। जब अभिनेता इस दीवार को मानते हैं, तब वे दर्शकों की मौजूदगी को अनदेखा कर अपने परफारमेंस में डूबे रहते हैं। लेकिन जब कोई किरदार दर्शकों से सीधे बात करता है, उनकी प्रतिक्रिया लेता है, तब इसे “फोर्थ वॉल तोड़ना” कहते हैं। यह तकनीक हास्य-व्यंग्य के प्रभाव के लिए प्रयोग होती है। नाटक में मैंने इसी तकनीक का उपयोग किया है’।
स्टाकहोम में आई पहली बार कल्पना: रूपेश ने कहा, ‘इस प्रयोग की कल्पना मुझे स्टाकहोम में आई थी, जब मैं वहां के स्वीडन के नेशनल स्कूल आफ़ ड्रामेटिक आर्ट्स में पढ़ रहा था। ये मेरा थिसिस प्रोजेक्ट था। मैं उसमें एक एक्टर और दर्शकों के बीच संवाद को लेकर शोध कर रहा था। हमारे देश के लोक नाटकों में तो यह होता आया है। मैं चाहता था कि मैं भी मंच पर खुद को उसी तरह से प्रस्तुत करूं, ताकि दर्शक, नाटक का हिस्सा बन सकें, वे उसमें शामिल हो जायें’।
मैडबेथ के हो चुके हैं कई शोज़: उन्होंने बताया, इस नाटक के मैं बहुत से शोज़ कर चुका हूँ। अमेरिका, यूरोप, जर्मनी, इज़रायल, फिलिस्तीन के साथ ही अपने देश में इसके बहुत से शोज़ मैंने किये हैं। यह नाटक में अंग्रेज़ी भाषा में करता हूँ, लेकिन विवेचना के मंच पर मेरा प्रयास होगा कि मैं इसे ज़्यादा से ज़्यादा हिन्दी में अभिनीत कर सकूँ, ताकि दर्शक मेरे पात्र के साथ संवाद कर सकें और कथ्य को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कर सकें।
क्लाउन और माइम टेक्निक के साथ लाइव सिंगिग: उन्होंने कहा, ‘इस नाटक मैं क्लाउन टेक्निक का इस्तेमाल करता हूँ। ड्रामेटिक स्कूल में पढ़ते वक्त मैंने इस टेक्निक की खोज की थी। इसे थिसिस का हिस्सा भी बनाया था। मैंने एक तरह से इस टेक्निक का आविष्कार किया है। इसके साथ ही मैं माइम टेक्निक का भी उपयोग करता हूँ। लाइव सिंगिग भी होती है। यानी एक परफॉरमेंस के जितने भी अंग है, वो सारे इसमें उपयोग होते हैं। ये फिज़िकल थियेटर है, इसलिये इसमें फिज़िकल या आंगिक अभिनय ज़्यादा है। भाषा तो है, मगर ज़्यादा से ज़्यादा फिज़िकल मूवमेंट के साथ इसे प्रस्तुत करने का प्रयास करता हूँ’।
क्या है मैकबेथ की थीम: मैकबेथ एक वीर योद्धा है जो चुड़ैलों की भविष्यवाणी के बाद राजा बनने की लालसा में डंकन की हत्या कर देता है। हत्या के बाद मैकबेथ और उसकी पत्नी लेडी मैकबेथ अपराध बोध और भय से ग्रस्त हो जाते हैं, जिससे उनका मानसिक संतुलन बिगड़ता है। क्या मैकबेथ का भाग्य पहले से तय था या उसने अपने कर्मों से उसे बदला? यह प्रश्न पूरे नाटक में गूंजता है। चुड़ैलों की रहस्यमयी भविष्यवाणियाँ पात्रों को भ्रमित करती हैं और उनके निर्णयों को प्रभावित करती हैं। शेक्सपियर के लिखे सर्वाधिक मंचित और प्रसिद्ध नाटकों में से यह एक है।
मैडबेथ में थीम्स का हास्यपूर्ण उपयोग: रूपेश टिल्लू ने मैकबेथ की गम्भीरता को तोड़ते हुए इसे एक हास्यपूर्ण, एकल अभिनय में बदल दिया है। वे सत्ता की लालसा को एक जोकर की तरह प्रस्तुत करते हैं। वे दर्शकों को मंच पर बुलाकर, उन्हें कहानी का हिस्सा बना लेते हैं। इस दौरान सत्ता और भाग्य के सवालों पर सामूहिक सोच पैदा होने लगती है। रूपेश, क्लाउनिंग, माइम और एक्रोबेटिक्स के माध्यम से मानसिक पतन और भ्रम को शारीरिक रूप से दर्शाते हैं। रूपेश अकेले ही मैकबेथ, बैंको, चुड़ैलें और अन्य पात्रों को निभाते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सत्ता की लड़ाई अंततः एक व्यक्ति के भीतर ही चलती है। यह नाटक दर्शकों को हँसाते हुए सोचने पर मजबूर करता है कि सत्ता की लालसा कितनी हास्यास्पद हो सकती है। इस तरह यह नाटक, मैकबेथ की त्रासदी को एक सामाजिक व्यंग्य में बदल देता है, जहाँ हर दर्शक खुद को पात्रों में देख सकता है। आगे पढ़िये – ग़ालिब इन न्यू डेल्ही, एक नये शिखर पर डॉ.आलम https://indorestudio.com/ghalib-in-new-delhi-ka-550-wan-show-se-naye-shikhar-par-dr-alam/









