Wednesday, May 13, 2026
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मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय के दीक्षांत समारोह में हिंदी रंगमंच का लोकतांत्रिक चेहरा

अजित राय,इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय भोपाल में यह एक अच्छी परंपरा है कि सत्र की समाप्ति पर होने वाले दीक्षांत समारोह में जाने वाले विद्यार्थी नये विद्यार्थियों का स्वागत करते हैं। पिछले एक साल में प्रशिक्षण के दौरान जो भी चार-पांच नाट्य प्रस्तुतियों तैयार होती है, उनका दोबारा प्रर्दशन किया जाता है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में मध्यप्रदेश में काम करने वाले रंगकर्मी,देश के जाने-माने रंग निर्देशक और नाट्य समीक्षक भी परस्पर संवाद करते हैं। मुझे पिछले कई सालों से इस आयोजन में शामिल होने का अवसर मिलता रहा है। मुझे लगता है कि यहां का माहौल जितना जीवंत, आत्मीय और उर्जा से भरा रहता है, उतना कहीं और कम ही देखा जाता है। नाट्य समारोह तो अब सैकड़ों होने लगे हैं पर मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के दीक्षांत समारोह के दौरान पिछले आठ सालों से जैसे एक से बढ़कर एक नाटकों का मंचन होता रहा है, वह चकित करने वाला है। इसकी सबसे बड़ी वजह यहां के विद्यार्थियों की रचनात्मक ऊर्जा और एक साल का सघन प्रशिक्षण है।

एनएसडी के बाद एमपीएसडी रंगमंच प्रशिक्षण में श्रेष्ठ :  ऐसा माना जा रहा है कि इस समय देश में जहां जहां भी रंगमंच का शिक्षण-प्रशिक्षण हो रहा है, उनमें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली को छोड़ दें तो मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय ने खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित किया है। इसका ताजा उदाहरण पिछले दिनों भोपाल में संपन्न आठवें दीक्षांत समारोह में मंचित चार नाटक है। ये नाटक है अरूण पाण्डेय ( जबलपुर) लिखित- निर्देशित बुंदेलखंड के लोक कवि ईसुरी की रचनाओं पर आधारित ” हंसा करले किलोल “, सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ निर्देशित प्रथम विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि पर वेदा राकेश द्वारा अनूदित  इरविन शा का ” बरी द डेड “(1936) , बापी बोस निर्देशित और रांगेय राघव द्वारा अनूदित विलियम शेक्सपियर का मशहूर नाटक ” वेनिस का सौदागर ” तथा हरिशंकर परसाई की रचनाओं पर देवेंद्र राज अंकुर निर्देशित ” परसाई के संग प्रेम के तीन रंग।” मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय के संस्थापक निदेशक संजय उपाध्याय  के बाद  वर्तमान निर्देशक और देश के सुप्रसिद्ध अभिनेता आलोक चटर्जी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।देवेंद्र राज अंकुर की प्रस्तुतियां कई मायनों में महत्वपूर्ण:    वरिष्ठ रंगकर्मी और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक देवेंद्र राज अंकुर की नई प्रस्तुति ” परसाई के संग, प्रेम के तीन रंग ”  कई मायनों में महत्वपूर्ण है। इसके आधार पर भारतीय रंगमंच में अंकुर शैली के लगभग सभी सौंदर्य शास्त्रिय आयामों को समझा जा सकता है। देवेन्द्र राज अंकुर वैसे तो पिछले करीब पचास सालों से कहानियों- उपन्यासों का मंचन करते रहे हैं और उन्होंने भारतीय रंगमंच में ” कहानी का रंगमंच ” का पुनराविष्कार कर एक नई विधा को ही स्थापित कर दिया है, पर पिछले दो सालों से उनकी प्रस्तुतियों में एक नई चमक और ताजगी आई है। उन्होंने पहले पचास साल की हिंदी कहानी पर ” आधी सदी  ” नाम से विलक्षण प्रस्तुति करके अपने उन आलोचकों का मुंह बंद कर दिया जो कहने लगे थे कि ” अब अंकुर जी का कहानी का रंगमंच थकने लगा है, या अब इसे खांची में उठाकर घूरे पर फेंक देना चाहिए।”  जिस कुशलता से उनके अभिनेताओं ने ” उसने कहा था”( चंद्रधर शर्मा गुलेरी), ” पाजेब”( जैनेन्द्र कुमार), ” परदा”( यशपाल) और ” चीफ़ की दावत ” ( भीष्म साहनी) को मंच पर खेला , वह बेमिसाल है। हाल ही में उन्होंने महात्मा गांधी की आत्मकथा ” सत्य के प्रयोग ” का प्रभावशाली मंचन करके सबको चौका दिया। गांधी जी की चिर परिचित आत्मकथा भी इतनी रोचक हो सकती है। अभिनेताओं को खुलकर खेलने की आजादी : “परसाई के संग प्रेम के तीन रंग” में अंकुर जी ने अपनी चिर-परिचित प्रस्तुति प्रक्रिया अपनाते हुए कहानियों के चयन का जिम्मा अभिनेताओं पर ही छोड़ दिया और पढ़ने के दौरान जो तीन आलेख  अंतिम रूप में निकलकर आए उसे तीन समूहों में बांटकर अभिनेताओं को खुलकर खेलने की आजादी दी, बजाय इसके कि वे खुद कोई बना बनाया ढांचा थोपते जैसा कि दूसरे निर्देशक आमतौर पर करते हैं। ये कहानियां हैं – ” प्रेमियों की वापसी”, “घेरे के भीतर” और ”  एक फिल्म कथा।”  हरिशंकर परसाई का गद्य अपने आप में इतना असरदार है कि खुद ब खुद नाटकीय स्थितियां बनती चली जाती है। अभिनेता या निर्देशक को अलग से कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती। मंच पर अभिनेता अपनी देह भाषा और देह गतियों तथा संवाद अदायगी की अदा ( वाचिक) से दृश्य बनाते हैं। इसमें परसाई के आलेख की रवानगी से भी काफी मदद मिलती है।अभिनेताओं की कुशलता का नाटक : अरूण पाण्डेय के निर्देशन में बुंदेलखंड के लोक कवि ईसुरी की रचनाओं पर आधारित नाटक ” हंसा करले किलोल” अपने आलेख में जबरदस्त भटकाव के बावजूद अभिनेताओं की कुशलता से अच्छा बन पड़ा है। मिथक, इतिहास और वीरता की भूल- भूलैया अक्सर निर्देशक को भटका देती है। इस नाटक को छतरपुर में आयोजित बुंदेलखंड भ्रमणशील कार्यशाला में तैयार किया गया है। 1857 के विद्रोह से भी पहले की पृष्ठभूमि में एक मृदंगिया और बेड़नी नर्तकी की प्रेमकथा और अंग्रेजों से आजादी की जंग के ताने-बाने में बुंदेलखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने की कोशिश की गई है।जब मारे गए सैनिक जीवित हो उठते हैं : सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ ने अपने युद्ध विरोधी नाटक ” बरी द डेड”  में एक पुराने आलेख को नए कलेवर में प्रासंगिक बनाया है। इस नाटक में युद्ध में मारे गए सैनिक अचानक जीवित होकर खुद को दफन होने से इनकार कर देते हैं। उन्हें मनाने के लिए पहले तो सेना के अधिकारी डराते धमकाते है, फिर इमोशनल ब्लैक मेलिंग का सहारा लेते हैं। फिर भी बात नहीं बनती तो सेना के अधिकारी मृत सैनिकों के जीवित बचे बीबियों, प्रेमिकाओं, मांओं और रिश्तेदारों को लाते हैं। अकालमृत्यु के शिकार हुए अधिकतर सैनिक अपनी अधूरी और उस जिंदगी का सपना देखते हैं जो वे जी नहीं पाए और युद्ध में मारे गए। अभिनय इसलिए सशक्त है कि हर सैनिक अपने किरदार में धीरे धीरे मनुष्य में बदलता है। बापी बोस निर्देशित ” वेनिस का सौदागर ” एक भव्य प्रस्तुति है जिसमें सेट डिजाइन से लेकर प्रकाश संयोजन और वस्त्र सज्जा सबकुछ स्पेक्टेकुलर है। शाईलाक की भूमिका में अखंड शर्मा आकर्षित करते हैं। मंच पर सेट बदलने में भी नाटकीयता रखी गई है। वैसे भी बापी बोस अपनी भव्य प्रस्तुतियों के लिए जाने जाते हैं। ” दिल्ली चलो ” से लेकर ” परम पुरूष ” तक उन्होंने की बेहतरीन प्रस्तुतियां दी है।

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