कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। ‘मध्य प्रदेश का रंगकर्म केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का एक सशक्त संवाहक है। प्राचीन संस्कृत नाट्य कला से लेकर आधुनिक प्रयोग धर्मी रंगमंच तक, यह प्रदेश एक निरंतर विकसित होती कला-धारा का प्रतिनिधित्व करता है।’ यह विचार विख्यात लेखक, निर्देशक एवं वरिष्ठ रंगकर्मी आलोक शुक्ला ने व्यक्त किए।
वे गत 27 अप्रैल को विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के पत्रकारिता विभाग में आयोजित थिएटर सर्टिफिकेट कोर्स के विद्यार्थियों को संबोधित कर रहे थे। अपने व्याख्यान में उन्होंने प्रदेश के समृद्ध नाट्य इतिहास को रेखांकित करते हुए महाकवि कालिदास, सेठ गोविंद दास, महाराज विश्वनाथ सिंह जू देव और वेंकटरमण सिंह जू देव जैसे पूर्वजों के योगदान का स्मरण किया। उन्होंने हबीब तनवीर, बंशी कौल, बी.वी. कारंत और अलखनंदन जैसे रंग-पुरोधाओं की चर्चा करते हुए बताया कि इन विभूतियों ने न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि भारतीय रंगमंच को विश्व स्तर पर एक नई पहचान दी है।
श्री शुक्ला ने लोक रंगमंच को आधुनिक रंगकर्म की आधारशिला बताया। उन्होंने इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर और भोपाल जैसे कला केंद्रों की सक्रियता की सराहना की। मालवा, बुंदेलखंड और बघेलखंड के लोक नाट्य रूपों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों की लोक बोलियों, गीतों और सामाजिक कथाओं ने ही आधुनिक रंगमंच को वैचारिक गहराई प्रदान की है।
व्याख्यान के दौरान उन्होंने रंगकर्म के भविष्य पर आशावाद जताया, हालांकि संसाधनों की कमी, महंगे सभागार और कलाकारों के जीविकोपार्जन की चुनौतियों पर चिंता भी व्यक्त की। उन्होंने आग्रह किया कि सरकार और वरिष्ठ रंगकर्मियों को मिलकर इन समस्याओं के समाधान के लिए ठोस पहल करनी चाहिए।
कार्यक्रम के प्रारंभ में विभागाध्यक्ष एवं वरिष्ठ निर्देशक सतीश दवे ने विद्यार्थियों के साथ आलोक शुक्ला को अंगवस्त्र एवं महाकाल की पेंटिंग भेंट कर सम्मानित किया। साथ ही उनके नाट्य दल के सदस्य प्रताप सिंह, विजय लक्ष्मी, टेकचंद, विनय शर्मा और सुश्री कविता का भी सम्मान किया गया। कार्यक्रम का आभार प्रदर्शन युवा रंगकर्मी प्रकाश देशमुख ने किया। आगे पढ़िये- भवभूति और भास की कृतियां: मंच पर अकादमिक रंग प्रयोग https://indorestudio.com/nsd-plays-review-bhasa-bhavabhuti-karmankush-uttar-ramcharit/

