रवीन्द्र त्रिपाठी, इंदौर स्टूडियो। यह मैं पहले भी कह और लिख चुका हूँ कि फिलहाल हिंदी भाषी इलाके में, दिल्ली को छोड़ दें तो, सबसे अच्छा रंगमंच जबलपुर में हो रहा है। संख्या के लिहाज से नहीं, बल्कि गुणवत्ता की दृष्टि से भी। पिछले दिनों ‘समागम’ रंगमंडल की ओर से आशीष पाठक और स्वाति दुबे के निर्देशन में भास के नाटक ‘मध्यम व्यायोग’ का मंचन जिस प्रयोगशील तरीके से हुआ, वह भी मेरी इस मान्यता को पुष्ट करने वाला ही है। दोनों ने ‘मध्यम व्यायोग’ में नई संभावनाएं भी खोजीं।
संस्कृत नाटक करते समय जो सबसे बड़ी चुनौती रहती है, वह यह कि उसके क्लासिकल पहलू को कैसे सुरक्षित रखा जाए और समकालीन जीवन-जगत के साथ उसका कैसे तालमेल बिठाया जाए। कई प्रतिभाशाली निर्देशक भी यह काम नहीं कर पाते, क्योंकि ज्यादातर या तो शास्त्रीयता के दायरे में फंस कर रह जाते हैं या फिर समकालीन बनाने के चक्कर में भास से बहुत दूर चले जाते हैं। लेकिन स्वाति और आशीष ने ऐसा नहीं किया। दोनों ने अपनी संतुलित दृष्टि से भास के इस नाटक की ऐसी आत्मीय प्रस्तुति तैयार की, जो बच्चों के अलावा बड़ों को भी रसपूर्ण लगी। यह इस प्रस्तुति की एक बड़ी खासियत रही। ऐसा बहुत कम होता है।
भास ने अपने कुछ नाटकों में महाभारत के कई चरित्रों को नया आलोक दिया। ‘कर्णभार’ में कर्ण का और ‘उरुभंगम’ में दुर्योधन का चरित्र खास तरह की प्रखरता से उभरता है। उसी तरह ‘मध्यम व्यायोग’ में भीम का व्यक्तित्व उभरता है। मध्यम का अर्थ है मझला; भीम मझले भाई थे। लेकिन इस नाटक में एक और मझला है। वह है एक ब्राह्मण का पुत्र, जिसे भीम का पुत्र घटोत्कच अपनी माँ हिडिम्बा की उदर-शांति के लिए ले जाना चाहता है। घटोत्कच इस बात से अनजान है कि ब्राह्मण कुमार को बचाने की इच्छा व्यक्त करने वाला शख्स उसके पिता भीम ही हैं। दोनों में युद्ध होता है। नाटक में भीम का परोपकारी व्यक्तित्व भी उभरता है और वीरता वाला भी। नाटक में उस अवधारणा के कई तत्व हैं जिसे आजकल विडंबना (आयरनी) कहते हैं।
स्वाति और आशीष की इस प्रस्तुति में कई ऐसे प्रयोग हुए जो मेरी जानकारी में किसी और निर्देशक ने नहीं किए हैं। पहला प्रयोग तो यह था कि मझले ब्राह्मण कुमार की भूमिका एक छोटी बच्ची परित्रा तिवारी ने निभाई। हालांकि वह बालक वेश में थी और उसमें गजब का आत्मविश्वास था। कई जगहों पर उसका सेंस ऑफ ह्यूमर भी खासा असरदार था। दो अन्य ब्राह्मण पुत्रों – बड़े और छोटे – की भूमिका में भी बच्चियां यानी लड़कियां थीं। दूसरा बड़ा प्रयोग यह था कि घटोत्कच और हिडिम्बा की भूमिकाओं में चार-पांच अभिनेता-अभिनेत्रियां थीं। इस वजह से नाटक संवादोन्मुख होने के बजाय पद-संचालन यानी मूवमेंट उन्मुख हो गया; दृश्यात्मक हो गया, संगीतात्मक भी। हालांकि भीम की भूमिका एक ही अभिनेता उज्ज्वल सिंह ने निभाई।
वैसे तो जिन्हें भास के नाटक कहा जाता है, जिनकी संख्या तेरह बताई जाती है, वे एक लंबे समय तक सिर्फ केरल में मंचित होते रहे, बिना इस जानकारी के कि वे किसके लिखे हुए हैं। 1912 में टी. गणपति शास्त्री ने अपने शोध और अध्ययन से बताया कि ये भास के लिखे हुए हैं। और फिर उसके बाद के 114 सालों में भास के इन नाटकों ने भारतीय रंगमंच पर धूम मचा दी।
संस्कृत नाटककारों में आज भास ही सबसे ज्यादा खेले जाते हैं, क्योंकि उनके अलग-अलग नाटकों में कई तरह के विचार और नाटकीय युक्तियां हैं। कई तरह की भावनाएं भी हैं; हास्य भी और त्रासदी का बोध भी। ‘मध्यम व्यायोग’ में शृंगार भी है। जब बरसों बाद हिडिम्बा अपने पति भीम से मिलती है, तो उसमें फिर से वही लालित्य भाव उदित होता है जो एक लंबे समय तक अनुपस्थित था। उसे भीम से शिकायत भी है और फिर से मिलने की उमंग भी है। दोनों प्रकार के जज्बे उसके भीतर हैं, जिसे अंग्रेजी में ‘मिक्स्ड इमोशंस’ कहते हैं।
आशीष और स्वाति पिछले कई बरसों से ऐसा रंगमंच कर रहे हैं जिसे भारत भर में प्रतिष्ठा मिली है। उनका नाटक ‘अगरबत्ती’ तो मंचन के लिहाज से ही नहीं, बल्कि मौलिक लेखन के दृष्टिकोण से भी समकालीन नाट्य जगत में विशेष स्थान बना चुका है। उनके माध्यम से जबलपुर की ही नहीं, बल्कि देशभर के युवाओं की नई टीम तैयार हो रही है, क्योंकि कई शहरों के युवा रंगकर्मी उनके यहां प्रशिक्षण लेने जाते हैं। (लेखक रवींद्र त्रिपाठी प्रख्यात कला समीक्षक, नाटककार और फिल्म मेकर हैं।) आगे पढ़िये – 21 दिनों में अन्फिल्टर्ड प्यार – https://indorestudio.com/unfiltered-pyaar-new-actors-21-days-learning/
जबलपुर में समागम का ‘मध्यम व्यायोग’
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