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शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। 25 वें भारत रंग महोत्सव में मंचित नाटक ‘गुड़म्बा’ इस उत्सव का एक उपलब्धि नाटक कहा जा सकता है। यह नाटक अमीना के किरदार के ज़रिये महिलाओं की अँधेरी ज़िन्दगी में नई रोशनी की माँग करता है। महिलाओं के प्रति हमारी रूढ़िवादी मानसिकता को बदलने का संदेश देता है। नाटक कहता है कि औरतों के हक़ में क़ानून बना देने भर से काम नहीं चलेगा, उनके सशक्तिकरण के लिये हमें ख़ुद को बदलना होगा। इसकी शुरूआत हमें अपने घरों से करना होगी, जहाँ महिलाएं आज भी अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रही हैं।
जावेद सिद्दीक़ी का सशक्त नाटक: इस सोलो प्ले या मोनोलॉग का सशक्त लेखन मशहूर स्क्रिप्ट राइटर जावेद सिद्दीक़ी ने किया है। उन्होंने जितना अच्छा ये नाटक लिखा है, उनकी अभिनेत्री बेटी लुबना सलीम ने उतना ही कमाल का अभिनय किया है। हम जानते ही हैं कि जावेद सिद्दीक़ी एक अनुभवी साहित्यकार हैं जिन्होंने 100 से अधिक पटकथाएं लिखी हैं। इनमें कई ब्लॉक बस्टर फ़िल्में शामिल हैं। तुम्हारी अमृता, सालगिरह, बेगम जान, आपकी सोनिया, हम सफ़र और कच्चे लम्हे उनके महत्वपूर्ण नाटक है। लुबना सलीम जानी-पहचानी थिएटर, फिल्म और टेलीविजन अभिनेत्री हैं। वह थिएटर ग्रुप एस्से एनसेम्बल की संस्थापक और निर्माता भी हैं। वे नाटकों के अलावा कई फ़िल्मों, धारावाहिकों, वेब सिरीज़ में महत्वपूर्ण किरदार अभिनीत कर चुकी हैं। (अभिनेत्री पत्नी लुबना के साथ सलीम आरिफ़। तस्वीर सौजन्य: भरत तिवारी। शो की शेष तस्वीरें एनएसडी फोटोग्राफी डिपार्टमेंट, दिल्ली।)
सिद्धहस्त हस्ताक्षर सलीम आरिफ़: नाटक में निर्देशन रंगकर्म के सिद्धहस्त हस्ताक्षर सलीम आरिफ़ का है। कहने की ज़रूरत नहीं कि सलीम आरिफ़ रंगमंच और फ़िल्मों की एक सीमा चिन्ह शख़्सियत हैं। उन्होंने गा़लिबनामा, क़ैफ़ी साब, अरे ओ हेनरी, पीले पत्थरों का प्रतिबंध और आपकी सोनिया जैसे नाटकों का निर्देशन किया है।आप मुंबई के फ़िल्म स्कूल विहसलिंग वुड्स इंटरनेशनल के सांस्कृतिक विभाग के अध्यक्ष हैं। इस रंग शख्सियत के नाम कई पुरस्कार दर्ज हैं।
आम हिंदुस्तानी लड़की की कहानी: मोनोलॉग में लुबना एक आम हिंदुस्तानी लड़की ‘अमीना’ का किरदार निभाती हैं। अमीना शादी के बाद, नई नवेली बहू बनती है। इसके बाद वो बहू से सास बनने तक का सफ़र तय करती है। इस सफर में उसके साथ एक ट्रैडिशनल सास है, हसबैंड माजिद के साथ शादी का शुरूआती ख़ुशनुमा रिश्ता है, फिर पति के अफेयर और उससे जुड़ी घुटन है। इसके बाद उनके बेटे की नाटकीय शादी है। इसी कथ्य में उस नंद की स्टोरी भी है जिसने मर्ज़ी से शादी कर ली है। परिवार ने उससे नाता तोड़ लिया है।
गुड़ और कच्चे आम का व्यंजन: पूरी कहानी तीन पीढ़ियों की सोच, व्यवहार और रिश्तों की परतों को दर्शकों के सामने खोलकर रख देती है। सबसे बढ़कर यह कहानी अमीना के ज़रिये हमारी रूढ़वादी या पारंपरिक सोच को बदलती है। गुड़ और कच्चे आम से बने खट्टे-मीठे व्यंजन ‘गुड़म्बा’ की तरह, सभी को अपने जीवन में स्वीकार करने और बदले दौर के अनुरूप, ख़ुद को बदलने का संदेश देती है। कहने को कहानी में कई मोड़ हैं, तनाव से भरे पेंच हैं। परंतु कहानी को जितने हल्के-फुलके अंदाज़ में लिखा गया है, मंच पर उसी तरह से लुबना ने इसे जीया है। सलीम आरिफ ने भी उतनी सहजता से इस एकालाप को निर्देशित किया है।
किरदार में एकाकार लुबना सलीम: नाटक में लुबना अपने किरदार को जीवंत कर देती हैं। उनके एकल अभिनय की ख़ूबी थी कि दर्शक 1 घंटे 40 मिनट तक नाटक को एकटक देखते रहे। एक पल के लिये भी लुबना के किरदार से अलग नहीं हो सके। नाटक में दर्शक, लुबना के कथनों पर जहाँ एकतरफ़ ठहाका लगाते हैं और वहीं उसके दु:ख में शामिल होकर उदास हो जाते हैं। लुबना सलीम के अभिनय की बड़ी सफलता ये है कि वे किरदार में खुद कहीं भी नज़र नहीं आती। किरदार में एकाकार हो जाती हैं। नाटक से नौजवान पीढ़ी भी खुद को जुड़ा महसूस करती है। नाटक के बाद सवाल-जवाबों में उनकी जिज्ञासाओं से यह बात साफ़ नज़र आती है। (लुबना-सलीम के साथ तस्वीर)
4 साल पहले मिला बाबा से गिफ्ट: मंचन के बाद मेरे सवाल पर लुबना जी ने बताया- ‘मुझे ये स्क्रिप्ट बाबा यानी मेरे वालिद जावेद सिद्दीक़ी ने चार साल पहले बर्थ डे पर गिफ्ट की थी। यह वह समय था, जब मैं खुद को मंच पर नये रूप से प्रस्तुत करने के बारे में सोच रही थीं, अभिनय की नई ट्रेनिंग के साथ ही काफी कुछ पढ़ और सीख रही थीं। धीरे-धीरे इस किरदार को मैंने समझा, इसके बारे में खुद को मानसिक तौर पर तैयार किया। इसका पहला मंचन 25 दिनों के बाद हुआ था और अब तक इसके तकरीबन 25 शोज़ हो चुके हैं। जैसे-जैसे इस मोनोलॉग के मंचन हुए, किरदार के हिसाब से मैं और मैच्योर होती चली गई। उन्होंने कहा, ‘यह नाटक ऐसा है जिसमें मैं अकेले अमीना को ही नहीं दूसरे कई पात्रों को भी जीती हैं, चाहे वो सास हो या सहेली या फिर बेटा’।
बहुत से बदलावों से गुज़रा नाटक: सलीम आरिफ़ ने कहा, यह नाटक तैयारी के दौरान काफी बदलावों से गुज़रा और आज के रूप में पहुँचा। उन्होंने कहा, ‘मेरे लिये अच्छी बात है कि जावेद सिद्दीक़ी या गुलज़ार जैसे राइटर से मैं सीधे जुड़ा हूँ। उनके साथ बात कर हम अपने काम में और गहराई या नये आयाम दे पाते हैं। यह सब इस मोनोलॉग के साथ भी हुआ है। एक प्रेक्षक के जवाब में उन्होंने कहा- ‘ऐसा नहीं है कि कहानियों के मंचन के ताज़ा प्रचलन के हिसाब से मैंने ‘गुड़म्बा’ के निर्माण का फ़ैसला किया। असल में नाटक या कहानी खुद बताती है कि उसकी प्रस्तुति का तरीका क्या हो। इस कहानी के साथ भी ऐसा ही हुआ। मूल बात संप्रेषण या कंटेट की है’। 
भावप्रवण लुबना ही काफ़ी लेकिन: मंच सज्जा के विषय में सलीम आरिफ़ ने कहा, ‘देखा जाये तो इस नाटक में लुबना जैसी भावप्रवण अभिनेत्री ही काफी है, परंतु एक निर्देशक के रूप में मुझे प्रस्तुति के लिये सैट, प्रकाश और संगीत की जो भी ज़रूरत महूसस हुई, वह मैंने किया है। मिसाल के लिये मैंने दो कॉर्नर्स पर दो फ़ोन रखें। पीछे की दीवार पर घड़ी है, जहाँ शायद में आयतल कुर्सी का तुगरा भी लटका सकता था।
सफ़ेद लिबास एक न्यूट्रल कलर: सलीम जी ने कहा, ‘अमीना के किरदार के लिये मैंने सफ़ेद पोशाक को इसलिये चुना क्योंकि सफ़ेद एक न्यूट्रल कलर है, हर सिचुएशन के साथ इसकी पोशाक चल सकती है। नाटक उर्दू में है लेकिन अमीना वजूद की जगह ‘अस्तित्व’ जैसे शब्द का उपयोग करती है। इससे जुड़े पूछे गये सवाल के जवाब में सलीम आरिफ ने कहा – ‘नाटक की भाषा या किरदार की अपनी भाषा होती है, हमने इस नाटक में उर्दू की जगह आम हिंदुस्तानी ज़बान को प्राथमिकता दी है। इसे आप देवनागरी में लिखे तो हिंदी है और फारसी लिखे जाने की लिपि (नस्तालीक) में लिखें तो उर्दू’। बता दें कि 25 वें भारत रंग महोत्सव में ‘गुड़दम्बा’ की प्रस्तुति एस्से एन्सेबल,मुंबई के बैनर तले किया गया। और कहानियाँ पढ़ें – https://indorestudio.com/

