|
Getting your Trinity Audio player ready...
|
“मैं ख़ुद को रिपीट नहीं कर सकता। एक बार जब मैं एक खास तरह की फिल्म कर लेता हूं, तो मैं आगे बढ़ना चाहता हूं। मैं ऐसी कहानियों की तलाश करता हूं जो फ्रेश, यूनिक और क्रिएटिवली एक्साइटिंग लगें।”
मशहूर फिल्ममेकर आमिर ख़ान ने यह बात इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया में कही। उनके सेशन का शीर्षक था “The Narrative Architect of Social Transformation and Inclusivity”। मॉडरेटर थे फिल्म क्रिटिक बरद्वाज रंगन। इस सेशन में आमिर ख़ान ने जो कुछ कहा, वही उनकी ज़ुबानी में।
मैं बचपन से ही कहानियों की तरफ खिंचता चला आया हूँ। मेरी दादी की सुनाई कहानियाँ और रेडियो पर ‘हवा महल’ का जादू मेरे अंदर कहीं उतर गया। यही वो शुरुआती पल थे जिन्होंने मेरी क्रियेटिव थिंकिंक को आकार दिया। कहानियाँ मेरे बचपन का बड़ा हिस्सा थीं और उन्होंने ही एक्टर के तौर पर मेरे हर चुनाव को गाइड किया।
मैंने कभी ट्रेंड्स देखकर फिल्में नहीं चुनीं। इंडस्ट्री में लोग अक्सर सोचते हैं कि इस समय एक्शन चलेगा या कॉमेडी, लेकिन मेरा तरीका हमेशा अलग रहा। मैं फिल्में सिर्फ़ अपने इमोशनल एक्साइटमेंट के आधार पर चुनता हूँ। जब हमने लगान बनाई, तो जावेद साब ने भी हमें ऐसा न करने की सलाह दी थी। लेकिन मैंने हर नियम तोड़ा और किसी तरह उन अनकन्वेंशनल चॉइस ने लोगों को कनेक्ट किया। इसके लिए मैं बहुत आभारी हूँ।
मेरे लिए सबसे ज़रूरी है कि दर्शक जुड़ें। लोग सिनेमा में सोशियोलॉजी का लेक्चर सुनने नहीं आते। वे इमोशन, सस्पेंस, हंसी और ड्रामा के लिए आते हैं। मेरी पहली ज़िम्मेदारी उनका मनोरंजन करना है। अगर किसी अच्छी स्क्रिप्ट में सोशल मैसेज भी होता है, तो वह बोनस है, लेकिन शुरुआती पॉइंट कभी नहीं।
मेरी फ़िल्मों की नींव हमेशा लेखकों ने रखी है। तारे ज़मीन पर, 3 इडियट्स, दंगल या लापता लेडीज़—इन सबकी ताक़त स्क्रिप्ट थी। मैं बस उन कहानियों की तरफ खिंचा जो मुझे पसंद आईं। पीछे मुड़कर देखता हूँ तो पाता हूँ कि मेरी कई फ़िल्में सोशल मुद्दों को उठाती हैं, लेकिन यह अपने आप हुआ, डिज़ाइन से नहीं। मैं सम्पूर्ण फ़िल्मी व्यक्तित्व हूँ, कोई एक्टिविस्ट नहीं।
मैंने तय किया है कि अपने मौजूदा प्रोडक्शन प्रोजेक्ट्स—लाहौर 1947, हैप्पी पटेल और कुछ और—पूरा करने के बाद मैं पूरी तरह से एक्टिंग पर लौटूँगा। अब से जो भी स्क्रिप्ट सुनूँगा, वह सिर्फ़ एक एक्टर के तौर पर मेरे लिए होगी। यह बड़ा बदलाव है, लेकिन मुझे लगता है कि यह सही समय है खुद को फिर से एक्टिंग के लिए समर्पित करने का।
डायरेक्शन मेरा सबसे बड़ा प्यार है। फ़िल्ममेकिंग मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है। मैंने एक बार डायरेक्ट किया था, लेकिन वह ज़्यादातर एक मुश्किल की वजह से था। जिस दिन मैं जान-बूझकर निर्देशन करने का फ़ैसला करूँगा, शायद अभिनय छोड़ दूँगा, क्योंकि डायरेक्शन मुझे पूरी तरह से ले लेगा। यही वजह है कि मैं अभी उस फ़ैसले को टाल रहा हूँ। आमिर ख़ान की कला अकादमी के सेशन में कहीं गईं इन बातों को दिलचस्पी से सुना गया। सेशन में धर्मेंद्र को भी याद किया गया। उन्होंने कहा है कि निधन से पहले स्व.धर्मेंद्र ने बेटे सनी की फ़िल्म ‘लाहौर 1947’ देख ली थी। इनपुट और तस्वीरें पीआईबी गोवा। आगे पढ़िये – 1942 ए लव स्टोरी में रियल लव – विधु विनोद चोपड़ा https://indorestudio.com/vidhu-vinod-chopra-iffi-rd-burman-1942-a-love-story/

