13 मई,नीमच। ‘मदर्स डे’ पर मध्यप्रदेश ने अपने एक लोकप्रिय साहित्यकार और राजनीतिज्ञ बाल कवि बैरागी को खो दिया। उनका जीवन आज दूसरों के लिये प्रेरणा है। ‘मदर्स डे’ पर उनका निधन उनके कठिन जीवन की याद दिलाता है। वो कहते थे, मैं मां का निमार्ण हूं, मैं जो कुछ बना अपनी मां की वजह से बन सका। मां ने ही कहा था, बेटा निराश मत होना, अपने सपनों की फसल बोते चले जाना। मैंने वही किया। बाल कवि बैरागी ने यह बात खुद अपने एक इंटरव्यू में कही थी। इसे हम यहां साभार शेयर कर रहे हैं। तब उन्होंने कहा था, बेहद विपरीत हालात में उनका जीवन शुरू हुआ था। उनके पास पहले खिलौने के रूप में भिक्षा का पात्र आया था।
बालकवि बैरागी का रविवार की शाम निधन हो गया। वे 87 वर्ष के थे। मनासा क्षेत्र के बालकवि बैरागी ने राजनीति के क्षेत्र में भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाई थी। आप राज्यसभा के सदस्य रहे। साथ ही काव्य मंचों पर भी खासे लोकप्रिय रहे। मृदु स्वभाव के स्व. बैरागी को कई पुरस्कारों से नवाज़ा गया। गीत, दरद दीवानी, दो टूक, भावी रक्षक देश के, आओ बच्चों गाओ बच्चों श्री बैरागी की प्रमुख रचनाएं हैं। बाल कवि बैरागी चौथी क्लास से ही कविताएं लिखने लगे थे। वे आजीवन साहित्य सेवा में जुटे रहे । उन्होंने 28 से ज़्यादा क़िताबें लिखीं। बाल कवि बैरागी का अंतिम संस्कार 14 मई की दोपहर 2 बजे मनासा में होगा।
बैरागी का जन्म 10 फरवरी 1931 को मनासा विकासखंड के रामपुरा में हुआ था। बालकवि बैरागी का जन्म मंदसौर जिले की मनासा तहसील के रामपुर गांव में हुआ था। विक्रम विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया। वे 1945 से कांग्रेस में सक्रिय रहे। 1967 में उन्होंने विधानसभा चुनाव में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा को शिकस्त दी थी। 1969 से 1972 तक पं. श्यामाचरण शुक्ल के मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री रहे।1980 में मनासा से दोबारा विधायक बने। अर्जुनसिंह की सरकार में भी वे खाद्य मंत्री रहे। 1984 तक लोकसभा में रहे। 1995-96 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में संयुक्त सचिव रहे। 1998 में मप्र से राज्यसभा में गए। 29 जून 2004 तक वे निरंतर राज्यसभा सदस्य रहे।

