शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। दुल्हन का चरित्र एक, लेकिन मंच पर दुल्हनें एक नहीं, तीन? दूल्हे का किरदार एक, लेकिन मंच पर दूल्हे भी तीन ! यह है एक अलग रंग-प्रयोग और दर्शकों के लिए एक नया अनुभव। इस अभिनव प्रस्तुति का नाम है – ‘माई रे मैं कासे कहूँ’। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी), दिल्ली के समर थिएटर फेस्टिवल में इसका एक बार फिर मंचन हुआ। एनएसडी, रंगमंडल की यह प्रस्तुति दर्शकों को गहरे तक प्रभावित कर गई।
स्त्री जीवन की मर्मभेदी कथा और अभिनव रंग-संगीत:
‘माई रे’ स्त्रियों के जीवन की एक मर्मभेदी कथा है। इस प्रस्तुति का हृदयस्पर्शी संगीत भी किसी लोक-कथा के गायन के अन्वेषी और अद्भभुत प्रयोग से कम नहीं। यह नाटक दिवंगत विजयदान देथा की ‘दुविधा’ शीर्षक से लिखी गई कथा पर आधारित है। कथा के प्रवाह को पूरी तरह बरकरार रखते हुए – इसकी परिकल्पना, रूपांतर, संगीत और निर्देशन अजय कुमार ने किया है। प्रस्तुति की संकल्पना और मार्गदर्शन एनएसडी, रंगमंडल के प्रभारी राजेश सिंह का है।
रंगमंडल के कलाकारों ने दिया अपना श्रेष्ठ:
अजय कुमार की कल्पना के अनुरूप एनएसडी, रंगमंडल के कलाकारों और साजिंदों ने भी अपनी उत्कृष्ट कला का प्रदर्शन किया। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि अजय कुमार एक बेहतरीन अभिनेता, शानदार संगीतकार और एक सुलझे हुए निर्देशक होने के साथ-साथ एक श्रेष्ठ प्रशिक्षक भी हैं। उन्होंने एनएसडी रंगमंडल के कई नाटकों में यादगार भूमिकाएँ निभाई हैं। दर्जनों नाटकों का संगीत तैयार किया है। ‘माई री .. उनके निर्देशन में सजी एक अविस्मरणीय गाथा है।
अस्तित्वहीन स्त्रियों के वजूद का जीवंत दर्पण:
वर्ष 2022 में यह नाटक तैयार हुआ था और तब से अब तक इसके 40 से अधिक सफल प्रदर्शन हो चुके हैं। यह नाटक समाज की ऐसी स्त्रियों का दर्पण है, जिनका वास्तव में कोई वजूद स्वीकार नहीं किया जाता। उनका दुनिया में आना और जाना, दोनों एक सज़ा की तरह प्रतीत होता है। बेटी के रूप में उनके जन्म लेने पर आज भी वैसी खुशियाँ नहीं मनाई जातीं। घर के आंगन में भी वो नहीं समाती। समय आते ही उसे ब्याह दिया जाता है। यहां भी विंडबना ये है कि उसे अपनी मर्ज़ी का पति नहीं मिलता; वह जिसके बंधन में बाँध दी जाती है, उसी के हवाले, उस स्त्री का संपूर्ण जीवन या निर्वहन और मरण होता है।
लोककथा, भूत से प्रेम और सामाजिक नियति का द्वंद्व:
इस नाटक की कथा भी कुछ ऐसी ही है, जो जनश्रुति या लोककथाओं से उद्धृत है—और यही इसके प्रतिष्ठित लेखक दिवंगत विजयदान देथा की मुख्य विशेषता रही है। कहानी उस दुल्हन की है, जिसका विवाह एक ऐसे व्यक्ति से हो जाता है जिसका एकमात्र लक्ष्य केवल धन कमाना है। शादी के अगले ही दिन वह पाँच साल के लिए व्यापार करने परदेस चला जाता है। इसी बीच, एक प्रेत या भूत उस दुल्हन पर आसक्त हो जाता है।
भूत कर लेता है दूल्हे का रूप धारण:
भूत को दूल्हे के परदेस जाने की ख़बर लग जाती है। वह दूल्हे का ही रूप धारण कर, दुल्हन के ससुराल पहुँच जाता है। वह दुल्हन के सामने अपने प्रेत होने की सच्चाई भी बयान कर देता है। पति के उपेक्षित व्यवहार से व्यथित दुल्हन, भूत के सच्चे प्रेम को स्वीकार कर लेती है और वह उससे गर्भवती हो जाती है।
ये कैसे हुआ! मेरी पत्नी माँ कैसे बन गई?
पत्नी के गर्भवती हो जाने की ख़बर जब परदेस में असली पति को लगती है, वह भागा-भागा घर लौटता है। उसके आने के बाद घर और पूरे नगर में एक ही शक्ल-सूरत वाले दो पतियों को लेकर कोहराम मच जाता है। असली पति जानना चाहता है कि संबंध बनाये बिना उसकी पत्नी माँ कैसे बन गई? अंत में कहानी एक ऐसे मोड़ पर पहुँचती है, जहाँ निश्छल प्यार हार जाता है और जीत उसी रूढ़िवादी परंपरा और समाज की होती है, जिसकी नियति से एक स्त्री सदियों से बँधी है। वह फिर से उसी बंधन में जकड़ जाती है, जिससे उसे अनायास छुटकारा मिला था। भूत उसके सच्चे प्रेमी के रूप में उसके जीवन में आया था। और उसके आने पर पहली बार उसे जीवन का जस और सुख मिला था।
“कथा, गायन और वाचन” की अनूठी शैली:
यह एक प्रतीकात्मक कथा है—एक ऐसी कल्पना, जो सच भले न हो, लेकिन यह समाज में एक स्त्री की स्थिति, उसकी दशा और उसके जीवन के कड़वे सत्य को सामने ला खड़ा करती है। यह कथा जितनी सशक्त है, अजय कुमार की परिकल्पना और निर्देशन में मंच पर यह उतने ही प्रभावशाली तरीके से साकार होती है। अजय कुमार ने इसे “कथा, गायन और वाचन” की पारंपरिक नाट्य शैली में रचा है।
भावनाओं का दर्पण, नाटक का संगीत:
नाटक के हर महत्वपूर्ण मोड़ और दृश्य की भावनाओं के अनुकूल इसमें हृदय ग्राही संगीत को पिरोया गया है। यह जीवंत संगीत इतना प्रभावशाली है कि दर्शक सुरों के प्रवाह में बहने लगते हैं। इसके गीत-संगीत और नृत्य के माध्यम से आप लोक संगीत और नाट्य परंपरा के उस अतीत में पहुँच जाते हैं, जहाँ गाँव-गाँव में चबूतरों, चौराहों, चौबारों या चौपाल पर नाट्य मंडलियाँ रात-रात भर ऐसी कथाओं का मंचन किया करती थीं (आज भी कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा होता है)। अजय कुमार ने इस नाट्य परंपरा और संगीत में किसी विशिष्ट शैली या राज्य के लोक संगीत को तरजीह नहीं दी है, बल्कि उन्होंने उसके मूल सार तत्वों को प्रस्तुति में अपनाया है।
संगत कलाकारों का हुनर और अभिनव प्रयोग:
उनके इस संगीत में राजेश कुमार पाठक और पंडित अनिल कुमार मिश्रा जैसे संगीत साधकों का सराहनीय सहयोग मिला। पं. अनिल कुमार मिश्रा हाल ही में फिर से तैयार किये गये नाटक ‘अक्स तमाशा’ के संगीत की पुनर्रचना में भी अहम भूमिका निभा चुके हैं। ‘माई री मैं कासे कहूँ’ में नायिका की भावनाओं के अनुरूप वे अपने पार्श्व अलापों से दृश्यों को और भी मर्मस्पर्शी बना देते हैं। उनके साथ ही नाटक के संगत कलाकार और मंच पर मौजूद अभिनेता अपने समवेत स्वर से इस नाटक और इसके गीत-संगीत को शिखर तक पहुँचा देते हैं।
अभिनव रंग-प्रयोग वाली नाट्य प्रस्तुति:
यह नाटक एक नए रंग-प्रयोग को भी सामने लाता है। इस नाटक में दुल्हन और दूल्हे के इकलौते किरदारों के लिए मंच पर सिर्फ एक नहीं, बल्कि तीन दुल्हनों और तीन दूल्हों को प्रस्तुत किया गया है। तीनों ही अपने संवाद एक के बाद एक मंच पर बोलकर कथा के एक ही नायक और नायिका को प्रतीकात्मक रूप से अभिव्यक्त करते हैं, दर्शाते हैं कि यह समाज की किसी एक दुल्हन की कहानी नहीं है (हालाँकि बाद में केवल दो दुल्हनें रह जाती हैं)।
प्रस्तुति में सूत्रधार बदलते रहते हैं:
इसी तरह कथा के वाचन में भी दो सूत्रधारों का उपयोग किया गया है, जो एक ही संवाद को एक साथ मंच पर बोलते हैं।लेकिन दृश्य के अनुसार, सूत्रधार बदलते रहते हैं; जो पात्र हैं, वे ही सूत्रधार में बदल जाते हैं और इस तरह कहानी नए दृश्यों का रुख करती है। एक बात और—नौटंकी, तमाशा या किसी भी भारतीय लोक नाट्य परंपरा की तरह, मंच पर प्रवेश (एंट्री) के बाद कलाकार मंच से विदा (एक्जिट) नहीं लेते, बल्कि वे मंच पर ही बैठे रहते हैं और अपने दृश्य के समय विविध पात्रों की भूमिकाएँ निभाने आते-जाते रहते हैं, सह-गायन में हिस्सा लेते हैं। यहाँ तक कि वे अपनी वेशभूषा भी मंच पर ही बदल लेते हैं।
एक सुविचारित रंग-दृष्टि और भावपूर्ण नाटक:
यह नाटक बेहद सोचा-समझा, अथक अभ्यास से भरा और एक कौशल पूर्ण रंगमंच का उदाहरण है। यह एक खोज की तरह है, जो कहानी के रंगमंच को एक नये आकाश की ओर ले जाता है। यह एक ऐसा नाटक है जिसमें सुविचारित रंग-दृष्टि, नाट्य परंपरा और नाट्य शास्त्र के अनुरूप दर्शकों को एक बेहतर समाज बनाने का संदेश दिया गया है। नाटक के अंत में दुल्हन (नायिका) अपने बच्चे के पिता और प्रेमी (भूत) से उसे मुक्त किये जाने पर अकेली ही नहीं कहती -‘माई री मैं कासे कहूँ’….उसकी वेदना से जुड़े दर्शक भी कह उठते हैं – ‘माई रे’ !…
‘कथा-गायन-वाचन’ से आप भी अपरिचित नहीं:
अपनी इस प्रस्तुति के बारे में अजय कुमार कहते हैं- “अगर आपने बचपन में अपने दादा-दादी या नाना-नानी से तरह-तरह की कहानियाँ सुनी हैं—जैसे पंचतंत्र, रामायण, महाभारत, बेताल पच्चीसी या जिन्न-परियों के किस्से भी—तो आप अनजाने में ही ‘कथा-गायन-वाचन’ कला से परिचित ही हैं। मैं इसे एक प्राचीन और प्रयोगात्मक शैली मानता हूँ। पूरी दुनिया की संस्कृतियों ने अपनी पहचान और विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए इसी शैली को अपनाया है। एक रंगकर्मी होने के नाते मैंने इन्हीं सार तत्वों को समझकर, इसे अपने नाटक में प्रस्तुत करने की कोशिश की है। मैंने अब तक जो कुछ भी पढ़ा, सुना और जिया है, इस प्रस्तुति में उसकी एक छोटी-सी झलक भर है।”
प्रस्तुति में शामिल प्रमुख कलाकार: सूत्रधार: शिल्पा भारती, अनीता बितालू, सत्येन्द्र, अंकुर सिंह / भूत : मज़िबुर रहमान / दुल्हन : पूनम दहिया, अप्सरा खान, शिवानी भारतीया / दूल्हा : अनंत शर्मा, आशुतोष कुमार, अमन कुमार / सेठ : शिव प्रसाद गोंड / सेठानी : इप्सिता कुंदु / माधवी शर्मा / गड़रिया : सुमन कुमार / कोरस : सभी रंगमंडल कलाकार। प्रस्तुति का संचालन एनएसडी, रंगमंडल के प्रमुख राजेश सिंह ने किया। उन्होंने निर्देशक अजय कुमार को गुलदस्ता भेंट कर स्वागत किया। अपने संबोधन में अजय कुमार ने कुछ कहने की जगह, स्व. विजयदान देथा के बहुमूल्य अवदान को याद किया।
मंच परे (नेपथ्य में): रेपर्टरी प्रमुख : राजेश सिंह / स्टेज असिस्टेंट: अनंत शर्मा / सेट निर्माण: राम अवतार मीणा, मनोज कुमार, तकमीर, रिजवान / प्रकाश डिज़ाइन एवं संचालन: सुनील कुमार / ध्वनि तकनीशियन: स्वर्णा लता, नितिन कुमार / प्रकाश सहयोग: सुनील कुमार, शुभम, अनुज / वेशभूषा प्रभारी: निशा, पार्वती बिष्ट / वेशभूषा डिज़ाइन: पूजा गुप्ता / वेशभूषा सहायक: पूजा, मुन्ना / प्रॉप्स: मोतीलाल खरे / सहायक: प्रतीक, मनीष, नरेश / तालवादक: मनोज कुमार दास / हारमोनियम: राजेश पाठक / सारंगी: पं.अनिल मिश्रा / तालवाद्य: शैलेन्द्र चौहान / सितार: उमा शंकर / संगीत संयोजन एवं सहायक: नवीन सिंह ठाकुर, प्रतीक बढेरा / पोस्टर एवं ब्रोशर मार्गदर्शन: मज़िबुर रहमान / पोस्टर एवं ब्रोशर डिज़ाइन: अली रज़ा / मेकअप: हीरालाल राय, प्रसून नारायण / स्टेज मैनेजर: अभिषेक मुद्गल / प्रशासन एवं लेखा: ज़ुबैर बेदी, आदित्य वर्मा / प्रशासन सहायक: पवन कुमार, मनोज अठवाल / फोटोग्राफी : दीपक कुमार
बहुआयामी रंग-कर्मी: प्रोफेसर अजय कुमार:
अजय कुमार वर्तमान में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में वॉइस, स्पीच और थिएटर म्यूज़िक के एसोसिएट प्रोफेसर हैं। 1989 में पटना से अपनी रंग-यात्रा शुरू कर वर्ष 2000 में एनएसडी से अभिनय में विशेषज्ञता प्राप्त करने वाले अजय ने बी.वी. कारंत, बंसी कौल, नसीरुद्दीन शाह और टिम सपल जैसी कई दिग्गज राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय हस्तियों के साथ काम किया है। आप ‘ए मिडसमर नाइट्स ड्रीम’ सहित 50 से अधिक नाटकों में अभिनय और संगीत निर्देशन कर चुके हैं।
साहित्यकार स्व. विजयदान देथा का अवदान:
नाटक के लेखक स्व. विजयदान देथा राजस्थान के एक अत्यंत प्रसिद्ध और सम्मानित लोक कथाकार व साहित्यकार रहे। उन्होंने राजस्थानी लोक-कहानियों और मौखिक परंपराओं को आधुनिक साहित्य के पन्नों पर सहेजने का ऐतिहासिक कार्य किया। उनका सबसे प्रमुख और विशाल कार्य ‘बातां री फुलवारी’ (कहानियों का बगीचा) है, जो 14 खंडों में प्रकाशित राजस्थानी लोककथाओं का एक अनूठा व समृद्ध संग्रह है। उनकी कालजयी कहानियों पर कई प्रसिद्ध फ़िल्में और नाटक बन चुके हैं। इनमें मणि कौल की ‘दुविधा’, अमोल पालेकर की ‘पहेली’ और हबीब तनवीर का कालजयी नाटक ‘चरणदास चोर’ प्रमुख हैं। उनके इस अमूल्य साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री, साहित्य अकादमी पुरस्कार और साहित्य चूड़ामणि जैसे कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया। आगे पढ़िये शकील अख़्तर की एक और रिपोर्ट- किसने कहा आत्म निर्भर होने के लिये ‘टिकट ऑडियंस’ ज़रुरी? https://indorestudio.com/aatma-nirbharta-ke-liye-ticket-audience-banane-ki-zarurat-om-katare/
माई रे… दुल्हन का चरित्र एक, लेकिन मंच पर दुल्हनें तीन ?
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