जयंत देशमुख यानी ‘मृत्युंजय’ और ‘नट सम्राट’ जैसे ख्यात नाटक। बेंडिट क्वीन, बवंडर, आँखें, आरक्षण, राजनीति जैसी फ़िल्मों और तारक मेहता जैसे धारावाहिकों का कला निर्देशन। इन उपलब्धियों और कामयाबी के पीछे उनकी एक संघर्ष भरी कहानी है। वे कहते हैं, ‘मैं जो कुछ रचता हूं वह मेरे मन की कला है। मैं गूगल पर नहीं अपने हुनर पर भरोसा रखता हूं। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक विनय उपाध्याय ने पिछले दिनों उनसे लंबी बातचीत की। उस बातचीत के विशेष अंश हम यहां खुद जयंत देशमुख की ज़ुबानी प्रकाशित कर रहे हैं।
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मन से उपजती है कला : कला सदा चित्त और मन से आती है। मैं उसपर भरोसा करता हूं, गूगल पर नहीं। असल में आपके पास जो कौशल होता है, क्राफ़्ट होता है। आप उसे अपने काम में कन्वर्ट करते हैं। जो आपका चित्त कहता है, जो आपका मन कहता है वह आप पेंट करते हैं । वो आप बनाते हैं। इस सबके पीछे आपका अनुभव,अध्ययन, हुनर सबकुछ होता है। धीरे-धीरे आप काम करते हुए अपने काम में दक्ष हो जाते हैं। आपका कौशल ही आपको उस व्यवसाय की दुनिया में लाता है। पिछले तीस साल में क़रीब नब्बे फि़ल्में मैंने की हैं। तीस-चालीस टेलीविजन शोज़ किये हैं। ‘सरस्वती चन्द्र’, ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’, ‘बेगू सराय’ इत्यादि। अपना मन, चित्त, कौशल और व्यवसाय, इसके बीच में आपको अपने आपको बचाकर रखना बहुत ज़रूरी है। या तो व्यवसाय इतना बड़ा हो जायेगा या बाज़़ार इतना बड़ा हो जायेगा कि आपको भ्रष्ट कर देगा। है भी। भ्रष्ट होते भी हैं लोग। मुझे लगता है उससे बचना जो है वो ही चित्त का, मन का कौशल है। मैंने हर संभव अपने मन और चित्त को सुना है।
मैं थियेटर से सिनेमा में आया : मैं थियेटर से सिनेमा में गया हूँ। मेरी सबसे बड़ी मुश्किल है कि मैं ट्रेंड आदमी नहीं हूँ। मैंने किसी स्कूल-कॉलेज से डिग्री नहीं ली है। न मैंने ड्राईंग सीखी है, न मैंने पर्सपेक्टिव सीखा है। मैंने सब कुछ अपने क्रियात्मक अनुभव से सीखा है इसलिए उन सारे लोगों से अलग मेरा काम दिखता है। मैं बहुत सारा मन और चित्त से करता हूँ भले वो व्यावसायिक काम है। ‘कलकत्ते में’ इस नाम से अभी शो आ रहा है आप देखियेगा। मैंने वो कलकत्ता बनाया है मुम्बई में। ये कलकत्ता की कहानी है। प्रोडक्शन की मांग को पूरा करते हुए मैं रियलिस्टिक रचने की कोशिश करता हूँ। यही मेरी पहचान है। मैं अभी भी गूगल पर पूरा भरोसा नहीं करता। मेरे अपने घर में, अपनी कमाई की, एक बहुत बड़ी लाइब्रेरी है। दुर्भाग्य से लोगों ने आज पुस्तक पढ़ना बंद कर दिया है। लोगों ने देखना भी बंद कर दिया, पढ़ना तो बहुत दूर की बात है। देखना और देखना, सुनना और सुनना, पढ़ना और पढ़ना बहुत महत्त्वपूर्ण रहा है मेरी जि़ंदगी में। बेसिकली यही भूल गये।
कैमरे के देखने की कला : अपने मुँह से कहना थोड़ा ठीक नहीं लगता, हिन्दुस्तान में जो पाँच बडे़ प्रोडक्शन डिज़ाइनर हैं उसमें से मैं एक हूँ, जो बिना पढ़ा-लिखा आदमी है। बाकी लोगों में कोई जे.जे. स्कूल से है, कोई कलकत्ता से है, कोई और कहीं से है। मैंने जो भी कुछ अपनी ज़मीन रची, अपने मजदूरों के साथ, अपने कामगारों के साथ काम करते हुए रची। वो भाषा सीख ली, सिनेमा सीख लिया। क्योंकि आर्ट डायरेक्शन एक अलग चीज़ है और सिनेमा का आर्ट डायरेक्शन अलग चीज़ है। क्योंकि हम जो बनाते हैं वो आँख से देखने की नहीं, वो कैमरे से देखने की चीज़ है। हो सकता है आँख से आपको बहुत खराब लगे, लेकिन जैसे ही स्क्रीन पर होगा उसमें चार चाँद लग जायेंगे। प्रोडक्शन डिज़ाइनर या आर्ट डायरेक्टर जब खाली ज़मीन पर उसको बना हुआ देख लेता है तो वो अपने आप में सक्सेस है। उसके लिए बाकी ज़रूरत नहीं है। जैसे आप घर बनाते हैं, आर्किटेक्ट लेते हैं, फिर मजदूर आता है, मजदूर अपना काम करता है। पर वो घर बनेगा कैसे, यदि आपको ये मालूम है तो बाकी सरल है।
मेरे कला कर्म की बुनियाद : मुझे लगता है कि कला की बुनियादी समझ मेरे जीवन में रायपुर या बाद में भोपाल में भारत भवन के दौरान संचित हुईं। उन सारी चीज़ों ने ही मुझे बनाया। मुम्बई, कला जगत के नाम पर कॉमशियल वर्ल्ड है। मेरा काम देखेंगे और मेरे साथ के सारे लोगों का काम देखेंगे तो मेरे काम में और उन सारे लोगों के काम में यही सबसे बड़ा फ़र्क है कि मेरा काम तजुरबे से आया हुआ है, मेरी ठोकरों से आया हुआ है। मैं बिल्कुल प्रोफेशनली काम करता हूँ। आप ग़ौर करें- एक ‘मक़बूल’ फि़ल्म है, प्रोफेशनल फि़ल्म है। एक फि़ल्म ‘दीवार’ है जिसमें अमिताभ बच्चन हैं, प्रोफेशनल फि़ल्म है। ‘आँखें’ एक फि़ल्म है जिसमें अंधे रॉबरी करते हैं, प्रोफेशनल फि़ल्म है। संजय लीला भंसाली का एक शो है। ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’। ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा। सारे कॉमर्शियल काम हैं। उस तरह से आर्ट का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है कि हुसैन की पेंटिंग हो, अकबर की पेंटिंग हो या सूज़ा की हो। वो कन्वर्जन है। वो उसका व्यवसायीकरण है।

