Saturday, May 9, 2026
Homeकला खबरेंमेकअप रूम में जब मिले, उर्दू रंगमंच के दो चमकते सितारे

मेकअप रूम में जब मिले, उर्दू रंगमंच के दो चमकते सितारे

शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो उर्दू रंगमंच के एक सितारे के हाथों, दूसरे सितारे अभिनेता का मेकअप!…नीचे की तस्वीरों में नज़र आ रहे ये सितारे हैं, डॉ.एम सईद आलम और जफ़र मोहिद्दीन। आप कहेंगे इसमें कौन सी बड़ी बात है..शो से पहले कलाकार एक-दूसरे के मेकअप में इस तरह का सहयोग करते ही रहते हैं। लेकिन बात बस इतनी सी नहीं है, यहाँ बात ज़रा ख़ास है। असल में यह मामला ग़ालिब की दाढ़ी और उससे जुड़े मेकअप का है। मेकअप होने वाला था बेंगलुरू से दिल्ली आये ज़फर मोहिद्दीन का, वे ‘ज़िक्रे ग़ालिब’ नाम के नाटक में ग़ालिब की भूमिका निभाने वाले थे। शो शुरू होने वाला था। उनके सामने अचानक से आ गये डॉ.एम सईद आलम।
साब दाढ़ी तो आप ही फ़िक्स करेंगे: डॉ.एम सईद आलम बरसों से मंच पर ग़ालिब का किरदार निभाते आये हैं। उन्हें देखते ही ज़फ़र साहब को लगा, ये बढ़िया होगा, अगर वे अपनी ग़ालिब वाली दाढ़ी सीनियर एक्टर सईद साहब की देखरेख में फिक्स करा लें। यह बात उनके दिल की क़िताब में भी हमेशा के लिये दर्ज हो जायेगी। ज़हन में ये बात आते ही वे सईद साहब से इल्तिजा करने लगे – ‘साब दाढ़ी तो आप ही फ़िक्स करेंगे। मैं चाहता हूँ ग़ालिब की ये दाढ़ी और मेरा मेकअप, आपकी तजुरबेकार निगाह से ही गुज़रे’।डॉ.सईद ने मान ली ज़फर भाई की बात: नरमदिल सईद, ज़फर साहब की बात से इनकार ना कर सके। हालांकि वे ख़ुद अपना शो ख़त्म होने के बाद मेकअप रूम में चेंज करने आये थे। मगर ज़फर जी के शो को महज़ पंद्रह-बीस मिनट ही रह गये थे, लिहाजा उन्होंने ज़फर भाई की इल्तिजा को फौरन कुबूल कर लिया और उनका मेकअप होते देखने लगे। जब मेकअप मैन का काम हो गया, तब उन्होंने ज़फ़र साहब के चेहरे पर ग़ालिब की दाढ़ी को ‘फायनल टच’ दिया। इतना ही नहीं मेकअप के दौरान जब एक डॉयलॉग की रिहर्सल ज़फर साहब करने लगे, तब डॉ सईद भी उस डॉयलॉग को अपने अंदाज़ में  दोहराने लगे। बेशक वह संवाद ग़ालिब का ही था। सीनियर के हाथों मेकअप की दिली ख़ुशी: ज़फ़र जी अपने सीनियर के इस अंदाज़ और मेकअप में लगे उनके हाथों से बड़े ख़ुश हुये। कहने लगे, ‘भई इनकी वजह से ही मैं ‘ज़िक्रे-गालिब’ नाटक दिल्ली में करने आया हूँ। हर तरह से मुझे डॉ.सईद आलम ने यहाँ शो के लिये मदद की है। मेरे लिये यह एक यादगार दिन है’। ज़फर जब मुझसे यह सब कह रहे थे, तब मैं दोनों की इस यादगार मुलाक़ात और उनकी बातों को अपनी तरह से जज़्ब कर रहा था। मैं दोनों को देखता, कभी तस्वीरें लेता, कभी दोनों मेरी तरफ मुस्कुराकर देखते। ज़फर कहते, ‘हाँ भई खींच लो। नामालूम यह लम्हा कब आये। मैं बेंगलुरू में, ये दिल्ली में। ये तो आप हैं जो तस्वीर भी ले रहे हैं, वरना कौन ऐसी बातों पर तवज्जो देता है?मेरे लिये क्यों था यह लम्हा ख़ास: मेरे लिये यह लम्हा इसलिये मायने रखता था क्योंकि दोनों उर्दू थियेटर के समकालीन सितारे हैं। एक दक्षिण के दूसरे उत्तर भारत के। दोनों उर्दू रंगमंच और उर्दू ज़बान को अपने चाहने वालों के बीच में अपनी तरह से जिंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं। दोनों ही अपने-अपने क्षेत्रों और अपने फ़न के माहिर हैं। पेशे से आर्किटेक्ट ज़फर साहब, एक बेहतरीन वाइस ओवर आर्टिस्ट, राइटर, एक्टर, डायरेक्टर, एक्टिविस्ट और ‘कठपुतलीवाला’ थियेटर ग्रुप के क्रियेटिव हेड हैं। वहीं डॉ.सईद आलम इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में पीएचडी हैं। वे एक यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर रहे। पत्रकारिता की। .. और एक दिन सब छोड़कर अपने जुनून थियेटर के लिये ख़ुद को झोंक दिया। वे A Pierrot’s Troupe थियेटर ग्रुप के प्रमुख हैं। (नीचे तस्वीर में लेखक के साथ ज़फर मोहिद्दीन और डॉ.एम सईद आलम) 2 हज़ार से ज़्यादा शोज़ का साम्राज्य: असल में डॉ.एम सईद आलम थियेटर की किसी यूनिवर्सिटी से कम नहीं। उनके काम के आगे कई इंस्टीट्यूशन्स फेल हैं। वे 50 से अधिक नाटकों के जनक हैं। हिंदुस्तान और दुनिया के कई देशों में 2 हज़ार से ज़्यादा शोज़ कर चुके हैं। कमाल के एक्टर,डायरेक्टर,राइटर हैं। गालिब,अकबर,बाबर और गांधी जैसे कई बड़े किरदारों को मंच पर जीते रहे हैं। मंच के साथ टीवी और फ़िल्मों के लिये काम किया है। मगर पूरी तरह से थियेटर ही उनकी ज़िदंगी है। ऐसा कोई हफ़्ता नहीं, जब दिल्ली या देश के किसी शहर में उनके शोज़ ना होते हों, बुक माय शोज़ पर जिस एक्टर डायरेक्टर्स के शोज़ हमेशा चलते दिखाई देते हैं, उन अग्रणी कलाकारों में से वे एक हैं। उनके शोज़ मैंने कम ही ख़ाली देखे हैं। शोज़ के अलावा वे थियेटर वर्कशॉप्स भी करते ही रहते हैं। जब टॉम ऑल्टर मंच पर अदा करते थे ग़ालिब: डॉ.सईद के थियेटर ट्रुप में कभी टॉम ऑल्टर जैसे अभिनेता हुआ करते थे, वे उनके नाटकों में ग़ालिब की भूमिका भी निभाया करते थे। बेशक टॉम ऑल्टर उर्दू ज़बां के माहिर एक्टर रहे। मगर टॉम ऑल्टर ने जब इस दुनिया से परदा कर लिया, उसके बाद से डॉ. सईद ने गालिब के किरदार अपने अंदाज़ में मंच पर निभाने लगे और उसका भी एक इतिहास रचा । डॉ. सईद, ग़ालिब के कई शेड्स वाले क़िरदार मंच पर अभिनीत कर चुके हैं। वे दर्शकों की यादों नें अपने नाटकों – ‘ग़ालिब’, ‘ग़ालिब इन डेहली’ या ‘ग़ालिब कट..कट..कट’ या ‘ग़ालिब के ख़त’, ‘लालक़िले का मुशायरा’ आदि के ज़रिये यादों में बसे हुये हैं। ज़ाहिर है कि ज़फर साहब का ऐसे सीनियर आर्टिस्ट से दाढ़ी लगवाना भी एक यादगार और मुबारक मौका था। यही वजह है कि मैंने भी बहुत सोच-समझकर इस स्टोरी में सबसे पहली तस्वीर डॉ.सईद की ही लगाई है, जिसमें वे एक नौजवान ग़ालिब के रूप में नज़र आ रहे हैं। ठीक है ना? वैसे ज़फर साहब वाला ग़ालिब का शो कैसा रहा?
नीचे दिये लिंक को क्लिक कर आप ये भी पढ़ें – ज़फ़र की अदाकारी में ज़िक्रे ग़ालिब, ग़ालिब के ज़िक्र में दिल्ली!

ज़फ़र की अदाकारी में ‘ज़िक्रे ग़ालिब’, ग़ालिब के ज़िक्र में दिल्ली!

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments

जावेद अहमद शाह ख़ान "अल-हिंदी" on रंगमंच की नई उड़ान…सौम्या व्यास