शकील अख़्तर,इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। उज्जैन, मध्यप्रदेश से नाता रखने वाले रंगमंच कला के दो दिग्गजों लोकेंद्र त्रिवेदी और हफीज़ खान ने मालवा की लोक नाट्य परंपरा ‘माच’ के हाशिये पर जाने पर गहरी चिंता जताई है। दोनों वरिष्ठ रंग निर्देशकों ने कहा है, इस चुनौती से निपटने के लिये सभी को मिल-जुलकर जल्द प्रयास करना होगा। इस काम में मध्यप्रदेश सरकार को भी मदद के लिये आगे आना होगा। अगर ऐसा ना हुआ तो हमारी कला परंपरा को एक बड़ा नुकसान होगा।
भारंगम में मंचित नाटक के बाद जताई चिंता : दोनों ही कलाकार भारत रंग महोत्सव में सिद्धेश्वर सेन द्वारा लिखित नाटक- ‘राजा हरिश्चंद्र’ के मंचन के बाद इंदौर स्टुडियो से चर्चा कर रहे थे। उज्जैन की मालवा लोक नाट्य मंडल ने इस नाटक को नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में मंचित किया। इसका निर्देशन बाबूल लाल देवड़ा ने किया है। वे खुद भी इस नाटक में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। यह एक ऐसी पंरपरा भी है जिसमें पुरूष कलाकार ही महिलाओं की भूमिका बेहद दिलचस्प तरीके से निभाते हैं। देखिये और सुनिये करीब 40 साल से लगातार रंगमंच के लिए समर्पित मध्यप्रदेश के इन दोनों कला मनीषियों के विचार। शेयर और लाइक कीजिये।
माच को बचाने के लिये 3 दशक से काम : हफीज़ खान और लोकेंद्र त्रिवेदी माच परंपरा को बचाने के लिये अपनी तरह से भी उज्जैन में पिछले करीब 30 साल से काम करते आए हैं। दोनों ही हर साल यहां माच मंडलियों के नाट्य उत्सव का अपनी जोड़-तोड़ के साथ आयोजन करते हैं। इतना ही नहीं माच के लोक नाट्य समारोह में दोनों ही आयोजक तलाश कर माच कलाकारों को सम्मानित भी करते हैं। मगर अब हफीज़ खान कह रहे हैं, उज्जैन संभाग में मुश्किल से चार-पांच मंडलिया रह गई है। गिन-चुनकर 30 से 35 कलाकार रह गये हैं। ज़्यादातर कलाकारों को किसी तरह की कोई मदद नहीं है। वे खेतिहर हैं या मज़दूरी कर जीवन यापन करते हैं। मगर फिर भी इस परंपरा से जुड़े हुए हैं।
गायन प्रमुख और ज़िदंगी से बड़ी कहानियां : लोकेंद्र त्रिवेदी ने कहा, बचपन से ही हमने माच की मंडलियों को गाते-बजाते देखा है। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा स्कूल तक पहुंचने में माच की ही प्रमुख भूमिका रही। हमने रात-रात भर चलने वाले आयोजन देखे हैं। इस लोक नाट्य परंपरा में गायन प्रमुख है। इसमें ज़िदंगी से बड़ी कहानियां है। रंमंच की यह एक अलग शैली की परफॉरमिंग कला है। नाट्य कलाकारों को यह आज भी बहुत कुछ सिखाती है। परंतु बदलते वक्त के साथ यह परंपरा अब हाशिये पर जा रही है। अब वक्त आ गया है कि मध्यप्रदेश सरकार इस दिशा में तुरंत कदम उठाए। वरना बहुत देर हो जाएगी।

