शकील अख़्तर,इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। ‘मेरा नया उपन्यास मांडू की रानी रूपमती पर होगा। एक ऐसा किरदार जिसके इर्द-गिर्द कल्पनाओं का गहरा कुहासा है। आजकल मैं इसी पर काम कर रहा हूँ।’वयोवृद्ध साहित्यकार डॉ.शरद पगारे ने एक मुलाक़ात में यह बात कही। उन्होंने कहा, ‘मुझे उम्मीद है यह उपन्यास जल्द ही पूरा हो जाएगा।’

*इतिहास में बिखरी सामग्री जोड़ने की कोशिश* डॉ.पगारे ने कहा, रानी रूपमती का सौंदर्य ,नृत्य,गायन,कविताएं और सुलतान बाज बहादुर से उसका प्रेम दुनिया भर के प्रेमियों को माण्डू खींच लाता है। बहुत सी सुनी-अनसुनी कहानियों का एक जाल सा बुनता चला जाता है। मैं रूपमती के बारे में इतिहास में बिखरी सामग्री को शोध के माध्यम से जोड़ रहा हूँ। उपन्यास का नाम मैंने ‘रानी रूपमती अकबर की रूपकथा‘ रखा है। असल में रूपमति,ओरछा रूपसी प्रवीणराय ,गढ़ा मण्डला की रानी दुर्गावती एवं तानसेन की समकालीन थी। मुझे यकीन है यह उपन्यास पाठकों में नई उत्कंठा जगाएगा। साहित्य की एक बेहतरीन कृति बन सकेगा।


*गुलारा बेगम पर इतिहास मौन!* डॉ. पगारे का लिखा उपन्यास ‘गुलारा बेगम‘ हिन्दी के अलावा मराठी, उर्दू, गुजराती , मलयालम और पंजाबी में भी अनुवादित हुआ है। मगर गुलारा के किरदार के बारे में डॉ शरद ने एक चौंकाने वाली बात कही। उन्होंने कहा,आपको हैरानी होगी, गुलारा का उल्लेख किसी इतिहासकार ने नहीं किया है। यानी गुलारा बेगम के बारे में काफी हद तक इतिहास मौन है। परंतु मैंने अपने शोध से गुलारा के बारे में बहुत सी जानकारियां एकत्रित की। उनको एक कड़ी में पिरोने की कोशिश की।मैंने पाया कि सन 1614 में शाहजादा खुर्रम जब अहमद नगर को जीतने बुरहानपुर आया तब उसकी मुलाकात बोरवाडी की मशहूरो- मारूफ तवायफ से हुई। उसने तवायफ़ गुलारा को अपनी रखैल बना लिया। उसके लिए मुगल शहजादे खुर्रम (शाहजहां) ने सन 1614 में बुरहानपुर से 15 किलोमीटर दूर करारा गांव की उतावली नदी के दोनों किनारों पर दो बारादरियां बनवाई। भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने एक बारादरी पर प्लेट लगा कर लिखा है कि शहजादा खुर्रम (शाहजहां) ने सन् 1614 में गुलारा की मुहब्बत में इन्हें बनवाया। ताज महल से 23 साल पहले इसका निर्माण हुआ। इन बरादरियों के जरिए उसने अपनी मुहब्बत का इज़हार किया। इस तरह यह उपन्यास इतिहास की सचाई और साहित्य के काल्पनिक यथार्थ का संतुलित समन्वय बन गया।
*बेग़म ज़ैनाबादी इतिहास की हीराबाई* डॉ पगारे ने कहा, ‘गुलारा बेगम‘ की अपेक्षा ‘बेगम जैनाबादी ‘ के बारे में पर्याप्त सामग्री इतिहास में मिलती है। ‘बेगम जैनाबादी‘ का पूरा नाम हीराबाई था। चूंकि वो बुरहानपुर के पास ताप्ती के उस पार के कस्बे ,जैनाबाद की रहने वाली थी इसलिए शहजादा औरंगजेब ने उसका नाम ‘बेगम जैनाबादी‘ रखा। जैनाबादी भी बुरहानपुर की बोरवाडी की बेहद खूबसूरत और नाच-गाने में पारंगत तवायफ थी। मुहब्बत की इस दास्तान का जिक्र समकालीन इतिहासकार इनायत उल्लाह ने अहकाम – ए- आलमगिरी में किया है। अब्दुल हामिद ने भी ‘पादिशाहनामा‘ में इसका जिक्र किया है। महान इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार ने भी औरंगजेब के आख्यान में इसे पेश किया है। यहां यह उल्लेखनीय है कि डॉ. पगारे के इस उपन्यास पर आधारित नाटक का मंचन दिल्ली में क्षितिज थियेटर ग्रुप कर चुका है।

