देवस्थान ‘देवास’ मेरी जन्म भूमि है। दिलो-दिमाग़ पर जब देवस्थान देवास छा जाता है तब वहाँ के पेड़-पौधे, राधागंज में बीता बचपन और वहाँ गुज़रे मेरे जीवन से जुड़े दृश्यों में चली जाती हूँ। जानी-पहचानी चित्रकार, कवियत्री और लेखिका रंजना पोहनकर की आत्मा से काग़ज़ पर उतरे ये शब्द हैं। उनके इस लेख के माध्यम से आइये जानते हैं, देवास से जुड़ी उनके अंतरमन की अमिट स्मृतियां और साथ में कुछ इंदौर की भी यादें।– संपादक, इंदौर स्टूडियो।
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उस्ताद रजब अली खाँ से जुड़ी यादें: देवास में ही शास्त्रीय संगीत के सिद्धहस्त गायक उस्ताद रजब अली खां साहब रहा करते थे। उनसे जुड़ी बहुत सी गरिमामयी यादें है। ख़ाँ साहब, मेरी ज़िन्दगी में नये अर्थ दे गए हैं। उनकी आवाज़ आज भी मेरे हृदय को झंकृत करती है। रह-रहकर गूँजती है। देवास से ही संगीत और रागदारी की शुरुआत हुई थी। उस ज़माने के जीवंत दौर याद आते हैं। पीछे मुड़कर देखती हूँ तो साफ़ लगता है,सांगीतिक माधुर्य की छवियां मुझे वहीं से मिली थीं। (उस्ताद रजब अली खाँ साहब की मज़ार पर हाजिरी। साथ में बड़ी बहन अंजलि पोहनकर।)
माँ के साथ प्रकृति का बड़ा योगदान: टेकरी और देवी चामुण्डा के दर्शन, माँ के आशीर्वाद साथ मेरे जीवन में वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य का बहुत बड़ा योगदान रहा है, मैं शुद्ध लेखन से दूर फूल-पत्तियों और पहाड़ी के रेखांकन करती रही। उन्हें ही अपने चित्रों में लिखती और अभिव्यक्त करती रही। मां की कृपा दृष्टि से, सृष्टि के सुंदर रुप हरदम मेरे क़रीब रहे। आज मुंबई में ही ऐसा ही है। (देवास टेकरी पर मौजूद चामुन्डा देवी माँ। माँ की असीम कृपा मुझपर बरसी है।)
जब शाम को रोशन होते हैं चिराग़: देवास में दूर-दूर तलक जब घरों में शाम के चिराग़ जल उठते है तो ऐसा लगता हैं कि हमें आशीर्वाद यहीं से मिले हैं। उन चिरागों की रौशनी यह कह रही थी मानो.. तासीर थी उनमें… संगीत की तहज़ीब और अपनेपन की खुशबू थी वहाँ। ऐसे तत्व मिले हैं। (देवास की टेकरी से जुड़ी यादों की तैलरंग से बनाई मेरी तस्वीर।)
चित्रकला का आगाज़ यहीं पर हुआ: बचपन में तो ऐसा लगता था कि बस यही दुनिया है, लेकिन जैसे-जैसे जिंदगी आगे बढ़ी चित्रकला का आगाज़ यही था, एक मुकम्मल जहाँ बनता जा रहा था। मालवी लोकगीतों पर आधारित नाटक और प्रसिद्ध गायक कुमार गंधर्व के संगीतबद्ध किये हुए थे। यह भी देवस्थान में होने का प्रसाद था। उस दौर में ही इस कालजयी और अनंत संबोधी गायक की कीर्ति सारी दुनिया में फैल चुकी थी। न जाने उनके कितने चाहने वाले थे।
कुमार गंधर्व की पत्नी हमारी प्रिसिंपल थीं: यह भी हमारी ख़ुशनसीबी ही थी कि कुमार गंधर्व जी की पहली पत्नी भानुमती जी हमारे स्कूल की प्रिंसिपल थी। वे भी एक बहुत ही अच्छी गायिका थीं। उन्होंने हमें बहुत स्नेह दिया था, वे बड़ी उत्साही थी। छात्राओं को एकजुट करने में सफल थी, हमें प्रेरणा मिलती थी। (राधाबाई कन्या स्कूल, जहाँ मेरी शिक्षा हुई।)
हमारी पूजा, हमारी इबादत देवास: देवास हमारे लिए आस्था स्थल रहा है,हमारी पूजा और इबादत रही है। चित्रकला और तहज़ीब का संगमरमरी ख़याल यहीं मिला था। मेरी कला यात्रा की शुरुआत इंदौर के अहिल्या देवी स्कूल से आरंभ हुई। पहले कला शिक्षक गुरु आदरणीय मिर्ज़ा ईस्माइल बेग़ साहब थे। सहज दृश्य वस्तुओं के सही रेखांकन के साथ आपने हमें अलग – अलग विधाओं में चित्र में कैसे खूबसूरती ला सकते हैं यह भी सिखाया गया। उनकी भी शुक्रगुज़ार हूँ।
मेरा सौभाग्य, मेरे विद्वान कला गुरू: मेरे लिये यह ख़ुशी की बात है कि वड़ोदरा में चित्रकला की शिक्षा के दौरान मुझे केजी सुब्रम्णयम् और गुलाम मोहम्मद शेख़ जैसे विद्वान गुरू मिले। देवास ने आँखों में चित्रकला के जो रंग भरे थे, उसका विस्तार हुआ। मेरे चित्रों की मुंबई, कोलकाता, इंदौर जैसे शहरों के साथ ही मैलबोर्न, ऑस्ट्रेलिया में भी प्रदर्शनी लग चुकी है। कई जगहों पर मेरे पेटिंग्स संग्रहित हैं । (देवी अहिल्याबाई होलकर को समर्पित मेरी एक चित्रकला)
दिग्गजों ने हिन्दी में लिखने को प्रेरित किया: ये बात भी मैं नहीं भूल सकती कि हिन्दी में लेखन के लिये डॉ.प्रभाकर माचवे, श्रीनरेश मेहता, श्री भवानी प्रसाद मिश्र और डॉ.जगदीश गुप्त ने मुझे बहुत प्रेरित और प्रोत्साहित किया। डॉ.प्रभाकर माचवे जी के साथ भी बहुत सी यादें जुड़ी हुई हैं। उनके साथ एक घर जैसा रिश्ता था। उनकी धर्मपत्नी शरद माचवे जी भी बेहद सुशील और संभ्रात महिला थीं। उन्होंने लेखन में विचार और भावों की अभिव्यक्ति के बारे में बहुत कुछ सिखाया था। आज जो बात चित्रकला में नहीं कह पाती, अक्सर वह अपनी कविताओं में वह अभिव्यक्त करने की कोशिश करती हूँ।
हमारी चित्रकला प्रदर्शनी में श्रीनरेश मेहता: नीचे दी गई मेरी यह तस्वीर स्व.श्रीनरेश मेहता जी के साथ इंदौर में लगाई गई चित्रकला प्रदर्शनी की है। चित्रकार और छायाकार कादर भाई ने इस प्रदर्शनी का आयोजन किया था। कादर भाई ने इस छोटी प्रदर्शनी में शहर के अन्य चित्रकारों भी जोड़ा था। उस समय श्रीनरेश मेहता जी दैनिक ‘चौथा संसार’ के संपादक थे। वे एक स्थापित कवि और कला मनीषी थे। यह वही दौर था जब उन्हें ज्ञानपीठ अवार्ड दिये जाने की घोषणा भी हुई थी। मेहता सर, हमारी इस प्रदर्शनी में बड़ी सहजता शामिल हुए थे और उन्होंने हमारे काम की प्रशंसा की थी।
रजब अली खाँ साहब पर मेरी पुस्तक: अब बात फिर देवास की। यह मेरी ख़ुशनसीबी रही कि मैं उस्ताद रजब अली खाँ साहब के जीवन पर एक पुस्तक भी लिख सकी। उनकी जीवनी तथा संगीत यात्रा पर आधारित मेरी पुस्तक ‘शख़्सियत’ नाम से पब्लिश हुई है। यह पुस्तक उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी, म.प्र. संस्कृति परिषद् द्वारा प्रकाशित की गई है। 
देवास की यादें हमेशा रहेंगी साथ: देवस्थान देवास ने क्या नहीं दिया। उसकी यादें निरंतर हैं, रह-रह घूमती हैं। मैं चाहे जहाँ रहूँ, अपनी मिट्टी से मुझे जो महक मिली है, जो कुछ मैंने पाया है, वह न जाने किस पुण्याई का प्रतिफल है। मैंने जो भी थोड़ा बहुत अर्जित किया, उसके पीछे देवास है, इंदौर है। उससे जुड़ी कई शख़्सियतें हैं, उनसे मिले संस्कारों का प्यार है। आगे मैं आपको बताऊँगी उस रोशन घर के बारे में बताऊंगी, जहाँ से मैंने सीखी चित्रकला। आगे पढ़िये –
‘कैनेडी’ का किरदार मैंने सुधीर मिश्रा से चुराया-अनुराग कश्यप

